उदित राज ने दी शंकराचार्यों को चुनौती

Saturday, August 10, 2013

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उदित राज

रायपुर | विशेष संवाददाता: अनुसूचित जाति-जनजाति संगठनों के अखिल भारतीय अध्यक्ष सह इंडियन जस्टिस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. उदित राज ने देश के चारों शंकराचार्यों को उनसे संवाद में जीतने की चुनौती दी है.

रायपुर में उन्होंने कहा कि, “जाति प्रथा आज भी समाज में जीवित है. देश में चारों शंकराचार्य ब्राह्मण ही है भले उनसे ज्यादा ज्ञानी लोग अन्य जातियों में भी क्यों न हो लेकिन वे शंकराचार्य की उपाधि नहीं ग्रहण कर सकते. मैं चारों शंकराचार्यों को चुनौती देते हुए कहता हूं कि मुझसे संवाद कर जीत जाएं तो मैं राजनीति एवं दलित आंदोलन छोड़ दूंगा,”.

डॉ. राज ने कहा कि देश में केवल 15 प्रतिशत सवर्ण है किन्तु उनको 50 फिसदी आरक्षण दिया जा रहा है जबकि दलित एवं आदिवासी आज भी देश में पिछड़े हुए हैं. उन्होंने कहा कि वर्तमान में देश की तरक्की तभी संभव है जब यहां निजी क्षेत्रों के रोजगार में भी आरक्षण लागू हो, क्यों कि ऐसा करने से देश में लगातार सरकारी नौकरी की
घटती संख्या के बीच उफनी बेरोजगारी की समस्या से निजात मिल पाएगा. उनके अनुसार देश के विकास के लिए आरक्षण एक बेहतर विकल्प रहा है

डॉ राज ने राजधानी में अनुसूचित जाति-जनजाति संगठन, छत्तीसगढ़ राज्य इकाई द्वारा आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने के पूर्व पत्रकारों से चर्चा करते हुए कहा, “समूचे देश में शासकीय नौकरियंा कम होती जा रही है. साथ ही जो बची भी हैं तो उनमें ठेकेदारी प्रथा का बोलबाला है. इस तरह पहले से ही दमित एससी, एसटी एवं अन्य आदिवासी युवकों के सामने रोजगार का संकट गहरा होता जा रहा है. निजी क्षेत्रों में आरक्षण लागू हो जाने से कुछ हद तक समस्या से छूटकारा मिल जाएगा”.

गौरतलब है कि यह देश व्यापी संगठन विगत कई वर्षों से निजी क्षेत्र के लिए विभिन्न राज्यों में कार्यक्रम कर मांग
उठा रहा है. उन्होंने बताया कि पदोन्नती में भी आरक्षण लागू करने का विधेयक राज्यसभा में पारित पिछले वर्ष हो चुका लेकिन लोकसभा में होना बाकि है, यह ११७ वां संविधान संशोधन इसी सत्र में हो जाना चाहिए था.

देश की आंतरीक सुरक्षा को खतरा मानने वाले नक्सलवाद पर डॉ राज ने कहा कि वे लोग ही नक्सली बने जिनको जनतंत्र का कोई लाभ नहीं मिला, इसका समाधान भी आदिवासियों के विकास से ही संभव हो पाएगा. उन्होंने ताया, “जहां तक मेरी जानकारी जाती है माओवादियों में भी दलित एवं आदिवासी ही नीचे कैडर बेस है. एवं उनका
नेतृत्वकर्ता वर्ग सवर्ण ही है. वहां भी दलित एवं आदिवासी शोषित ही है.”

हांलाकि उन्होंने राजनीति पर किसी भी टिप्पणी नहीं की. “मैं यहां राजनीति पर बात नहीं करने आया हूं,” राज्य में आगामी चुनाव में उनकी भूमिका के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने जबाव दिया.

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  • INSAAN

    उदित राज चारों शंकराचार्यों से संवाद करने से पहले ही हार चुके हैं! ऐसा घमंड और मन में शंकराचार्य के प्रति घोर अपमान उदित राज में तीव्र दुर्बलता के प्रतीक हैं| ऐसे दुर्बल चरित्र वाले लोग भारतीय समाज को सदैव क्षति ही पहुंचाते रहे हैं| यदि ये लोग दलित, आदिवासी एवं अनुसूचित जाति का ठीक से नेतृव कर पाते तो आज तथाकथित स्वतंत्रता के पैंसठ वर्षों बाद इन लोगों की ऐसी दुर्दशा कदापि न होती| दलित आन्दोलन केवल एक चतुर योजना है जो केवल उदित राज जैसे लोगों को लाभान्वित
    कर समाज में अनैतिकता व अन्य विकारों को जन्म देती है| जन जातियों से ऊपर उठ प्रत्येक व्यक्ति एक सम्मानित भारतीय नागरिक होना चाहिए जो अपनी योग्यता अनुसार आर्थिक व सामाजिक गतिविधियों में लिप्त देश को अपना व्यापक योगदान दे पाये|

  • Banwari Lal Dasfi

    बिलकुल सही कहा है उदित राज जी ने।वो एक काबिल व्यक्ति है।