फर्जी फर्म, फर्जी खरीदी

Monday, July 7, 2014

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ठगी

दंतेवाड़ा | सुरेश महापात्र: दक्षिण बस्तर में संचालित आश्रम शालाओं में फर्जी खरीदी की गई है. इस बार इंडस्ट्रियल बेसिक ट्रेनिंग के नाम पर आश्रम शालाओं के अधीक्षकों के द्वारा सीधी खरीदी गई है. एक बारगी देखा जाए तो लगता है कि अधीक्षकों ने सारे नियमों को ताक पर रखकर एक साथ लाखों का हेर-फेर कर दिया है. यहां बताने की स्थिति में कोई नहीं है सच्चाई कौन बताए? और किससे पूछा जाए?

सोमारू मंडावी नाम के एक अज्ञात शख्स ने हमें एक बिल की कॉपी भेजी है, जिसमें देखने से साफ झलक रहा है कि मामला लाखों रुपए की सरकारी खरीदी में गड़बड़ी का है. बिल की कॉपी के आधार पर हमने जो पड़ताल की है, उससे जो तथ्य निकलकर सामने आए हैं, उसके मुताबिक दंतेवाड़ा में स्थित आनविका इंटरप्राइजेस नामक संस्था ने जिले के पोटा केबिन संस्थाओं में कृषि व पशुपालन, गृह एवं स्वास्थ्य, भवन निर्माण, उर्जा एवं पर्यावरण, नाप तौल, फर्नीचर निर्माण से संबंधित सामग्री का सीधा विक्रय किया है.

फर्जी निकला टिन नंबर
इस संस्था ने बिल पर जो टिन नंबर अंकित किया है उसका नंबर 22962403696 है. इस नंबर की पड़ताल सीजी कमर्शियल टेक्स की वेबासाइट व एसएमएस द्वारा की गई तो पता चला कि इस नंबर पर किसी भी तरह की संस्था पंजीकृत नहीं है. यानी जिस संस्था का नाम दिया गया है, वह फर्जी है. दंतेवाड़ा में इस नाम की किसी संस्था के होने का कोई सबूत नहीं मिला. व्यापारियों की संस्था चैंबर से जुड़े अनूप सूद ने बताया कि उनकी जानकारी में नहीं है कि आनविका नाम की कोई दुकान यहां संचालित है.

मामला 30 लाख की खरीदी का
एक संस्था को जारी बिल के मुताबिक यह राशि सिंगल बिल में करीब सवा लाख रुपए की सरकारी खरीदी दर्शा रही है. जिले में करीब 25 पोटा केबिन आश्रम शाला संचालित हो रहे हैं. यदि इसे मानक माना जाए तो समूचे जिले में केवल इस बिलिंग के आधार पर करीब तीस लाख रुपए की खरीदी का खेल दिख रहा है. इसके अलावा कुछ और भी मद हो सकते हैं, जिसके तहत आश्रम शालाओं ने खरीदी की हो. इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता.

ऐसे तय होती है जिम्मेदारी
उल्लेखनीय है राजीव गांधी शिक्षा मिशन के तहत जिले में मिशन संचालक से लेकर आश्रम अधीक्षक के बीच करीब आधा दर्जन पदेन अधिकारियों का चैन होता है. जिनकी जानकारी के बगैर इस तरह की खरीदी हो ही नहीं सकती. जिला स्तर पर कलेक्टर व मिशन लीडर, मिशन संचालक जिपं सीईओ, डीपीसी व डीईओ के बाद एपीसी वित्त स्तर पर किसी भी कार्यक्रम की पड़ताल की जाती है उसके पश्चात ब्लाक लेबल पर बीआरसी, बीईओ, सीआरसी और उसके बाद अधीक्षक तक राशि पहुंचती है.

क्या है आईबीटी स्कीम
जिले में संचालित आश्रम शालाओं में मिडिल क्लास के बच्चों को स्वरोजगार से संबंधित बेसिक प्रशिक्षण देने के लिए एक कार्यक्रम तय किया गया है. जिसके तहत बच्चों को कृषि, पशुपालन, भवन निर्माण, इलेक्ट्रीशियन, कारपेंटर आदि का प्रशिक्षण दिया जाना है. इसके लिए नोडल एजेंसी राजीव गांधी शिक्षा मिशन को बनाया गया है. सर्वप्रथम यह योजना जिले में संचालित पोटा केबिन आश्रम शालाओं में लागू की जा रही है. इस योजना के क्रियान्वयन हेतु सीधे आश्रम अधीक्षकों को भुगतान किया गया है. ताकि वे सुविधा और जरूरत के मुताबिक सामग्री क्रय कर सकें.

क्या है गड़बड़ी
1. सभी पोटा केबिन में एक ही संस्था से खरीदी की गई है. यह महज संयोग नहीं हो सकता?
2. अगर संस्था सही है तो उसके स्थित होने की जानकारी क्यों नहीं है और उसका टिन नंबर फर्जी क्यों है?
3. क्रय करने से पहले क्या भंडार क्रय नियमों का पालन किया गया? अगर नहीं तो अधिकारियों ने इसके लिए निर्देशित क्यों नहीं किया?
4. जो बिल इम्पेक्ट को उपलब्ध कराई गई है उसके अनुसार उसमें बिलिंग दिनांक का भी जिक्र नहीं है. तो किस आधार पर भुगतान करवाया गया?

संभावित गड़बड़ी की आशंका
1. जिस तरह से फर्जी खरीदी का खेल खेला गया है उससे एक बात साफ है कि इसमें बिना किसी बड़े अधिकारी की संलिप्तता के अधीक्षक इतनी हिम्मत नहीं जुटा सकते. सो इसमें लाखों रुपए कमिशन का खेल खेले जाने से इंकार नहीं किया जा सकता.
2. स्कूल शिक्षा मंत्री के प्रभार वाले इस जिले में उन्हीं के विभाग में बड़ी गड़बड़ी के पीछे बड़े सप्लायरों का खेल भी हो सकता है.

क्या कहता है प्रशासन
इस संबंध में दंतेवाड़ा कलेक्टर से उनका पक्ष जानने के लिए तीन बार मोबाइल कॉल किया जिसे रिसीव नहीं किया गया. वहीं राजीव गांधी शिक्षा मिशन के एपीसी वित्त आरएस गुप्ता ने मोबाइल से चर्चा पर जानकारी दी कि किसी भी प्रकार की खरीदी की कोई सूचना जिला कार्यालय को नहीं है. आईबीटी के तहत राशि का आबंटन सीधे आश्रम अधीक्षकों को किया गया है. उन्होंने कहा कि खरीदी के संबंध में आश्रम अधीक्षक ही सही जानकारी दे सकेंगे.

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