केंद्रीय जेल से आ रहीं अज़ान की सदाएं

Friday, July 26, 2013

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रमजान

रायपुर | एजेंसी: छत्तीसगढ़ की राजधानी की केंद्रीय जेल से रमज़ान के पाक महीने में इन दिनों सुबह, शाम, रात और दिन यानी पांचों वक्त अजान की सदाएं सुनाई दे रही हैं. मुस्लिमों का पाक माह रमज़ान चल रहा है और ऐसे में इस जेल के 88 कैदी रोजा रखकर अपनी दुनिया और आखिरत संवार रहे हैं. इस नेक काम में जेल प्रशासन भी उनकी मदद कर रहा है.

चूंकि रमज़ान में रोजे रखना हर मुस्लिम के लिए जरूरी माना जाता है. जेल के कैदी भी इसलिए रोजे रख रहे हैं. रोजों की शुरुआत तड़के तीन बजे से शुरू होती है जब उन्हें जेल में बनी दाल, चावल, रोटी व सब्जी खाने के लिए दी जाती है. सभी कैदी एक साथ सहरी करते हैं.

शहर की दीगर मस्जिदों में गोला छोड़ा जाता है और सायरन की आवाजें आती हैं जिन्हें सुनकर कैदी सहरी करते हैं और एक साथ फजर की नमाज पढ़ते हैं. उसके बाद वे सोते नहीं हैं, बल्कि रोजमर्रा के कामकाज में लग जाते हैं. दिन भर खुदा की राह में भूखे-प्यासे रहते हैं. दोपहर में जोहर की नमाज और असर की नमाज एक साथ पढ़ते हैं. नमाजों के पहले बकायदा अजान दी जाती है ताकि सभी कैदी इकट्ठे हो सकें. इस बीच इफ्तार का वक्त हो जाता है.

कैदियों के घरों से भी इफ्तारी का सामान आता है. जेल प्रशासन की ओर से खजूर की खास व्यवस्था रोजे खोलने के लिए होती है, क्योंकि रमज़ान के दिनों में खजूर खाकर और पानी पीकर ही रोजे खोले जाते हैं. मगरिब की नमाज के बाद खाना खाकर तरावीह की नमाज ईशा के बाद पढ़ाई जाती है. उसके बाद सभी कैदी एक साथ अपने लिए खुदा से दुआएं मांगते हैं. रोजों में नमाज के साथ ही तिलावते कुरान शरीफ भी किया जाता है जो सजायाफ्ता कैदी मौलवी की भूमिका निभाते हैं. वे जुमे की नमाज में खुत्बा भी पढ़ाते हैं.

जेल अधीक्षक के.के. गुप्ता का कहना है कि सेंट्रल जेल रायपुर में इस वक्त लगभग 88 कैदी 10 दिनों से रोजा रख रहे हैं. इनमें सजायाफ्ता 30 पुरुष और तीन महिलाएं शामिल हैं जबकि 55 विचाराधीन कैदी भी रोजा रखकर खुदा को याद कर रहे हैं. उनका कहना है कि रोजेदार कैदियों को मुंगौड़ी सेंटर की मुंगौड़ी, जलेबी और जेल में बना वेज पुलाव खासतौर से दिया जाता है. यह ध्यान रखा जाता है कि उन्हें कोई परेशानी न हो.

सेंट्रल जेल का माहौल इन दिनों आध्यात्मिक हो गया है. अन्य धर्मो के कैदी पिछले साल तक मुस्लिम कैदियों के साथ रोजे रखते थे मगर इस साल किसी ने रोजा नहीं रखा है. रोजा रखने वाले कैदियों को एक ही बैरक में रखा जाता है.

रायपुर सेंट्रल जेल में जिस बैरक में सभी रोजेदार रह रहे हैं, उसे रमज़ान के पहले बाकायदा धोया गया. सभी कैदियों को साफ धुली हुई चादरें और कंबल दिए गए हैं. रोजेदार कैदी अपना भोजन खुद ही पाकशाला में खाना पकाते हैं. जेल प्रशासन उन्हें सामान उपलब्ध कराता है. वे माह भर अपने हाथ से बना हुआ खाना खाते हैं हालांकि घरों से सिर्फ इफ्तार का सामान ही लाया जाता है. इफ्तार के दौरान परिजनों की भीड़ जेल के बाहर देखी जा सकती है. सजायाफ्ता और विचाराधीन कैदियों के परिजनों को माह भर भोजन लाने की विशेष छूट दी जाती है.

कहते हैं कि जो जैसा करेगा वैसा भरेगा. यह कहावत जेल में चरितार्थ हो रही है. यहां उम्रकैद की सजा 30 कैदी काट रहे हैं मगर खुदा की बारगाह में सभी कैदी झुककर अपने लिए दुआएं खैर कर रहे हैं. सबसे ताज्जुब की बात यह है कि हत्या के जुर्म में सजा काट रहे कैदी को मौलवी की भूमिका में देखना. इसके साथ ही 88 कैदियों का रोजा रखना. महिला जेल में तीन कैदी रोजा रख रही हैं.

जेल अधीक्षक का कहना है कि यहां बारहों माह हर जुमे की नमाज पढ़ी जाती है. रमज़ान माह के आखरी जुमे में भी जोहर की नमाज कैदी खासतौर से पढ़ते हैं. 27वीं शबेकद्र की रात में कैदी जागकर इबादतें करते हैं. ईद-उल-फितर के दिन सुबह से वे नहा-धोकर ईद की नमाज पढ़ते हैं. इस दिन जेल में सेवइयां खासतौर से बनती हैं जो अन्य कैदियों को परोसी जाती है. ईद की नमाज पढ़ाने के लिए बाहर से मौलाना आते हैं.

रायपुर सेंट्रल जेल में रोजों की बहार आई हुई है. अगर कैदियों के जीवन में रोजों से बदलाव आ जाए तो अपराधों में भी कमी आएगी और आने वाले समय में अच्छा माहौल बनने में मदद मिलेगी.

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