सस्ती दवा नीति की कुर्बानी

Sunday, May 1, 2016

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एंटीबायोटिक से प्रतिरोध क्षमता

अमित सेनगुप्त
जब से भाजपा की सरकार बनी है, भारत हर कीमत पर अमरीका को खुश करने की कोशिशों में लगा रहा है. यह रुझान बौद्धिक संपत्ति अधिकारों के मामले में, खासकर दवाओं के मामले में पेटेंट अधिकारों के अमल में खासतौर पर खुलकर सामने आया है.

दवाओं की पेटेंट इजारेदारी
कमजोर पड़ता विरोध

याद रहे कि दवाओं का क्षेत्र ऐसा क्षेत्र है जिसके संदर्भ में पेटेंट अधिकारों के मुद्दे पर परंपरगत रूप से ही भारत और अमरीका लगभग विरोधी ध्रुवों पर ही रहे हैं. अमरीका, अपने दवा उद्योग के हितों को सामने रखकर यह दलील देता आया है कि सभी देशों को इस मामले में बहुत कड़े पेटेंट संरक्षण की व्यवस्था लागू करनी चाहिए और इस तरह यह पक्का करना चाहिए कि भीमकाय दवा कंपनियों को दवाओं की बिक्री पर इजारेदाराना अधिकार हासिल हों, ताकि घरेलू दवा कंपनियों से किसी भी तरह की प्रतियोगिता के अभाव में वे अपनी दवाएं अनाप-शनाप दाम पर बेच सकें.

दूसरी ओर भारत ऐसी पेटेंट को आगे बढ़ाने का पुरोधा रहा है, जो दवाओं के मामले में पेटेंटों तथा इस तरह बिक्री के इजारेदाराना अधिकारों से बचकर चलती थी. भारत का 1970 का पेटेंट कानून ठीक यही करता था. इस तरह के रुख का नतीजा यह था कि भारतीय कंपनियां, अमरीकी तथा योरपीय बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों द्वारा वसूले जा रहे दाम के दसवें से लेकर पंद्रहवें हिस्से तक के बराबर कीमत पर, समकक्ष दवाएं बेचने की स्थिति में थीं. आगे चलकर, विश्व व्यापार संगठन समझौते के हस्ताक्षरकर्ता के नाते भारत को अपने पेटेंट कानून में संशोधन करना पड़ा और 2005 में दवाओं के मामले में पेटेंट अधिकार को मंजूर करना पड़ा. इसके बावजूद भारतीय संसद ने, जाहिर है कि सबसे बढक़र सीपीएम तथा अन्य वामपंथी पार्टियों के ही प्रयत्नों से नये पेटेंट कानून में ऐसे बचाव प्रावधानों का बना रहना सुनिश्चित किया, जो घरेलू दवा कंपनियों को, बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों की दवा बाजार पर इजारेदारी में सेंध लगाने का मौका देते थे.

अचरज की बात नहीं है कि भारत का संशोधित पेटेंट कानून तक, अमरीकी वाणिज्य विभाग तथा अमरीकी दवा उद्योग की आंखों में खटकता रहा है और इस मामले में अमरीका तथा भारत के बीच बराबर रस्साकशी चलती आयी है. बहरहाल, नरेंद्र मोदी की सरकार सत्ता संभालने के बाद पहले कुछ महीनों में ही इस मामले में अमरीका को खुश करने की कोशिशें शुरू कर चुकी थी. वैसे सच तो यह है कि पिछले करीब तीन साल से सरकार के विभिन्न कदमों तथा बयानों की दिशा यही रही है कि दवाओं के लिए पेटेंट संरक्षण के मुद्दे पर भारत के रुख को धीरे-धीरे, अमरीकी रुख के अनुकूल बनाया जाए. यह इसके बावजूद है कि भारत के रुख का इस तरह अमरीका के रुख के अनुकूल बनाया जाना, भारत में तथा दूसरे अनेक देशों में भी (जहां तक भारत की सस्ती जेनेरिक दवाएं पहुंचती हैं) करोड़ों मरीजों को सामने आ चुके नये तथा बेहतर उपचार से वंचित करता है.

पेटेंट कानून के बचावों की
जड़ ही काटने का खेल

इस मामले में अमरीकी बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों को भारत सरकार द्वारा दी गयी रियायतों की लंबी शृंखला की ताजातरीन कड़ी है उसका यह ‘आश्वासन’ कि भारत, वाणिज्यिक ‘अनिवार्य लाइसेंस’ जारी नहीं करेगा यानी अब भारतीय कंपनियों का इसके लिए लाइसेंस दिया ही नहीं जाएगा कि पेटेंट इजारेदारियों को अनदेखा कर, दवाओं के सस्ते प्रारूप बनाएं तथा बेचें. इस मामले में छुपाकर रखी गयी सचाई तब अचानक निकलकर सामने आ गयी जब अमरीका-इंडिया बिजनस काउंसिल (USIBC) ने अमरीकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) के सामने अपनी गवाही में यह कहा बताते हैं कि भारत सरकार ने अमरीकी दवा उद्योग को ‘निजी तौर पर भरोसा’ दिलाया है कि वह वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए अनिवार्य लाइसेंसों का इस्तेमाल नहीं करेगी. बेशक, बाद में सरकार ने ऐसा आश्वासन देने से इंकार भी किया था, लेकिन खंडन की यह भाषा तो खुद ही सरकार के असली इरादों के बारे में और ज्यादा संदेह ही पैदा करने वाली भाषा है.

