हत्या का सिद्धांत और…

Saturday, June 1, 2013

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बस्तर नक्सली हमला

रायपुर | जे के कर: बस्तर में माओवादियों के प्रवक्ता गुड्सा उसेंडी का बयान गौरतलब है-‘फासीवादी सलवा जुडूम के सरगना महेन्द्र कर्मा का सफाया – बस्तरिया आदिवासी जनता पर किए गए अमानवीय अत्याचारों, नृशंस हत्याकाण्डों और बेअंत आतंक की जायज प्रतिक्रिया! बड़े कांग्रेसी नेताओं पर हमला- यूपीए सरकार द्वारा विभिन्न राज्य सरकारों के साथ मिलकर चलाए जा रहे फासीवादी आपरेशन ग्रीनहंट का अनिवार्य प्रतिशोध!’

इस बयान के माध्यम से माओवादी अपने हत्या के सिद्धांत की व्याख्या कर रहे हैं. गुड्सा के अनुसार सलवा जुड़ुम तथा आपरेशन ग्रीनहंट का जवाब केवल हत्या के रुप में ही उनके पास है. मीडिया में आई खबरों पर अगर यकीन किया जाये तो महेन्द्र कर्मा की गोली मार कर हत्या करने के बाद उनके मृत शरीर को 78 बार चाकुओं से गोदा गया था. इससे जाहिर है कि हत्या करते वक्त उनके जेहन में घृणा का भाव प्रबल था.

लेकिन घृणा की इस अभिव्यक्ति पर गुड्सा चुप हैं. व्यक्तिगत घृणा तथा हत्या मार्क्सवादी नजरिये से गलत है. चीनी कम्युनिस्ट के पूर्व प्रमुख माओ त्से तुंग ने भी कभी व्यक्तिगत हत्या की पैरवी नही की थी. गुड्सा वैसे भी कई मुद्दों पर चुप हैं. मसलन कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल के बेटे दिनेश पटेल की सोच-समझ कर जानते-बूझते की गई हत्या पर भी वे चुप हैं. गुरिल्ला वार में ‘मॉस अटैक’ पर भी गुड्सा की यह विज्ञप्ति कुछ नहीं कहती. व्यवस्था, सत्ता व पूंजीवाद के नाम पर विद्याचरण शुक्ल और नंदकुमार पटेल की हत्या पर तो गुड्सा के बच्चों जैसे तर्क एक बार स्वीकार कर भी लिए जायें तो भी मनमोहन सिंह की इसी व्यवस्था के प्रतिनिधि कवासी लखमा पर उनकी चुप्पी चौंकाती है.

असल में गुड्सा उसेंडी प्रकारांतर से उन्हीं थोथे तर्कों के साथ इस बयान में सामने आए हैं, जिसका आधार अंततः मार्क्सवाद के सिद्धांत की हत्या के साथ उपजता है. किसी भी तरह की हिंसा के खिलाफ होने के बाद भी, पूछने का मन करता है कि 1967 से आज तक की यात्रा में नक्सलियों ने कितने औद्योगिक घरानों को, बड़े जमींदारों को निशाना बनाया ? बस्तर में टाटा-एस्सार के साथ माओवादियों के रिश्ते अब छुपे-ढके हुए नहीं हैं. व्यवस्था के नियंत्रक पूंजीवादी सत्ता की गोद में पलने वाले इस माओवाद से कोई बदलाव आएगा, इसका ठीक-ठीक जवाब तो गुड्सा उसेंडी ही दे सकते हैं.

माओ ने सत्ता पर काबिज होने के लिए लांग मार्च का आयोजन किया था, जिसमें चीनी जनता की सक्रिय भागीदारी थी. गुरिल्ला युद्ध किये गये लेकिन जनता के साथ मिलकर. दूसरी ओर बस्तर के माओवादी जंगल में छुपकर स्वयं लड़ाई लड़ते है. उन्हें इस बात का भान नहीं है कि जंगल पर कब्जा करके मानव समाज में बदलाव नहीं लाया जा सकता.

