नमो और ममो में फर्क क्या है ?

Thursday, June 5, 2014

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एफडीआई

जे के कर
26 मई को मोदी सरकार के शपथ ग्रहण के बाद 30 मई को ही खबर आ गई कि रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ाये जाने का प्रस्ताव आ रहा है. खबरों के मुताबिक रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा 26 फीसदी से बढ़ाकर 100 फीसदी करने की तैयारी पूरी हो चुकी है. इसके लिए वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने कैबिनेट नोट सभी एजेंसियों के पास राय लेने के लिए भेज दिया है.

मोदी सरकार के इस कदम की समीक्षा की जानी चाहिये क्योंकि उन्होंने भारी बहुमत से सत्ता संभाली है तथा सत्ता संभालने के पहले से ही प्रचार किया जा रहा था कि देश के लिये अच्छे दिन आने वाले हैं. यदि इससे अच्छे दिन आते हैं तो इसकी तारीफ की जानी चाहिये कि महज चार दिनों में ही सरकार ने इस दिशा में पहल करना शुरु कर दिया.

गौर करने वाली बात यह भी है कि रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की हवा फैलते ही रक्षा उत्पादन में संलग्न सरकारी तथा निजी क्षेत्र के कंपनियों के शेयर के भाव बढ़ने लगे. आर्थिक खबरों को छापने वाली बिजनेस स्टैंडर्ड की खबरों के अनुसार “रक्षा उद्योग से जुड़ी कंपनियों के शेयर आज 20 फीसदी तक उछल गए. सरकार के क्षेत्र में मंजूरी मार्ग से 100 फीसदी एफडीआई अनुमति देने के प्रस्ताव की खबर से इन कंपनियों के शेयरों में तेजी आई. एस्त्रा माइक्रोवेव प्रोडक्ट्स का शेयर 19.99 फीसदी की तेजी के साथ 111.65 रुपये प्रति इक्विटी पर आ गया जबकि वालचांदनगर इंडस्ट्रीज का शेयर 9.97 फीसदी मजबूत होकर 100.90 रुपये प्रति इक्विटी पर बंद हुआ. इसी प्रकार, बीईएमएल का शेयर 6.98 फीसदी की तेजी के साथ 653.35 रुपये प्रति इक्विटी पर चला गया. पीपावाव डिफेंस ऐंड आफशोर इंजीनियरिंग 4.97 फीसदी चढ़कर 67.60 रुपये तथा भारत इलेक्ट्रानिक्स 2.35 फीसदी मजबूत होकर 1,611.45 रुपये प्रति इक्विटी पर चला गया.”

हम मोदी सरकार के रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा देने से संबंधित खबरों की समीक्षा करने के लिये इन कंपनियों को ही प्रस्थान बिंदु मान कर चलते हैं. एक कहावत है कि कई बार बाजार अच्छे बुरे में फर्क बता देता है. हम एक-एक करके इन कंपनियों के विस्तार में जाते हैं. खबरों के अनुसार बीईएमएल के शेयर के भाव 6.98 फीसदी बढ़े थे.

गौर करने वाली बात यह है कि यह बीईएमएल बैंगलुरू की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी है. जिसका संचालन रक्षा मंत्रालय करता है. इसी तरह से भारत इलेक्ट्रानिक्स भी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी जो रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत काम करती है. गहराई से अध्ययन करने से जानकारी मिलती है कि पीपावाव डिफेंस ऐंड आफशोर इंजीनियरिंग महाराष्ट्र की निजी क्षेत्र की रक्षा सामग्री का उत्पादन करने वाली तथा वालचांदनगर इंडस्ट्रीज भी महाराष्ट्र की निजी क्षेत्र की रक्षा उत्पादन कंपनी है.

इन जानकारियों के माध्यम से मामला और उलझ गया है. यदि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आ रहा है तो उससे सरकारी तथा निजी क्षेत्र की कंपनियों के शेयर के भाव क्यों बढ़े ? निश्चित तौर पर इसका यह अर्थ है कि निवेश हमारे देश में पहले से कार्यरत कंपनियों में होने जा रहा है चाहे वह सरकारी हो या निजी क्षेत्र की. ऐसा ही मनमोहन सरकार के दौर में दवा उद्योग में हो चुका है. जब एबाट नामक विदेशी कंपनी ने भारत के पीरामल समूह को खरीद लिया था.

इसी तरह से भारत के अग्रणी दवा कंपनी रैनबैक्सी को जापान के सेंक्यों ने खरीद लिया था. गौर करने वाली बात यह है कि दवा क्षेत्र में सरकारी राह से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत है. आखिरकार हमारे देश में इसी तरह से कई विदेशी दवा कंपनियों ने आधिपत्य जमा लिया है. जाहिर है कि अब उनके लिये भारत में होने वाली बीमारियों के लिये दवा बनाने से ज्यादा पुनीत कार्य मुनाफा देने वाली दवा बनाने में है. वैसे ही भारत के लोग टीबी, मलेरिया तथा अतिसार से मर रहे हों.

रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर मोदी सरकार की क्या नीति है, उसका पूरी तरह से रहस्योद्घाटन अभी होना बाकी है परन्तु यह तय है कि यदि पहले से कार्यरत कंपनियों में ही निवेश किया जाता है तो देश को क्या हासिल होगा.

विदेशी निवेश से यदि देश में नये कारखाने लगते हैं तथा इसी बहाने से नये प्रौद्योगिकी का आगमन होता है तो इससे बेरोजगारों के रोजगार मिलेगा तथा अच्छे दिन अवश्य आयेंगे. इसके स्थान पर यदि बने बनाये उद्योगों में निवेश करके मुनाफा देश के बाहर ले जाया जाता है तो इसमें तथा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के मैनचेस्टर से कपड़े लाकर भारतीय बुनकरों को बर्बाद करने में क्या फर्क रह जायेगा ?

एक मुद्दा और है, जिस पर गौर किया जाना चाहिये. वह है सुरक्षा से जुड़ा हुआ मुद्दा. देश के सुरक्षा में लगने वाले उपकरणों को बाहर से खरीद लेना एक बात है तथा रक्षा उत्पादन के विदेशी हाथों में सौंप देना अलग बात है. जब हथियार पर ही हमारा नियंत्रण नहीं रह जायेगा, जब उसमें लगने वाले गोले-बारूद का उत्पादन भी हमारे नियंत्रण से बाहर चला जायेगा तो कैसे उम्मीद की जा सकती है कि देश के सुरक्षा के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता है.

मनमोहन सिंह की सरकार ने दवाओं के क्षेत्र में जो कार्य किया है, यदि वही रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में मोदी की सरकार करे तो लोग पूछेंगे ही कि भाई, ममो यानी मनमोहन सिंह और नमो यानी नरेंद्र मोदी की सरकार में फर्क क्या है ?

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