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Sunday, June 1, 2014

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छत्तीसगढ़ बनाम बाहरी

कनक तिवारी
स्थानीय बनाम बाहरी का वायरस राजनीति और लोकजीवन के छद्म दिमागों से निकल कर बीमारी की तरह फैलने को बेताब होता रहता है. छत्तीसगढ़ सहित अन्य प्रदेशों में नारा उछलता रहा कि स्थानीय का ही राज होगा, बाहरी लोगों का नहीं. इतिहास को अंकगणित के पहाड़े की पुस्तक बनाया जाता है. ढूंढ़ा जाता रहा कि किसके पुरखे कितने बरस पहले छत्तीसगढ़ की धरती पर आए.

जबान पर छत्तीसगढ़ी भाषा (बोली) प्राकृतिक मुहावरे की तरह चढ़ी है अथवा नहीं. शब्दकोश से विशेषण निकालकर उन्हें चस्पा किया जाता है. ’परदेशी’ ’बाहरी’ ’शोषक’ ’दुश्मन’, ’गैरछत्तीसगढ़िया’ जैसे असंवैधानिक शब्दों से भी नवाजा जाता रहा है. कथित बाहरी लोगों में वे भी शामिल हैं, जो स्वतंत्रतासंग्राम सैनिक, सरहदों की रक्षा के शहीदों के परिवार और छत्तीसगढ़ की धरती की पहचान बनाने के अशेष सांस्कृतिक हस्ताक्षर हैं.

छत्तीसगढ़ में भी अरसे से कथित बाहरी लोगों का ही वर्चस्व रहा है. अमूमन सभी ब्राह्मण परिवार-चाहे गंगापारी हों या सरयूपारी-उत्तरप्रदेश से ही आए हैं. राजनीति और साहित्य संस्कृति सहित उद्योगों में भी उनका वर्चस्व रहा है. यही हाल प्रतिष्ठित कई क्षत्रिय और वैश्य परिवारों का भी है.

रविशंकर शुक्ल, श्यामाचरण शुक्ल, विद्याचरण शुक्ल, राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल, हरिप्रसाद शुक्ल, देवीप्रसाद चैबे, रवीन्द्र चैबे, कमलनारायण शर्मा, कन्हैयालाल शर्मा, डॉ. श्रीधर मिश्र, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, सुधीर मुखर्जी, मदन तिवारी, पद्मावती देवी, दिलीप सिंह जूदेव, देवेन्द्र कुमारी देवी, रामचन्द्र सिंहदेव जैसे सैकड़ों छोटे बड़े नेता आखिर मूल वंश परम्परा के अनुसार छत्तीसगढ़ के तो नहीं हैं. सत्ता व्यवस्था पर आरोप लगाने वाले मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को भी उत्तरप्रदेश से आया वंशज कहते हैं. यही आरोप नेता प्रतिपक्ष टी. एस. सिंहदेव पर है.

वैश्य कुल के प्रभावशाली नेताओं में सेठ नेमीचंद जैन, लखीराम अग्रवाल, मोहनलाल बाकलीवाल, श्रीकृष्णा अग्रवाल, रामकुमार अग्रवाल, बृजमोहन अग्रवाल, अमर अग्रवाल, राजेश मूणत, इंदरचंद जैन आदि संकीर्ण अर्थों में छत्तीसगढ़ का मूल निवासी होने का दावा क्यों नहीं कर सकते? अन्य कई जातियों, उपजातियों और समूहों के जनप्रतिनिधि मसलन पंढरीराव कृदत्त, अशोक राव,जे. पी. एल. फ्रांसिस, डॉ. जयराम अय्यर, भारतचंद्र काबरा, बंदेअली फातमी कैसे समझाएंगे कि वे छत्तीसगढ़िया कोख से होने के बाद भी किस परिभाषा के अंतर्गत मूल स्थानीय नहीं समझे जाएंगे.

पत्रकारिता के सहारे कांग्रेस की राजनीति में पिछले चालीस वर्षों से हावी मोतीलाल वोरा राजस्थान से ही छत्तीसगढ़ आए थे. छत्तीसगढ़ के सभी बड़े दैनिक समाचार पत्रों के स्वामी मोटे तौर पर राजस्थान के ही मूल निवासी प्रचारित किए जाते हैं. तथाकथित पिछड़ी जातियों के बहुत से सूरमा पूर्वजों का इतिहास उलटने पलटने पर पाएंगे कि अंगरेज़ी ज़माने के गज़ेटियर और इतिहासवृत्तांत बताते हैं कि उनमें से अधिकांश उत्तरप्रदेश से ही आए हैं.

