राजनीति की हत्या है दरभाकांड-मरांडी

Sunday, June 9, 2013

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बाबूलाल मरांडी

रांची | संवाददाता: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने दरभा कांड को राजनीति की हत्या कहा है. झारखंड में नक्सली हमले में अपने निकटतम परिजनों को खोने वाले बाबू लाल मरांडी का कहना है कि हिंसा को रोकने के लिए हिंसात्मक पंथ और इसके विरुद्घ प्रतिशोधात्मक हिंसा तो कभी समाप्त नहीं होनेवाली कड़ी है. ऐसे सोच के कारण शासन ने वाम चरमपंथियों के दमन की व्यवस्था लागू की, जिसका परिणाम आज हमारे सामने है.

बाबूलाल मरांडी ने अपने एक लेख में कहा है कि नक्सलवाद को भी हम राजनैतिक लोगों ने कभी गंभीरता से नहीं लिया. नीति की एकरूपता कभी दिखी नहीं, राजनैतिक वैचारिक भेद कभी मिटा नहीं और संभवत: वाम चरमपंथी को कभी राजनीति में स्थान ही नहीं दिया.
मरांडी के अनुसार यह जानते हुए कि वाम चरमपंथ में तीन शब्द है, वाम, चरम और पंथ. कभी इस बात का संज्ञान नहीं लिया कि ‘वाम’ एक सोच है, जो राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखती है. ‘चरम’ अभिव्यक्ति का स्वरूप है, जो जनमानस की भावना के प्रस्फुटन की गहराई को दर्शाता है और ‘पंथ’ वह रास्ता है, जिससे निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति होती है. हम राजनैतिक पार्टियों ने तीनों को जोड़ कर इसे लुटेरों और अपराधियों की संज्ञा देकर कभी इसकी गहराई में जाने का नाम नहीं लिया.

बाबूलाल मरांडी का कहना है कि हमने कभी यह नहीं सोचा कि वाम भी समता और समानता की दिशा को दर्शाता है, पंथ तो कभी भी बदल सकता है, यदि लक्ष्य एक हो और वह लक्ष्य जनमानस के हित में हो. देश के संविधान के तहत ही इस पंथ का बदलाव संभव है, यदि प्रयास में ईमानदारी हो. हिंसा को रोकने के लिए हिंसात्मक पंथ और इसके विरुद्घ प्रतिशोधात्मक हिंसा तो कभी समाप्त नहीं होनेवाली कड़ी है. ऐसे सोच के कारण शासन ने वाम चरमपंथियों के दमन की व्यवस्था लागू की, जिसका परिणाम आज हमारे सामने है.

महेंद्र कर्मा को लेकर बाबूलाल मरांडी ने कहा कि महेंद्र कर्मा एक प्रतीक थे, जो नक्सलवाद के विरुद्घ लड़ाई जारी रखे थे. उनकी शहादत को हमें राजनीतिक शून्यता और विफलता की वृहद परिभाषा के अधीन देखना चाहिए.

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी का कहना है कि छत्तीसगढ़ के बस्तर या अबूझमाड़ इलाके को देखें अथवा झारखंड में सारंडा या सरयू इलाके को देखें और उन इलाकों की राजनीतिक गतिविधियों से उसकी तुलना करें, तो नक्सलवाद और राजनीतिक शून्यता में सीधा संबंध भी देखने को मिलेगा. भुखमरी, गरीबी, स्वास्थ्य सुविधा का अभाव, परिसंपत्ति का अभाव, परंपरागत आर्थिक संरचना का विघटन और जनमानस के समक्ष सरकार की अनुपलब्धता इन क्षेत्रों की पहचान है. वहीं, जंगल की प्रचुरता, खनन कार्य की बाहुल्यता, बड़े उद्योग घरानों की उपलब्धता, आर्थिक गतिविधियों का बहाव और बहुमूल्य वन-वानिकी का भंडार भी यहां है. जो नहीं दिखता है, वह है प्रशासनिक नियंत्रण, पुलिसिया गतिविधि और परंपरागत सामाजिक आर्थिक ढांचा. जो है भी, वह जनहित कम और संस्थागत व्यवस्था की सुरक्षा और संरक्षण में ज्यादा व्यस्त है. किंतु, प्रशासन और पुलिस तथा अन्य सरकारी उपस्थिति और कार्य तो राजनीतिक गतिविधियों का ही एक छोटा भाग है. यह मात्र रास्ता है, उस लक्ष्य की प्राप्ति का, जो राजनीति की उत्पत्ति का मुख्य कारक है. यानी जनता की आकांक्षा को पूरा करने का. किसी देश या राज्य की उत्पत्ति भी वहां बसनेवाले नागरिकों की बहुमत की इच्छा से ही होती है.

वर्तमान राजनीति से निराशा जताते हुये मरांडी ने कहा है कि आज राजनीति या राजनैतिक पार्टी 2जी या सीडब्ल्यूजी या आइपीएल के मुद्दे में व्यस्त है. बड़ी पार्टियां देश के स्तर पर शासन में आने के लिए त्रस्त हैं. राज्यों के पारंपरिक संबंध, क्षेत्रीय विकास या संतुलन, स्थानीय समस्या और सामाजिक विघटन, भाषायी या जातीय भेद के प्रस्फुटन, केंद्र-राज्य की दूरी और समेकित एवं समाहित विकास के विषय गौण होते नजर आ रहे हैं. मरांडी के अनुसार स्थानीय निकाय के चुनाव, यहां तक कि विधानसभा के चुनाव में भी प्रत्याशियों के चयन में प्रभावशाली व्यक्ति पर डोरे डालने में मस्त ये तमाम पार्टियां जनता की राजनीतिक चेतना और राजनैतिक आकांक्षा को धता बताते हुए आम जनता की भावना का गला घोंट रही हैं. छोटे-छोटे क्षेत्र की समस्या के संबंध में निचले स्तर से आनेवाले राजनैतिक कार्यकर्ताओं और उनकी भावनाओं की उपेक्षा से राजनीति कमजोर और उसकी धार कुंद हुई है.

मरांडी ने चेतावनी दी है कि जन सामान्य का राजनीति से लगाव कम हुआ है. जो बचा खुचा है, वह भी नक्सलवादियों की ऐसी हरकत से लुप्त हो जायेगी, यदि हम समय के इस चौराहे पर खड़े होकर समाज व देशहित यहां तक कि राजनैतिक हित की ही सही, बात न सोचें. एक ओर इस शून्यता का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है, वहीं राजनैतिक सोच व क्रिया-कलाप की विफलता ने भी चरम वामपंथियों को जीवन दिया है, पाला-पोसा है और बड़ा किया है. नब्बे के दशक में विश्व के बदलाव की लहर में हम अचानक वैश्विक बहाव में शामिल हो गये, लेकिन अब लगता है कि शायद उस समय हम उतना तैयार नहीं थे.

पूंजीवाद को लेकर मरांडी का कहना है कि आर्थिक सुधार की अच्छाइयों के चादर ने उसमें निहित कमियों को पाटने का काम नहीं किया. अचानक पैसे के बहाव ने हमें दो भारत में विभक्त करने का प्रयास किया. एक, जो बहाव की सही दिशा की पहचान रखनेवाले रसूखदार थे, ने इसका लाभ उठाया. दूसरा, जो इस परिवर्तन से अनभिज्ञ था. वह वहीं रह गया और दोनों के बीच की खाई बढ़ गयी. उन्होंने इसमें बदलाव को जरुरी बताया है.

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