बंदूक और अपने कथित सिद्धांतों के साथ बदलाव की बात करने वाले तालिबान के गिरोह से अगर माओवादियों की तुलना की जाये तो बात केवल प्रगतिशीलता पर आकर अटक जाती है और मार्क्स-लेनिन-माओ के सिद्धांत पर ही. लेकिन अगर भारतीय माओवादी आंदोलन के कपड़े के रेसे निकाले जायें तो सैद्धांतिकी की आड़ लेकर जो कुछ किया जा रहा है, वह कहीं न कहीं एक सामंती और पूंजीवादी चरित्र को ही सामने ला कर खड़ा करता है. जहां किसी भी दूसरे के लिये कोई जगह नहीं है. असहमति के लिये तो बिल्कुल भी नहीं. ठीक बुश की तरह, जो कहते थे कि जो हमारे साथ नहीं हैं, वे आतंकवादियों के साथ हैं. अगर इसे सरलीकरण नहीं माना जाये तो पूछने का मन होता है कि क्या बस्तर में अपने समानधर्मा सिद्धांत के पैरोकार सीपीआई और सीपीएम के साथ उनका व्यवहार ऐसा ही नहीं रहा है? हरेक वैचारिक असहमति को प्रतिक्रियावाद और गद्दार के विशेषणों से नवाजना यह बताता है कि माओवाद के नाम पर भारतीय सशस्त्र आंदोलन लंबे समय से एक जिद्दी कठमुल्लापन के दौर से ही तो गुजर रहा है.

विश्व स्तर पर अलग अलग देशो में अलग अलग समय पर अति वामपंथ का उपयोग सीआईए द्वारा किये जाने के पुख्ता सबूत हैं. अति वामपंथ का उपयोग लोकतांत्रिक सत्ता और पूंजीवादी घरानों द्वारा कई बार किया जा चुका है. झारखंड और बिहार में माओवादी आंदोलन का जो हाल है, वह इस स्थिति को और साफ करता है. ऐसे में छत्तीसगढ़ में सक्रिय माओवादी आंदोलन का परिवर्तन यात्रा पर किया गया ताजा हमला अगर सुपारी हत्या जैसा मामला न हो तो भी सिद्धांतों की आड़ लेकर किसी आपराधिक गिरोह का काम ही लगता है.

यह बात तो बहुत साफ है कि हरेक देश और काल के अनुसार समाज में बदलाव वहां की ठोस परिस्थितियों के अनुरूप होता है. जिसका रटे रटाये किताबी ज्ञान के आधार पर विश्लेषण नही किया जा सकता. मार्क्सवाद कठमुल्ला नही वरन् गतिशील सिद्धांत है. मार्क्सवाद ने रूस में जारशाही को ध्वस्त कर समाजवादी समाज व्यवस्था कायम की थी. उसके बाद चीन, वियतनाम, जर्मनी, उत्तर कोरिय उसमें जुड़ते गये. इसी सिद्धांत के आधार पर क्यूबा में भी बदलाव आये. आज लैटिन अमरीका में तो गुलाबी समाजवाद सत्तारूढ़ है.

रूस या चीन की परिस्थिति से भारत की परिस्थिति अलग है. वहा के जनआंदोलनो या क्रांतिकारी क्रियाकलापो का भारत के लिये हूबहू आयात करना निरा मूर्खता के अलावा और कुछ नही है. सीपीआई माओवादी आज भले भाकपा माले पर संशोधनवादी का तमगा लगा ले, लेकिन किसी जमाने में सशस्त्र आंदोलन में उनसे कहीं अधिक आईपीएफ सक्रिय था. बिहार में आईपीएफ ने ही ‘ऊपर से 6 ईंच छोटा करने’ का कथित क्रांतिकारी जुमला चलन में लाया था. लेकिन बाद में 18 सालों तक भूमिगत रहने के बाद विनोद मिश्र जैसे नेता सामने आये और फिर उन्होंने संसदीय राजनीति की जरुरत को समझा.

जाहिर है, गुड्सा उसेंडी विनोद मिश्र जैसों का नाम तक सुनना नहीं चाहेंगे. किसी जमाने में जहानाबाद और बिहार में सर्वाधिक लोकप्रिय अपने पुराने साथी दिवंगत डॉ. विनयन को तो वे भूल ही गये होंगे, जिन्होंने हथियार के बजाये गांधी और समाजवाद में मनुष्य की मुक्ति का सपना देखना शुरु कर दिया था. अंततः मार्क्सवाद भी तो मनुष्य की मुक्ति का ही सपना है. जिसके सार्थवाह बनने के बजाये हत्या के सिद्धांत गढ़ने की असफल कोशिश में गुड्सा के साथी सिद्धांतों की हत्या में जुटे हुये हैं. सुविधानुसार बोलने और चुप रहने का सबब तो गुड्सा को बताना ही पड़ेगा.

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