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Sunday, May 8, 2016

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बेरोजगारी-छत्तीसगढ़

प्रकाश कारात
पिछले कुछ समय से कार्पोरेट मीडिया में भी इसकी चर्चा शुरू हो गयी है कि बेरोजगारी बढ़ रही है और देश में नये रोजगार पैदा नहीं हो रहे हैं. ऐसा लगता है कि इस पर ताजा चर्चा के पीछे लेबर ब्यूरो द्वारा किया जाने वाला तिमाही रोजगार सर्वे है. आठ विशेष रूप से रोजगार-सघन उद्योगों–कपड़ा, वस्त्र, अभूषण, सूचना-प्रौद्योगिकी, चमड़ा, हथकरघा, धातु तथा ऑटोमोबाल्स–के मामले में किया गया यह सर्वे दिखाता है कि इन आठों क्षेत्रों को मिलाकर 2015 में 1 लाख 35 हजार लोगों के लिए ही रोजगार पैदा हो पाया था, जबकि 2014 में 4 लाख 90 हजार लोगों के लिए रोजगार पैदा हुआ था और 2009 में 12 लाख 50 हजार के लिए.

जहां तक ग्रामीण रोजगार का सवाल है, हालात और भी खराब हैं. अब जबकि सकल घरेलू उत्पाद में खेती का अंशदान घट रहा है, खेती से इतर रोजगार का ऐसा कोई बहुविधकरण हो ही नहीं रहा है, जो ग्रामीण गरीबों तथा ग्रामीण युवाओं को रोजगार दिलाए. इसी मार्च के तीसर सप्ताह तक, मनरेगा के अंतर्गत काम मांगने वालों की संख्या 8 करोड़ 40 लाख हो चुकी थी, जिससे पता चलता है कि ग्रामीण बेरोजगारी की समस्या कितनी विकराल है.

नरेंद्र मोदी और भाजपा ने लोकसभा चुनाव के अपने प्रचार में, बड़े पैमाने पर रोजगार मुहैया कराने को अपना मुख्य चुनावी वादा बनाया था. लेकिन, मोदी सरकार के दो साल बीत चुके हैं और इस मामले में उनका बहुत ही निराशाजनक रिकार्ड सामने आ चुका है. यह सरकार सकल घरेलू उत्पाद में 7.5 फीसद की वृद्धि दर का दावा कर रही है, जो दावा खुद भी संदेह के दायरे से बाहर नहीं है. बहरहाल, इतना तो साफ ही है कि इस तरह की नवउदारवादी वृद्धि, रोजगार पैदा नहीं करती है.

बहरहाल, रोजगार की इस निराशाजनक स्थिति की सचाई के सामने आने के बाद भी, अर्थशास्त्री और कार्पोरेट मीडिया में बैठे विश्लेषणकर्ता, हर बार की तरह भांति-भांति के सुझाव देने में अटके हुए हैं कि कैसे अर्थव्यवस्था में नयी जान डाली जाए तथा इस तरह रोजगार पैदा किया जाए. लेकिन, वे हमेशा की तरह सचाई को पकड़ ही नहीं पा रहे हैं.

सीधी सी बात यह है कि नवउदारवादी आर्थिक-वृद्धि, रोजगार पैदा नहीं करती है बल्कि रोजगार नष्ट करती है. इस रास्ते पर चल रही अर्थव्यवस्था में चाहे कितनी ही ठोक-पीट क्यों न की जाए, रोजगार की समस्या हल नहीं हो सकती है. इस समस्या को हल करने के लिए तो नीतियों में ही बुनियादी बदलाव लाना होगा.

निजी निवेश तथा निजीकरण पर बढ़ती निर्भरता से, रोजगार पैदा नहीं होने वाले हैं. इसकी सीधी सी वजह यह है कि नवउदारवादी आर्थिकी निवेशों के प्रवाह को पूंजी-सघन तथा श्रम-बचाने वाली प्रौद्योगिकियों की ओर ही धकेलती है, जिनसे बड़ी श्रम शक्ति की जरूरत ही नहीं रह जाती है. इसके अलावा, जो रोजगार उपलब्ध भी होता है, ठेका रोजगार ही होता है, जो रोजगार को कहीं ज्यादा अस्थिर तथा अल्पावधि बनाकर रख देता है. याद रहे कि अनौपचारिक क्षेत्र में भी, जो भारत में सबसे ज्यादा रोजगार मुहैया कराने वाला क्षेत्र है, 2004-05 से 2011-12 के बीच, रोजगार में पूरे 6 फीसद की गिरावट दर्ज हुई थी.

इससे यह साफ हो जाता है कि नवउदारवादी वृद्धि की प्राथमिकता में न तो श्रम-सघन उद्योगों का विकास आता है और न लघु-औद्योगीकरण इकाइयों का विकास. व्यापार उदारीकरण ने बाहर से आयातित औद्योगिक मालों पर तटकर घटा दिए हैं और इसने अनेक क्षेत्रों में घरेलू उद्योगों को आर्थिक रूप से अवहनीय बना दिया है. इसका नतीजा यह है कि अनेक क्षेत्रों में औद्योगिकरण का उल्टा हुआ है.

नवउदारवादी नीतियों के हिस्से के तौर पर सरकार बड़े कार्पोरेट खिलाडिय़ों तथा संपन्न तबकों को दसियों हजार करोड़ रुपये की सब्सिडियां देती है तथा उन पर बनने वाले कर छोड़ देती है. दूसरी ओर, लाखों स्त्री-पुरुषों को आजीविका तथा रोजगार देने वाले परंपरागत उद्योगों जैसे हथकरघा, काजू, नारियल जूट, दस्तकारी आदि को मदद देना उसे मंजूर नहीं होता है. इसके अलावा खेती में सार्वजनिक निवेश में कटौती और शिक्षा, स्वास्थ्य, मनरेगा आदि सामाजिक क्षेत्र के कामों पर निवेश में भारी कटौतियां भी, देश में रोजगार की संभावनाओं के सिकुडऩे में योग रहे हैं.

इन हालात में जरूरत है विकास के ऐसे वैकल्पिक यात्रा पथ की, जो सभी क्षेत्रों में रोजगार पैदा कर सकता हो. खेती में तथा ढांचागत क्षेत्र में सार्वजनिक निवेशों में भारी बढ़ोतरी की जरूरत है, जिससे रोजगार पैदा होगा. इसके साथ ही साथ श्रम-सघन उद्योगों, लघु उद्योगों तथा कृषि-प्रसंस्करण उद्योगों को प्रोत्साहन तथा संवर्धन दिए जाने की जरूरत है. शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में सार्वजनिक निवेशों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की जानी चाहिए, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य व शिक्षा व्यवस्थाओं का विस्तार होगा तथा उनकी गुणवत्ता का भी विकास होगा, जिससे रोजगार पैदा होगा. इसके साथ ही साथ, युवाओं के पेशागत व कौशलगत विकास के ठोस कार्यक्रमों की जरूरत होगी, जो अपने लिए खुलने वाले भांति-भांति के रोजगारों के लिए उन्हें तैयार कर सकें.

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