दिल है कि मानता नहीं

Sunday, February 8, 2015

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मोदी लहर पर लगाम

रायपुर | अन्वेषा गुप्ता: दिल्ली विधानसभा चुनाव के एक्जिट पोल को मानने के लिये दिल तैयार नहीं हो रहा है. एक भी एक्जिट पोल ऐसा नहीं है जो भाजपा के सत्तासीन होने की संभावना व्यक्त करता है. सभी एक्जिट पोल डंके के चोट पर एलान कर रहें हैं कि इस बार भी दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने जा रही है. आम आदमी पार्टी की सरकार बनने की संभावना से ज्यादा चौकाने वाली बात है कि भाजपा के अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े को अरविंद केजरीवाल के माफिक आम आदमी रोक ले.

शनिवार को जारी किये गये एक्जिट पोल के अनुसार भारतीय जनता पार्टी भाजपा को 17-35 सीटें प्राप्त हो सकती हैं. दिल्ली पर 15 वर्षो तक शासन कर चुकी कांग्रेस की स्थिति इस चुनाव में बहुत बुरी दिख रही है, और एक्जिट पोल परिणामों में या तो उसे एक भी सीट नहीं दी गई है, या फिर बमुश्किल चार सीटें उसे दी गई हैं. किसी भी पार्टी को सरकार बनाने के लिए 70 सदस्यीय विधानसभा में कम से कम 36 सीटों की जरूरत होगी.

टुडेज चाणक्य ने आप को 48 सीटें दी है, और भाजपा को 22 सीटें दी है. चाणक्य के सर्वे में कहा गया है कि आप और भाजपा की लड़ाई में कांग्रेस कहीं नहीं टिक पाई. एबीपी-नील्सन के सर्वे में आप को 39 सीटें और भाजपा को 28 सीटें दी गई हैं. इंडिया टुडे-सिसरो पोल ने आप को 35-43 सीटें दी हैं, जबकि भारतीय जनता पार्टी को 23-29 सीटें. एनडीटीवी के सर्वे में कहा गया है कि आप 38 सीटें जीत सकती है, जबकि भाजपा को 29 सीटें मिल सकती हैं. एक्सिस-एपीएम पोल में हालांकि आप को 53 सीटें और भाजपा को 17 सीटें दी गई हैं. टाइम्स नाउ- सी-वोटर के सर्वेक्षण में कहा गया है कि आप 31-39 सीटें जीत सकती है, जबकि भाजपा को 27-35 सीटें मिल सकती हैं. टुडेज चाणक्य एक्जिट पोल में यह भी कहा गया है कि 53 प्रतिशत मतदाता महसूस करते हैं कि केजरीवाल दिल्ली के सबसे उपयुक्त मुख्यमंत्री होंगे, जबकि 36 प्रतिशत लोगों ने भाजपा की मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार किरण बेदी को पसंद किया है.

इस बार के दिल्ली विधानसभा के चुनाव प्रचार की खासियत रही है कि प्रधानमंत्री मोदी ने स्वंय धुआधार प्रचार किया. प्रधानमंत्री के साथ उनके मंत्रिमंडल के सहयोगियों तथा दिगर राज्यों के भाजपा नेता तथा कार्यकर्ताओं ने दिल्ली में डेरा डाल रखा था. साल 2014 की सबसे बड़ी घटना भारतीय राजनीति में नरेन्द्र मोदी का उदय होना है. जिसके आंधी में कांग्रेस से लेकर आम आदमी पार्टी तक को भयानक हार का सामना करना पड़ा था.

