इको फ्रेंडली गणेश प्रतिमाएं

Monday, September 9, 2013

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इको फेंडली गणेश प्रतिमा

भोपाल | एजेंसी: नारियल, काजू, बादाम सहित दूसरे मेवों के अलावा मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमाएं भक्तों को आकर्षित कर रही हैं. श्रद्धालु गणेशोत्सव पर अपने घरों में इको फ्रेंडली प्रतिमाएं स्थापित कर रहे हैं.

मध्य प्रदेश के प्रमुख शहरों से लेकर गांव की गलियों तक में इको फ्रेंडली सामग्री से बनी प्रतिमाओं को स्थापित करने के लिए चलाए जा रहे विभिन्न जनजागृति अभियानों का असर गणेशोत्सव में नजर आ रहा है. बाजार में मिट्टी और प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी गणेश प्रतिमाएं भी हैं, मगर श्रद्घालु इस बार उन सामग्रियों से बनी प्रतिमाएं खरीदने से परहेज कर रहे हैं, जो हानिकारक रसायनों से बनी हैं.

गैर सरकारी संगठन नर्मदा समग्र ने लोगों में जाग्रति लाने के मकसद से राजधानी भोपाल सहित अन्य स्थानों पर ‘आओ बनाएं अपने हाथों से मूर्ति’ अभियान चलाया है. भोपाल के शिवाजी नगर क्षेत्र में चलाए जा रहे अभियान के तहत विभिन्न स्कूलों के बच्चे प्रतिमाएं बनाने का प्रशिक्षण ले रहे हैं.

नर्मदा समग्र के अशोक पाटीदार ने बताया कि नर्मदा नदी के तट पर सभी स्थानों पर मूर्ति बनाओ अभियान चलाया जा रहा है. इसका मकसद लोगों में पर्यावरण के प्रति जागृति लाना है, साथ ही यह बताना है कि प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनाई गई मूर्ति पर्यावरण के लिए हानिकारक है. जब इन मूर्तियों को पानी में विसर्जित किया जाता है तो रसायनों से जलीय जंतुओं को नुकसान पहुंचता है.

पाटीदार ने बताया कि एक तरफ बच्चों ने मिट्टी से मूर्ति बनाने का प्रशिक्षण लेकर अपने घरों में अपने हाथ से बनाई गणेश प्रतिमाएं स्थापित की हैं, वहीं बाजारों से भी इको फ्रेंडली सामग्री से बनी मूर्तियां श्रद्घालु खरीद रहे हैं.

राजधानी भोपाल में गायत्री शक्तिपीठ ने भी नारियल, बादाम, काजू व सूखे मेवों से बनी मूर्तियां श्रद्घालुओं को उपलब्ध कराई हैं. पीठ के श्याम किशोर ने आईएएनएस को बताया कि श्रद्घालुओं में ऐसी मूर्तियां अपने घर में स्थापित करने की ज्यादा रुचि देखने को मिल रही है, जो पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने वाली और जल शुद्घिकरण की सामग्री से बनी हैं.

श्रद्घालु आशीष शर्मा कहते हैं कि ईश्वर की आराधना करने वाला कोई भी व्यक्ति ऐसी सामग्री से बनी प्रतिमाएं नहीं खरीदना चाहेगा जो पर्यावरण के लिए हानिकारक हो. यही कारण है कि लोग अपने बच्चों को मिट्टी से मूर्ति बनाने का प्रशिक्षण दिला रहे हैं और रासायनिक पदार्थो से बनी मूर्तियां खरीदने से बच रहे हैं.

गणेशोत्सव के दौरान मिट्टी और सूखे मेवे से बनी मूर्तियों की ओर भक्तों का बढ़ता आकर्षण पर्यावरण की दृष्टि से सकारात्मक संदेश है और यदि यह सिलसिला आगे भी जारी रहा तो विभिन्न पर्वो, त्योहारों और अवसरों पर नदियों, जलाशयों में प्रतिमा विर्सजन से होने वाली समस्या से निपटने में बड़ी मदद मिलेगी.

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