छत्तीसगढ़ में पेंटा वैक्सीन से मौतें

Friday, September 11, 2015

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पेंटावेलेंट वैक्सीन

रायपुर | जेके कर: छत्तीसगढ़ में पिछले दो माह में पेंटावेलेंट वैक्सीन लगाने से दो बच्चों की मौत की खबर है. छत्तीसगढ़ के सूरजपुर के भैय्याथान के आ्रंगनवाड़ी केन्द्र में पेंटावेलेंट वैक्सीन लगाने के 24 घंटे के अंदर एक तीन माह के बच्चे ने दम तोड़ दिया. बच्चे का पोस्टमार्टम कराया गया है तथा पेंटावेलेंट वैस्सीन को सीज कर दिया गया है. उल्लेखनीय है कि इससे दो माह पहले बिलासपुर के अपोलो अस्पताल में एक बच्चें की इसी वैक्सीन से मौत होने की खबर आई थी.

उल्लेखनीय है कि पेंटावेलेंट वैक्सिन 5 बीमारियों हेपेटाइटिस- बी, एच इन्फ्लूएंजा, डिप्थीरिया, परट्यूसिस और टिटनेस का एक टीका है. वैक्सिन को यूपीए की केन्द्र सरकार ने लांच किया था. छत्तीसगढ़ में इस साल अप्रैल-मई में यह टीका लगना शुरू हुआ.

तमाम विरोधों के बावजूद पेंटावेलेंट वैक्सीन को भारत में साल 2011 में राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल किया गया था उसके बाद से इससे 54 बच्चों के मरने की खबर है. इसे सबसे पहले केरल तथा तमिलनाडु में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरु किय़ा गया था. पहले ही साल इन दोनों राज्यों में इससे 19 बच्चों की मौत हुई थी. हरियाणा में इसे साल 2012 से शुरु किया गया उसके बाद से इस वैक्सीन से 5 बच्चों के मरने की खबर है. इसी वैक्सीन से जम्मू-कशमीर में 12 बच्चों के मरने की खबर है.

साल 2010 में जब नेशनल टेक्नीकल एडवाइजरी ग्रुप ऑन इम्युनाइजेशन ने इसे भारत में लागू करने के लिये सहमति प्रदान की थी उसी समय इसी के दो सदस्यों ने सर्वोच्य न्यायालय में इसके खिलाफ जनहित याचिका दायर की थी. इसके बाद दिल्ली के डॉ. योगेश जैन ने एक और जनहित याचिका दायर करके मांग की थी कि यह पेंटावेलेंट वैक्सीन अमरीका, जापान, कनाडा, यूरोप, आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन जैसे देशों में प्रतिबंधित है इसलिये इसे भारत में भी प्रतिबंधित किया जाना चाहिये.

भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका में इसे साल 2008 में शरु किया गया था परन्तु इससे हुई पांच मौतों के बाद इसे बंद करा दिया गया था. इसी तरह से भूटान में इसका उपयोग साल 2009 में शुरु किया गया ता परन्तु 9 मौतों के बाद इस वहां बंद करा दिया गया था. बाद में विश्व स्वास्थ्य संगठन के कहने पर पेंटावेलेंट वैक्सीन को भूटान में फिर से शुरु किया गया अब हुई 4 मौतों के बाद इसे वहां ङी प्रतिबंधित करा दिया गया. इसी तरह से वियतनाम में भी इसका उपयोग साल 2010 में शुरु किया गया परन्तु साल 2013 के पहुंचते-पहुंचते इससे हुई 12 बच्चों की मौतों के बाद इसे वहां भी प्रतिबंधित कर दिया गया है.

जब पेंटावेलेंट वैक्सीन को भारत में शुरु किया गया था उस समय साल 2012 में मिम्स इंडिया के एडिटर डॉ. सीएम गुलाटी ने मीडिया से कहा था कि, “अंतर्राष्ट्रीय संस्थाये तथा वैक्सीन उद्योग इसे भारत में शुरु करवाने के लिय दबाव बना रहें हैं जबकि न तो इसकी कोई जरूरत है और न ही सुरक्षित है.”

जाहिर है कि पेंटावेलेंट वैक्सीन शुरु से ही विवादों में रहा है तथा इसके बावजूद यूपीए सरकार ने इसे भारत में लागू करने की इजाजत दे दी और तो और इसे सरकारी टीकाकरण कार्यक्रम में भी शामिल करा दिया गया. इसे कहने की जरूरत नहीं कि अब सरकारी पैसे से यह टीका लगाया जा रहा है अर्थात् वैक्सीन कंपनियां इससे मुनाफा कमा रही है.

एक समय बर्ड फ्लू का हौव्वा खड़ा कर इसकी दवाई दुनिया भर में बेच दी गई थी. बर्ड फ्लू की दवा बनाती है गिलेड लाइफ सांइसेस तथा व्यापार करती है रोश फार्मा. इस गिलेंड लाइफसाइंसेस के रम्स फील्ड बड़े शेयर धारक हैं. जैसे ही रम्स फील्ड अमरीका के रक्षामंत्री बने कार्पोरेट मीडिया द्वारा बर्ड फ्लू का समाचार प्रमुखता से पेश किया जाने लगा. इस दौर में गिलेज लाइफ साइंसेस ने अरबों रुपए कमाए साथ ही रम्सफील्ड ने भी. जबकि वायरोलॉजिस्ट चीख-चीख कर रहे रहे थे कि बर्ड फ्लू बर्डों की यानी पंक्षियों की बीमारी है. यह मनुष्यों में महामारी का रूप नहीं ले सकती. उसका वायरस अभी इतना सक्षम नहीं है. केवल मुनाफा कमाने के लिए पद का उपयोग किया गया था.

