नसबंदी की दवा में जहर नहीं: H’bad lab

Sunday, April 19, 2015

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'सिप्रोसीन कांड'

बीबीसी | रायपुर: छत्तीसगढ़ नसबंदी कांड में उपयोग की गई दवाओं में जहर नहीं था यह हैदराबाद सेंट्रल लैब का कहना है. गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में नवंबर 2014 में नसबंदी के ऑपरेशन के बाद 18 महिलाओं की मौत हो गई थी. छत्तीसगढ़ के बिलासपुर नसबंदी कांड में इस्तेमाल दवाओं में ज़हर नहीं था. हैदराबाद सेंट्रल लैब में दवाओं की जांच के बाद यह बात सामने आई है.

पुलिस ने जांच की रिपोर्ट छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट को सौंपी है.

हैदराबाद सेंट्रल लैब की जांच रिपोर्ट के बाद राज्य के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल ने कहा है कि पूरे मामले की न्यायिक जांच चल रही है और इसमें जो भी दोषी पाया जाएगा, उसे बख्शा नहीं जाएगा.

अमर अग्रवाल ने कहा, “हमने महिलाओं की मौत के तुरंत बाद कार्रवाई की थी. चिकित्सकों को निलंबित किया था, संदिग्ध दवाओं पर प्रतिबंध लगाया था और ऐसे शिविरों के लिए कड़े मापदंड तय किए थे. जांच आयोग की रिपोर्ट में जो भी अनुशंसा होगी, हम उस पर भी कड़े कदम उठाने से पीछे नहीं हटेंगे.”

पिछले साल आठ नवंबर को बिलासपुर में एक नसबंदी कैंप में नसबंदी करवाने वाली 18 महिलाओं की मौत हो गई थी.

बिलासपुर के पेंडारी में पिछले साल आठ नवंबर को 83 महिलाओं के नसबंदी ऑपरेशन के बाद उनकी तबीयत ख़राब हो गई थी. इसके अलावा बिलासपुर के दूसरे इलाक़ों में भी लोग बीमार पड़ गए थे और 18 महिलाओं की मौत हो गई थी.

इस मामले में सबसे पहले ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर को गिरफ़्तार किया गया था.

बाद में सिप्रोसीन-500 दवा का निर्माण करने वाली रायपुर की कपंनी महावर फ़ार्मा के ख़िलाफ़ भी मामला दर्ज करते हुए उसके मालिकों को गिरफ़्तार कर लिया गया.

साथ ही राज्य सरकार ने 12 दवाओं और दूसरी चीजों पर प्रतिबंध भी लगा दिया था.

राज्य के स्वास्थ्य सचिव आलोक शुक्ला ने स्थानीय प्रयोगशाला में जांच के बाद दवा में ज़िंक फ़ास्फ़ाइट मिलाए जाने की बात कही थी.

उसके बाद उच्च स्तर पर सिप्रोसीन-500 व आईब्रूफेन दवा को परीक्षण के लिए भेजा गया था.

दवाओं की जांच अलग-अलग लैब में कराई गई थी, लेकिन सबकी रिपोर्ट अलग-अलग थी.

कुछ ने अपने यहां ज़हर की जांच की सुविधा नहीं होने का हवाला दिया था तो कुछ ने रिपोर्ट ही नहीं पेश की.

कोलकाता की सरकारी लैब सीडीएल ने दवाओं की मात्रा कम होने से जांच करने से ही मना कर दिया था.

इसी तरह क्लालिकेम लैब नागपुर और मुंबई की एक निजी लैब ने दवाओं को मानक के अनुरूप नहीं पाया था. लेकिन इसी बीच दिल्ली की निजी श्रीराम लैब ने दोनों ही दवाओं में जिंक फास्फाइड की बात कही थी.

सीडीआरआई लखनऊ ने आज तक रिपोर्ट ही पेश नहीं की. अब हैदराबाद की सेंट्रल लैब की रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि दवाओं में कोई ज़हर नहीं था.

हैदराबाद सेंट्रल लैब की जांच रिपोर्ट के बाद माना जा रहा है कि इस मामले में जेल में बंद सिप्रोसीन 500 दवा के निर्माता और दवा की आपूर्ति करने वाले सभी तीन लोगों की जमानत का रास्ता साफ हो गया है.

ये सभी लोग नवंबर से ही जेल में बंद हैं.

इस मामले में ऑपरेशन करने वाले जिस आरके गुप्ता को गिरफ्तार किया गया था, वे पहले से ही जमानत पर बाहर हैं.

उन्हें जमानत में इस बात का लाभ मिला था कि दवाओं में ज़हर है और महिलाओं की मौत में डॉक्टर की कोई लापरवाही नहीं है.

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