कॉफी की खेती करेगा बंगाल

Sunday, June 15, 2014

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काफी की खेती.

कोलकाता | एजेंसी: विश्वभर में दार्जिलिंग चाय के लिए चर्चित पश्चिम बंगाल अब कॉफी की खेती की तैयारी कर रहा है. यह खेती राज्य सरकार और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खड़गपुर के संयुक्त प्रयास से की जाएगी.

यह वेस्ट बंगाल कांप्रीहिंसिव एरिया डेवलपमेंट कार्पोरेशन का विचार है और इसे आईआईटी के साइंस एंड टेक्नोलाजी एंटरप्रेन्योर्स पार्क की तकनीकी मदद उपलब्ध हो रही है. इस पायलट परियोजना के तहत चाय और कॉफी की खेती पुरुलिया जिले के अयोध्या हिल्स में की जाएगी.

अपनी जैव विवधिता के लिए प्रसिद्ध अयोध्या हिल्स 610 मीटर में फैला है और झारखंड के डाल्मा हिल्स का विस्तार है. यह कोलकाता से करीब 260 किलोमीटर दूर है.

दार्जिलिंग की तर्ज पर इलाके को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए कुमारी कानन की 10 एकड़ भूमि को चाय और कॉफी की खेती के लिए तैयार किया जा रहा है.

डब्ल्यूबीसीएडीसी के अध्यक्ष सुभाशीष बाटाब्याल ने बताया, “अयोध्या हिल्स को दार्जिलिंग की तरह पर्यटन का केंद्र बनाने की योजना है जहां पर्यटन और चाय उद्योग प्रसिद्ध हुआ है. पर्यटन को बढ़ावा देने के अतिरिक्त इसका लक्ष्य लोगों को जीवनयापन के विकल्प उपलब्ध कराना है. परियोजना सफल हो जाने पर हम खेती के इलाके का विस्तार करेंगे.”

एसटीईपी से मान्यता प्राप्त इको यश टेक्नोलॉजी की सेवा इस परियोजना के लिए ली जा रही है.

परियोजना प्रमुख सौमन पालित ने बताया, “आईआईटी में हम गैर पारंपरिक इलाके में चाय और कॉफी की खेती की कला में विशारद हासिल करने के लिए काम कर रहे हैं और हम यहां समान प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर रहे हैं. चाय की और खेती पर जहां ज्यादा जोर है, वहीं पहली बार बंगाल में कॉफी की व्यावसायिक खेती की जा रही है.”

डब्ल्यूबीसीएडीसी वेस्ट बंगाल टी डेवलपमेंट कार्पोरेशन ने 1997 में चाय की खेती का काम शुरू किया था, लेकिन वह इसमें असफल रही थी.

पालित ने कहा, “पायलट परियोजना की शुरुआत अच्छे से की गई थी, लेकिन उचित तकनीक न होने की वजह से यह फलफूल नहीं पाई. लेकन अब हम इसकी बारीकियां जानते हैं.”

प्रत्येक एकड़ में दो-तीन लाख रुपये निवेश किए जाने का अनुमान है और पालित का कहना है कि चाय और कॉफी के पौधे की खेती को इसलिए चुना गया है क्योंकि इसमें उपज लगातार होती रहती है.

अयोध्या हिल्स में गोशाब्रु, पुरुलिया पंप स्टोरेज प्रोजेक्ट और झरने मौजूद हैं, लेकिन नक्सल गतिविधियों की वजह से यह पर्यटकों के बीच आकर्षण खो बैठा है.

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