बात केवल रम्स फील्ड और बर्ड फ्लू की नहीं है. दवाई और टीकाकरण की दुनिया की एक खौफनाक हकीकत ये है कि जिन वैक्सीन यानी टीका को जानलेवा बीमारियों का हौव्वा बना कर बेचा जाता है, उनमें से बड़ी संख्या ऐसे ही टीकों ही है, जो बाजार में जानलेवा भय पैदा करके मुनाफा कमाने के उद्देश्य से ही निकाली गई हैं. मुनाफा कमाने के लिये ऐसा अपराध करने वालों में महाकाय दवा घराने शामिल हैं, राजनेता शामिल हैं और नौकरशाह भी. बड़े देशों में तो यह आय का एक बड़ा स्रोत बन गया है.

भारत का टीकाकरण बाज़ार लंबे समय से सुप्त अवस्था में था. इसे अब जगाया जा रहा है. अर्थात नए-नए टीके भारतीयों को ठोंके जा रहे हैं, भले ही भारतीय परिस्थियों के अनुसार ये अनावश्यक हैं.

भारत में सबसे पहले हेपेटाइटिस बी का हौव्वा खड़ा कर इसके टीके को राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल करवा दिया गया है. यह पीलिया फैलाता है संक्रमित रक्तदान, शल्य क्रिया के संक्रमित औजारों या सुई से. कुछ हद तक यौन संबंधों से. आप सब को ज्ञात होगा कि रक्तदान से पहले उसका परीक्षण कराया जाता है कि उस व्यक्ति को पीलिया, मलेरिया, एड्स या यौन रोग न हो. चिकित्सा तथा शल्यक्रिया के सभी औजारों को उपयोग के पहले संक्रमण रहित बनाया जाता है. वरन चिकित्सा सेवा में रत चिकित्सकों तथा कर्मचारियों को मरीजों से पीलिया से पीड़ित होने का डर रहता है. इसीलिए हेपाटाइटिस बी का टीका चिकित्सा कर्मचारियों के लिए जो मरीज के संपर्क में रहते हैं, उसके लिए आवश्यक है. धन्य हो गावी का जिसने भारत की अधिकांश जनता को यह टीका लगवा दिया है. अब तो राष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल होने के कारण सभी बच्चों को यह टीका लगाया जा रहा है.

दूसरा टीका जिसे लेकर खूब हो हल्ला मचाया जा रहा है वह है हिब अर्थात हिमोफिलस इन्फ्लूएंजा टाइप बी. अमरीकी सरकार के स्वास्थ्य विभाग के अनुसार यह संक्रमण, संक्रमित व्यक्ति के नाक एवं गले के श्लेष्मा या बलगम से फैलता है. इसमें मेननजाइटिस, निमोनिया तथा वात रोग होता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के 1980 से उपलब्ध आंकडों के अनुसार 2011 तक भारत में किसी को भी इससे निमोनिया या मेननजाइटिस नहीं हुआ है. फिर क्यों इन टीकों को भारत में उत्पादन तथा उपय़ोग करने की इजाजत केंद्र सरकार देती है? इस सवाल का जवाब है मुनाफा और मुनाफा.

तीसरा टीका जिसे लेकर दवा कंपनियां सीधे तौर पर प्रचार कर रही हैं वह है रोटा-वाइरस का टीका. रोटा वाइरस में डायरिया होता है, जो आम तौर पर पश्चिमी देशों में होता है. फिर यह महंगा टीका भारतीय बच्चों को क्यों लगाया जा रहा है. यदि कुछ बच्चों को इस वायरस से डायरिया या अतिसार होता है तो उसे ओआरएस पाउडर पानी में घोल कर देना चाहिए. यह डायरिया तीन से आठ दिनों तक रहता है. प्रत्येक 70 संक्रमित बच्चों में से केवल एक बच्चे को अस्पताल में दाखिल करना पड़ता है. रोटा वाइरस के टीके के मुकाबले इसका उपचार ज्यादा सस्ता पड़ता है.

इनके अलावा भी लड़कियों को गर्भाशय के कैंसर से बचने के नाम पर वैक्सीन लगाए जा रहे हैं. इस वैक्सीन का नाम है एचपीव्ही- ह्यूमन पैपीलोना वायरस. गावी के चलते रूबेला तथा यलो फीवर का टीका भी लगाने की तैयारी सरकार कर रही है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के आँकडों के अनुसार 1980 से लेकर सर्वेक्षण यानी 2011 तक किसी भी भारतीय को रुबेला तथा यलो फीवर नहीं हुआ है.

इस प्रकार आप देख व समझ सकते हैं कि केवल समुद्रपारीय व्यापारियों तथा बड़े भारतीय दवा व्यापारियों की तिजोरी भरने के लिए भारतीय जनता विशेषकर बच्चों को गिनीपिग की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है. अगली बार जब कोई आपको या आपके परिवार के किसी सदस्य को किसी खौफनाक बीमारी का हवाला दे कर टीका लगवाने के लिये प्रेरित करे तो एक बार यह देखना मत भूलियेगा कि वह कितना जरुरी है.

जहां तक पेंटावेलेंट वैक्सीन का सवाल मोदी सरकार को इसकी फिर से विशेषज्ञों के माध्य से इसकी जांच करवानी चाहिये कि क्या वास्तव में देश के बच्चों को इसकी आवश्यकता है?

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