बुद्धि के साथ करुणा का विकास जरूरी

Wednesday, January 15, 2014

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दलाई लामा

रायपुर | एजेंसी: दलाई लामा ने मानव जीवन की बेहतरी के लिए प्रत्येक व्यक्ति में बुद्धि के साथ-साथ करुणा के विकास पर भी बल दिया है.

दलाई लामा ने बुधवार अपरान्ह यहां पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के सभागार में नागार्जुन दर्शन पर आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन सत्र को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित किया.

इस मौके पर ‘बुद्धि और करुणा’ विषय पर उन्होंने सार्वजनिक व्याख्यान दिया. दलाई लामा ने कहा कि लगभग सात अरब की जनसंख्या वाली इस दुनिया में अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोग रहते हैं. हमें अपने भीतर बुरे विचारों को अच्छे विचारों में बदलने की क्षमता विकसित करने का प्रयास करना चाहिए.

दलाई लामा ने कहा कि जिस प्रकार हम अपनी शारीरिक स्वच्छता का ध्यान रखते हैं, उसी तरह हमें अपनी भावनाओं की स्वच्छता का भी ध्यान रखना चाहिए. बच्चों के किडरगार्डन स्कूलों से विश्वविद्यालयों तक हमारी शिक्षा पद्धति भी ऐसी होनी चाहिए, जिसमें बुद्धि के साथ मानवीय करुणा और संवेदनशीलता भी शामिल रहे.

दलाई लामा ने भारतीय संस्कृति, भारतीय दर्शन और भारतीय परंपराओं की हजारों वर्ष पुरानी विरासतों का उल्लेख करते हुए कहा कि हम तिब्बत के लोग भारत को अपना गुरु मानते हैं. भारतीय हमारे गुरू हैं और हम शिष्य.

उन्होंने सामाजिक बुराइयों और विसंगतियों को दूर करने के लिए शिक्षा में नैतिकता और करुणा की जरूरत पर भी विशेष रूप से बल दिया.

उन्होंने कहा कि मनुष्य सामाजिक प्राणी हैं. इसलिए प्रत्येक व्यक्ति में सामाजिक करुणा का उत्पन्न होना जरूरी है. प्रेम और करुणा के अंतर को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि प्रेम मनुष्यों में परिवार और संबंधियों तक सीमित रहता है. किसी प्रकार का विवाद होने पर प्रेम कम हो जाता है, लेकिन करुणा संपूर्ण विश्व के लिए होती है. अपने दुश्मन के लिए भी हममें करुणा का भाव होना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि हमें सभी धर्मो का आदर करते हुए धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को अपनी प्रज्ञा के द्वारा दुनिया भर में फैलाने का प्रयास करना होगा.

शिक्षा पद्धति का उल्लेख करते हुए दलाई लामा ने कहा कि मनुष्य अपनी भौतिक उन्नति के लिए आधुनिक शिक्षा जरूर प्राप्त करे, लेकिन हमें भारत के अपने हजारों वर्ष पुराने दर्शन, अपनी प्राचीन संस्कृति और अपने नैतिक मूल्यों से हमेशा जुड़कर रहना चाहिए.

दलाई लामा ने कहा कि मानसिक शांति के लिए व्यक्ति का लखपति और करोड़पति होना जरूरी नहीं है. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं में रहने वाले सम्पन्न लोगों को मानसिक अशांति की वजह से रातों में नींद नहीं आती, जबकि गरीब परिवारों के सदस्य पैसा कम होने के बावजूद एक दूसरे के साथ प्रेम और सुख-शांति से रहते हैं.

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