झीरम: फिर वही कहानी

Wednesday, March 12, 2014

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माओवादी हमला

दिवाकर मुक्तिबोध
नक्सल मोर्चे पर और कितने दावे? और कितने संकल्प? और कितनी जानें? क्या खोखले दावों और संकल्पों का सिलसिला यूं ही चलता रहेगा और निरपराध मारे जाते रहेंगें? राज्य बनने के बाद, पिछले 13 वर्षों में जब- जब नक्सलियों ने बड़ी वारदातें की, सत्ताधीश नक्सलियों से सख्ती से निपटने के संकल्पों को दोहराते रहे. चाहे वह प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी हों या वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह जिनके हाथों में तीसरी बार सत्ता की कमान है.

नक्सलियों से युद्ध स्तर पर निपटने की कथित सरकारी तैयारियों के बखान के बावजूद राज्य में न तो नक्सलियों का कहर कम हुआ, न ही घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आई और न ही नक्सलियों के हौसले पस्त हुए. उनका सूचना तंत्र कितना जबरदस्त है उसकी मिसाल यद्यपि अनेक बार मिल चुकी है, लेकिन ताजा वाकया ऐसा है जो उनके रणनीतिक कौशल का इजहार करता है.

राज्य के पुलिस तंत्र में बडे- बड़े ओहदों पर बैठे अफसरों ने शायद ही कभी सोचा हो कि जीरम घाटी में कभी दोबारा हमला हो सकता है. पिछले वर्ष 25 मई को इसी घाटी में नक्सलियों ने कांग्रेसियों के काफिले पर हमला किया था जिसमे 31 लोग मारे गए थे. देश में किसी राजनीतिक पार्टी के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं पर यह सबसे बड़ा हमला था. इस हमले में कांग्रेस के दिग्गज नेता विद्याचरण शुक्ल, नेता प्रतिपक्ष रहे महेन्द्र कर्मा एवं प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष नंदकुमार पटेल मारे गए थे. उसी जीरम घाटी में एक बार फिर नक्सलियों ने योजनाबद्ध तरीके से सीआरपीएफ की सर्चिंग पार्टी पर हमला किया. इस हमले में 16 जवान शहीद हुए.

पिछले महीने ही नक्सलियों ने दो अलग अलग घटनाओं में सात सीआरपीएफ के जवानों को मौत के घाट उतारा था. पिछले वर्षों में पुलिस एवं अर्द्ध सैनिक बलों के गश्ती दलों पर दर्जनों छिटपुट हमले हुए हैं जिसमें कई जवानों की जाने गई हैं. 11 मार्च 2014 को संयुक्त गश्ती दल पर किया गया हमला इसी श्रृंखला की अगली कड़ी है.

पुलिस प्रशासन लगातार इस बात की दुहाई देता रहा है कि आपरेशन ग्रीन हंट, राज्य पुलिस बल एवं अर्द्धसैनिक बलों की बस्तर में मौजूदगी एवं उनकी सख्ती से नक्सलियों के पैर उखड़ते जा रहे हैं.

यह भी कहा गया बस्तर के आदिवासियों का विश्वास खोने एवं पुलिस बल की सक्रियता से नक्सली बौखला गए हैं. इसी बौखलाहट में वे जवानों पर हमले कर रहे हैं तथा मुखबिरी के शक में आदिवासियों की हत्याएं कर रहें है. पुलिस का यह भी दावा है कि नक्सलियों के शहरी नेटवर्क को ध्वस्त करने में उसे जबरदस्त कामयाबी मिली तथा नक्सलियों की तगड़े घेरेबंदी एवं मुठभेड़ों की वजह से उसके कई कमाण्डर या तो मारे गए या उन्होंने आत्मसर्मपण किया.

राज्य पुलिस के इस दावे को सच मायने में कोई बुराई नही है क्योंकि कुछ घटनाएं इसकी साक्षी हैं. लेकिन खुफिया तंत्र का क्या? क्या राज्य की पुलिस यह दावा कर सकती है कि उसका सूचना तंत्र, उसका खुफिया नेटवर्क नक्सलियों से ज्यादा मजबूत और विस्तारित है? यकीनन अगर ऐसा होता तो छत्तीसगढ़ में बड़ी तो कौन कहे, छोटी मोटी वारदातें भी नहीं होती और न ही नक्सलियों की जनअदालतें लग पातीं जिसका मूल उद्देश्य आदिवासियों के मन में खौफ पैदा करना है और वे इसमे कामयाब भी है.

दरअसल इसका सच क्या है, सामने है. पिछले वर्ष जीरम घाटी में मौत का तांडव पुलिस की खुफिया तंत्र की विफलता का परिणाम था. और अब पुन: इसी घाटी में सीआरपीएफ की सर्चिंग पार्टी पर हमले से पुन: यह सिद्ध होता है कि पुलिस के पास मुखबिरों का अकाल है, उसका सूचना तंत्र कमजोर है और उसमें दूरदृष्टि का भी अभाव है.

जाहिर है नक्सलियों ने पुलिस प्रशासन की इसी कमजोरी का फायदा उठाया. उन्हें अहसास था कि पुलिस यह कल्पना भी नहीं कर सकती कि जीरम घाटी में दोबारा हमला हो सकता है. इसलिए उन्हें अपनी योजना को मूर्त रूप देने में कोई कठिनाई नहीं हुई. यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि तीन सौ से अधिक नक्सली एक बड़े हमले में शामिल होने के लिए तेज गतिविधियां कर रहे हों और पुलिस को किसी छोर से इसकी कोई खबर न मिलती हो. नक्सली इत्मीनान से सड़कों पर बारूद सुरंगें बिछाते हों, पेड़ काटकर रास्ता रोकते हों और पुलिस को इसकी हवा तक न लगती हो. जबकि राज्य की पुलिस संचार के आधुनिक संसाधनों से लैस है.

स्पष्ट है, पुलिस लापरवाह है और नक्सल मोर्चे पर वह फिसड्डी है. यदि ये सब चीजें तंदुरूस्त होती तो जीरम घाटी कभी रक्तरंजित नही होती न ही बस्तर में नक्सली अपने इरादों में कामयाब होते. 11 मार्च को जीरम में ताजा हमले के बाद जैसा कि अमूमन होता है, सरकार फिर चैतन्य हो जाएगी, चिंता जाहिर करेगी, विचार विमर्श के लिए उच्च स्तरीय बैठकें होंगी, नक्सलियों से सख्ती से निपटने का संकल्प लिया जाएगा, जोश जोश में बस्तर में तेज कार्रवाई भी की जाएगी, नक्सलियों की धरपकड़ भी होगी लेकिन धीरे- धीरे जोश ठंडा पड़ता जाएगा और पुलिस फिर पहले जैसी पुलिस हो जाएगी, गाफिल और गैरजिम्मेदार.