छत्तीसगढ़ी अस्मिता की अगुवाई करने वाले चंदूलाल चंद्राकर, पुरुषोत्तम कौशिक,खूबचंद बघेल, बृजलाल वर्मा, हीरालाल सोनबोईर, केजूराम, रमेश बैस, वासुदेव चंद्राकर, प्यारेलाल बेलचंदन, बिसाहूराम यादव, ताम्रध्वज साहू, बैजनाथ चंद्राकर, चंद्रशेखर साहू, धनेन्द्र साहू, भवानीलाल वर्मा वगैरह के पीछे अगर कोई संकीर्ण ऐतिहासिक दृष्टि लेकर छानबीन करने पर आमादा हो जाए तो सिद्ध करेगा कि सबके पूर्वज अन्य प्रदेशों से आए थे.

छत्तीसगढ़ के किराना, सराफा, यातायात और शिक्षा व्यापार पर ऐसे लोगों का कब्जा है जिन्हें छत्तीसगढ़ का किताबी तौर पर मूल निवासी कहा जाता है. ऐतिहासिक दृष्टि से ऐसा नहीं माना जाता. खुज्जी, धमतरी, तखतपुर आदि के विधायक सिख परिवारों से रहे हैं. उनका पंजाब से रिश्ता संदेह की वस्तु नहीं है. मोहम्मद अकबर, बदरुद्दीन कुरैशी, ताहिर भाई, हमीदुल्ला खान, मुश्ताक अली वगैरह में लोग अपना जनप्रतिनिधि ढूंढ़ते रहे हैं. जातीय और नस्लीय शोधकर्ता उन्हें किसी न किसी दूसरे प्रदेश का मूल निवासी बना ही सकते हैं. छत्तीसगढ़ के जनजीवन पर पड़ोसी राज्यों महाराष्ट्र, बिहार, आंध्रप्रदेश और ओडिसा का गहरा असर है. दक्षिण बस्तर के आंध्रप्रदेश से सटे इलाकों में तेलगु भाषा के चमत्कारी प्रभाव के कारण आयातित नक्सली नेतृत्व पूरी तौर पर हावी है.

राजनांदगांव से भौगोलिक निकटता के कारण बी. एन. सी. मिल्स के आंदोलन का नेतृत्व नागपुर के कॉमरेड रुईकर, वसंत साठे और वी.वाई.राजिमवाले वगैरह ने वर्षों तक किया. छत्तीसगढ़ के साहित्य जगत के वरिष्ठ सूरमा माधवराव सप्रे और ख्यातनाम हस्ताक्षर गजानन माधव मुक्तिबोध छत्तीसगढ़ के मूल निवासी नहीं कहे जा सकते, लेकिन उन्होंने साहित्य में छत्तीसगढ़ को अमर किया.

बैकुंठपुर में जन्मे डॉ. कांतिकुमार जैन, दुर्ग-सुत अशोक वाजपेयी, बिलासपुर-पुत्र श्रीकांत वर्मा, जगदलपुर के शानी तथा मेहरुन्निसा परवेज़, राजनांदगांव में जन्मे डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र, विनोद कुमार शुक्ल तथा जयप्रकाश साव, बिलासपुर के प्रमोद वर्मा, खैरागढ़ के पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी तथा रमाकांत श्रीवास्तव, रायगढ़ के लोचनप्रसाद पांडे, मुकुटधर पांडे, चिरंजीव दास और प्रभात त्रिपाठी, अम्बिकापुर की कुंतल गोयल और विजय गुप्त तथा बस्तर के सुन्दरलाल त्रिपाठी और लाला जगदलपुरी की लेखनी ने छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय पहचान दिलाई. कौन जड़ों को खोदकर देखे कि उनके पूर्वज कहां के रहने वाले थे और क्यों छत्तीसगढ़ आए थे?

रायपुर के हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ की लोकनाट्य कला को अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि दिलाई. आधुनिक प्रभावों के समर्थक होने के बावजूद वे मन, वचन और कर्म से छत्तीसगढ़ की संस्कृति के प्रति एकनिष्ठ रहे.

पत्रकारिक कलम थामे मायाराम सुरजन, गुरुदेव चैबे, रम्मू श्रीवास्तव, डी. पी. चैबे, रमेश याज्ञिक, शरद कोठारी, बसंत तिवारी, किरीट दोषी, रमेश नय्यर, ललित सुरजन, सुनील कुमार, जगदीश उपासने, त्रिलोक दीप, राजेश गनोदवाले, कुमार साहू, सुशील शर्मा, यशवंत धोटे, दिवाकर मुक्तिबोध, गिरीश पंकज वगैरह के पीछे कौन पड़े कि वे कब, क्यों और कहां से छत्तीसगढ़ में आए.