प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने सबसे पहले भारतीय विदेश नीति पर ध्यान दिया. जिससे पड़ोसी मुल्कों में भारत का वजन बढ़ा तथा चीन, जापान से लेकर अमरीका तक भारत में निवेश करने के लिये मैराथन दौड़ लगाते नजर आने लगे. प्रधानमंत्री मोदी के इस छोटे से कार्यकाल में ही लाखों करोड़ो रुपयों के विदेशी निवेश के प्रस्ताव आये. जाहिर है कि इससे भारतीय शेयर बाजार अपने उफान पर आ गया. दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मोदी की जापान तथा अमरीका के यात्रा ने नये आयाम कायम किये. प्रधानमंत्री मोदी ने अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को गणतंत्र दिवस के परेड में बुलाकर पड़ोसी चीन की नींद हराम कर दी. वहीं, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा से पाकिस्तानी खेमे में मायूसी छा गई.

घरेलू मोर्चे पर भी प्रधानमंत्री मोदी ने बुलेट ट्रेने चलाने से लेकर सफाई अभियान तक में आम जनता की वाहवाही ही लूटी है. महाराष्ट्र, झारखंड, जम्मू-कश्मीर के चुनावों में इसी के कारण भाजपा का परचम लहराया. अब, उसी भाजपा को एक्जिट पोल दिल्ली में हारता हुआ बता रहें हैं जो गले के नीचे नहीं उतर रहा है. आखिरकार प्रधानमंत्री मोदी ने अपने छोटे से कार्यकाल में अपने छवि को बेहतर ही बनाया है उसके बावजूद उनका प्रभाव यदि दिल्ली की जनता पर नहीं पड़ा तो सोचना पड़ेगा कि केजरीवाल के पास ऐसा कुछ है जो जनता को अफनी ओर ज्यादा आकर्षित करता है.

दिल्ली में अपने 49 दिनों के अति छोटे से कार्यकाल में अरविंद केजरीवाल ने पानी-बिजली के बिल तथा भ्रष्ट्राचार को कम करने के वादे को कुछ हद तक अमलीजामा पहनाया. हालांकि, जन लोकपाल कानून को बनाने में संख्या बल कम होने के कारण उन्होंने इस्तीफा दे दिया था. जिसका खामियाजा आम आदमी पार्टी को 2014 के लोकसभा चुनाव में भुगतना पड़ा. लोकसभा चुनाव के बाद इस बात की घोषणा कर दी गई कि आम आदमी पार्टी के दिन लद गये हैं तथा जनता का उससे मोहभंग हो गया है. उसके बाद अचानक दिल्ली के विधानसभा चुनाव में आप की सरकार बनने का मीडिया का दावा चौंकाने वाला है.

राजनीतिक अर्थशास्त्र के नजरिये से देखे तो भाजपा ने अपने इस कार्यकाल में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के द्वारा शुरु किये गये आर्थिक सुधारों को तेजी तथा निर्भयता ने लागू किया. जिसके कारण घरेलू तथा विदेशी एकाधिकार प्राफ्त घराने उसके समर्थन में आ गये. इसकी तुलना में अपने 49 दिनों के कार्यकाल में आम आदमी पार्टी ने समाज में क्रांतिकारी बदलाव करने के स्थान पर मध्यम तथा निम्न वर्ग को राहत प्रदान की. कई जानकारों की राय हमसे जुदा हो सकती है परन्तु कुल मिलाकर आम आदमी पार्टी बड़े घरानों का विरोध करने वाली पार्टी निकली. जिसे मध्यम वर्गीय विचारधारा का प्रतिनिधी माना जा सकता है. क्लासिकल मार्क्सवादी नजरिये से इसे निम्न पूंजीवादी विचारधारा का वाहक भी कहा जा सकता है.

आज का युग नवउदारवाद का युग है. जिसमें आम आदमी पार्टी की विचारधारा भी विजयी हो सकती है इसकी संभावना क्षीण है. इन तमाम तर्को के बाद भी यदि 10 फऱवरी के नतीजे आप की सरकार बनाते हैं तो कहना पड़ेगा कि मध्यम वर्ग ने फौरी तौर पर नवउदारवाद पर जीत हासिल की है.

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