हॉकी में एरमन बेस्टियन तथा सबा अंजुम वगैरह खिलाड़ियों ने छत्तीसगढ़ को अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा दिलवाई. उनकी देह और उनकी हॉकी स्टिक से छत्तीसगढ़ी धरती की सुगंध आती रही.

यह अलग बात है कि राजनेता तथा कवि पवन दीवान, श्रमसाध्य लेखक परदेसीराम वर्मा, वरिष्ठ कवि विमल पाठक, प्राध्यापक डॉ. विनय पाठक, मुक्त कॉलम लेखक नन्दकिशोर शुक्ल, हास्य कवि डॉं. सुरेन्द्र दुबे, मंचीय कवि मुकुन्द कौशल तथा लक्ष्मण मस्तूरिहा, बुजुर्ग प्राध्यापक पालेश्वर शर्मा और छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के अध्यक्ष दानेश्वर शर्मा आदि छत्तीसगढ़ी भाषा और छत्तीसगढ़ियापन के लिए लगातार सचेष्ट रहने की पहचान बनाए रखना चाहते हैं. जातिशोधक तत्व इन्हें भी अन्यप्रदेश से आया सिद्ध करते रह सकते हैं.

किशोर साहू ने फिल्मों के अशेष निर्माता बनकर राजनांदगांव और दुर्ग का भी नाम रोशन किया. यही यश रायपुर और भिलाई के अनुराग बसु बढ़ा रहे हैं. रायपुर के प्रसिद्ध संगीतज्ञ परिवार अरुण कुमार सेन और अनीता सेन के यशस्वी पुत्र शेखर सेन संगीत और कला के क्षेत्र में झंडा गाड़े हुए हैं. इन सबका आनुवंशिक मूल छत्तीसगढ़ में यदि नहीं भी स्थापित हो तो इन लोगों ने छत्तीसगढ़ को स्थापित कर ही दिया है. डॉ. पुखराज बाफना, शमशाद बेगम, फुलवासन बाई, भारती बंधु और अनुज शर्मा आदि को भारत शासन द्वारा पद्मश्री का सम्मान मिला. उनके मूल में छत्तीसगढ़ का ही यश तो है.

छत्तीसगढ़ के लोग सम्पत्ति-उद्यमी नहीं हैं कि उनके पास बड़ी पूंजी हो और अरबपति बन जाएं. छत्तीसगढ़ के बड़े ठेके ज़्यादातर आंध्रप्रदेश के ठेकेदार कबाड़े जा रहे हैं. विद्युत और लोहे के कारखानों पर हरियाणा, राजस्थान, आंध्रप्रदेश और अन्य इलाकों के लोगों का दबदबा है. स्थानीय किसानों की छोटी छोटी जोत की जमीन को मिटाकर शहरों के निकट बड़े बड़े फॉर्म हाउस बन रहे हैं. इनके जरिए गुजरात, पंजाब और हरियाणा के करोड़पति छत्तीसगढ़ी ग्रामीण व्यवहार का अस्तित्व समाप्त कर रहे हैं.

छत्तीसगढ़ में बेरोजगार नौजवानों के नियोजन की कोई व्यवस्थित अथवा अधिनियमित योजनाएं नहीं हैं. मसलन सहकारी पंचायत और स्वायत्तशासी संस्थाओं तथा शासकीय निगमों आदि में ऐसे कई उद्योग प्रकल्प स्थानीय बेरोजगार युवाओं के लिए आरक्षित किए जा सकते हैं. ऐसे संभावित उद्योग प्रकल्पों में बहुत अधिक तकनीकी विशेषता की आवश्यकता नहीं होती. राज्य शासन द्वारा आर्थिक सुविधाएं और संरक्षण मुहैया कराया जाना कठिन नहीं होगा.

युवा शक्ति को वोट कबाड़ू नेता अपने नियोजित कर्मचारियों की तरह राजनीतिक प्रचार का पुर्जा बनाकर रखते हैं. विकल्पहीन बेरोजगार युवा नेताओं और नौकरशाहों की चाकरी करने पर मजबूर हैं. वे बाहरी शोषक उद्योगपतियों के हत्थे चढ़कर सुरक्षाकर्मियों, ड्राइवरों, चैकीदारों, फार्महाउस रक्षकों, टेलीफोन ऑपरेटरों, रसोइयों आदि की नौकरी करने को लेकर संतुष्ट और अभिशप्त हैं.

फसलों में उत्पादन वृद्धि के सरकारी दावों में वृद्धि के बावजूद कृषि भूमि का रकबा सिकुड़ रहा है. जंगल बेतहाशा कट रहे हैं. उन्हें राजनीतिक पार्टियों के नेता, नौकरशाह और उद्योगपति मिलकर काट रहे हैं. जंगलों से पशु पक्षियों और वन उत्पादों के अतिरिक्त आदिवासी भी बेदखल किए जा रहे हैं. पूरा छत्तीसगढ़ खनिजों की उगाही के नाम पर खुद रहा है. कहना अतिशयोक्तिपूर्ण लगता होगा लेकिन छत्तीसगढ़ में भूकंप के खतरे बढ़ रहे हैं.

प्रदूषण तो राजधानी में ही इस कदर बढ़ा है कि राज्यपाल की चेतावनी का भी कोई असर नहीं होता. आदिवासी बहुल राज्य होने पर भी संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों में बढ़ोतरी के लिए कोई अधिसूचना आज तक जारी नहीं की गई. नौकरशाही के तेवर इतने ढीठ हो गए हैं कि उसे जनप्रतिनिधियों, स्वतंत्रता संग्राम सैनिकों, वरिष्ठ नागरिकों और बुद्धिजीवियों का अपमान करने में अपराधिक किस्म का आनंद आने लगा है. पुलिस अपराधियों से जनता की रक्षा नहीं कर पाती. बल्कि अपनी खुद की रक्षा भी कई बार नहीं कर पाती. नक्सलवाद छत्तीसगढ़ का राष्ट्रीय नासूर है. उसके संदर्भ में राजनेताओं की सांठगांठ से इनकार करना सर्वेक्षण दलों के लिए भी मुश्किल है.

शिकागो के विश्व धर्मसम्मेलन में विवेकानन्द के जिस पहले वाक्य पर असाधारण करतल ध्वनि हुई थी, वह यह था, ’’मुझे उस धर्म का अनुयायी होने का गर्व है जिसकी भाषा संस्कृत में ’बहिष्कार’ जैसा कोई शब्द नहीं होता.’’ विवेकानन्द जन्मना कायस्थ थे. वे संयोगवश जन्मस्थान कलकत्ता के अतिरिक्त भारत में सर्वाधिक समय (दो वर्ष से ज्यादा) छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रहे. छत्तीसगढ़ में कुर्मीवाद, साहूवाद, मारवाड़ीवाद और ब्राम्हणवाद का चतुर्भुज है. यदि वे रायपुर में ही टिके रहते और उनके जीवनकाल में छत्तीसगढ़ बन जाता तो क्या करते?

कलकत्ते में गैर-कम्युनिस्ट और छत्तीसगढ़ में बाहरी आदमी? देश की सरहदों की रक्षा में छत्तीसगढ़ के जो नौजवान सपूत शहीद हुए हैं, उनमें से अधिकांश का मूल स्थान यदि छत्तीसगढ़ के बाहर हुआ तो? इन सब कलुषित हालातों के कारण भी बाहरी और स्थानीय जैसे झगड़े सुनाई पड़ते हैं. प्रसिद्ध बंगला उपन्यासकार विमल मित्र की ‘सुरसतिया‘ नामक कहानी के कारण छीछालेदर हुई थी. छत्तीसगढ़ अन्य प्रदेशों के समझदार और पढ़े लिखे लोगों के लिए भी एक अजूबा रहस्यमय और मिथकीय इलाका प्रचारित होने की साजिश का शिकार रहा है.

जो कुछ वर्षों पहले आ गए, वे तय करेंगे कि जो बाद में आए-वे किसी पद या सेवा के लायक नहीं हैं. संविधान के निवास, अधिवास और बस जाने संबंधी प्रावधान की तात्विक घोषणाओं का क्या अर्थ है? वर्षों पहले ओडिसा से बाहरी और विशेषकर राजस्थान मूल के लोगों को भगाने का जबरदस्त अभियान छेड़ा गया था. रोटी के वास्ते पिछड़े इलाकों छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिसा, बिहार आदि से हजारों की संख्या में श्रमिक अन्य राज्यों में पलायन करते हैं. वे वर्षों वहां रहते हैं. उन्हें खानाबदोशों की जिन्दगी बिताने के लिए मजबूर किया जाता है. वे गुमनामी के अंधेरे में खोते जाते हैं.

देश में कहीं भी बसकर राजनीतिक- सांस्कृतिक-सामासिकता से एकात्म हो जाना संविधान की मंशा है और उसकी घोषणा भी. यथार्थ इतना कंटीला और कड़ियल है कि सेवानिवृत्ति के बाद हर व्यक्ति को पुरखों की तथाकथित देहरी की ओर लौटने की इच्छा या स्थिति नहीं होती. जहां उसने अपना पूरा जीवन काट लिया, उसे भी उसके जीवन की सांझ में परदेश कह दिया जाता है.

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