अमरीका-इंडिया बिजनस काउंसिल के अध्यक्ष, मुकेश अघी ने 2016 की फरवरी में अमरीकी व्यापार प्रतिनिधि के आगे अपनी गवाही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महिमा का खूब बखान किया और उन्हें इसके लिए बधाई दी कि, ‘‘अनेक सर्वजनिक बयान (आए) हैं जो एक मजबूत तथा तंदुरुस्त बौद्धिक संपदा व्यवस्था के पक्ष में उनकी वचनबद्घता की पुष्टि करते हैं.’’ यूएसटीआर के सामने उनकी गवाही में इस तथ्य की ओर भी इशारा किया गया है कि भारत में हाल ही में अनिवार्य लाइसेंसिंग की अनेक अर्जियों को ठुकरा दिया गया है. जाहिर है कि सबसे कलंकित करने वाला उनका यह दावा था कि, ‘‘भारत सरकार ने निजी तौर पर यह भरोसा दिलाया है कि भारत, वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए अनिवार्य लाइसेंसों का प्रयोग नहीं करेगा.’’ याद रहे कि अमरीकी चैंबर ऑफ कॉमर्स के उपाध्यक्ष, यूएसटीआर के सामने अपनी गवाही में डेविड हर्शमैन ने भी वही दावा दोहराया था.

पुन: इस मामले में शीर्ष स्तर से सरकार के विशेष सक्रिय होने का सुस्पष्ट संकेत अमरीकी चेंबर ऑफ कामर्स के वैश्विक बौद्धिक संपदा केंद्र के पैट्रिक किलब्राइड की गवाही से मिल जाता है. 2016 के मार्च मे यूएसटीआर के सामने अपनी गवाही किलब्राइड ने दर्ज किया था: ‘‘2014 में भारतीय प्रधानमंत्री श्री मोदी के चुनाव के चुनाव ने इसका महत्वपूर्ण मौका मुहैया कराया है कि बौद्धिक संपदा के मुद्दे पर भारत और अमरीका के बीच फिर से एक सहकारात्मक तथा उत्पादक काम-काजी रिश्ता कायम किया जाए.’’

अनिवार्य लाइसेंस
क्यों जरूरी हैं?

जैसाकि हमने पहले ही कहा, जहां तक बौद्धिक संपदा अधिकारों का सवाल है, भारत और अमरीका परंपरागत रूप से विश्व मंच पर एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े रहे हैं और यही बात अनेक बहुपक्षीय मंचों के बारे में भी सच है. यहां तक कि करीब तीन दशकों तक अमरीका ने भारत को अपनी व्यापार पाबंदियों संबंधी स्पेशल-301, ‘निगरानी सूची’ में डाले रखा था. वास्तव में लगातार साल-दर-साल इस सूची में भारत को शामिल किया जाता रहा था और जाहिर है कि ऐसा खासतौर पर इसलिए किया जा रहा था कि भारत, पेटेंट अधिकारों के मामले में अमरीका की हां में हां मिलाने के लिए तैयार नहीं था. साफ है कि मौजूदा सरकार, अमरीकी दवा उद्योग को गुपचुप तरीके से आश्वासन देने के जरिए, इस सारे अतीत को ही दफ्न करने की कोशिश कर रहा है और इसका एलान कर रहा है कि वह अमरीकी व्यापार विभाग की धौंस में आकर झुकने के लिए तैयार है.

सचाई यह है कि जब किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी द्वारा बाजार में उतारी गयी नयी दवा के लिए, जिसके उत्पादन पर उसे पेटेंट संरक्षण हासिल हो, अनिवार्य लाइसेंस जारी किया जाता है, ऐसी दवाओं के दाम में पूरे 97 फीसद तक की गिरावट देखने में आयी है यानी जिस नये उपचार पर 1 लाख रु0 खर्च होते, सिर्फ 3,000 रु0 में उपलब्ध होने लगता है. भारत के राष्ट्रीय कानून के तहत उपलब्ध इसी विकल्प का अब ‘निजी आश्वासनों’ के रास्ते से समर्पण किया जा रहा है. यह भारत के पेटेंट कानून में शामिल किए गए बचावों की जड़ ही काटने के सिवा और कुछ नहीं है.

यह गौरतलब है कि इस समय बहुराष्ट्रीय निगमों के पेटेंट अधिकार के तहत आने वाली अधिकांश नयी दवाओं का भारत में सीधे-सीधे आयात हो रहा है. 2014 के एक अध्ययन में यह पता चला था कि पेटेंट संरक्षण के तहत आने वाली 92 दवाओं में से सिर्फ 4 का भारत में उत्पादन हो रहा था. बहुराष्ट्रीय निगमों के इजारेदाराना अधिकार के चलते, इन दवाओं के अनाप-शनाप दाम लगाए जाते हैं और ये दवाएं ज्यादातर भारतीय मरीजों की पहुंच से तो बाहर ही बनी रहती हैं. मिसाल के तौर पर ब्रेस्ट कैंसर की दवा, इक्सेम्प्रा का एक इंजैक्शन, 70,000 रुपयें से ज्यादा का बैठता है. याद रहे कि यह दवा बहुराष्ट्रीय कंपनी ब्रिटल मेयर स्क्विब (बीएमएस) द्वारा बेची जाती है.

इसी प्रकार, प्रोस्टेट कैंसर के उपचार में काम आने वाली दवा, आस्ट्राजेनेका कंपनी की ज़ोलाडैक्स का एक इंजैक्शन 28,000 रुपयें से ज्यादा का आता है. लेकिन, इन दवाओं के दाम पर भारत किसी तरह का नियंत्रण रख ही नहीं सकता है क्योंकि भारत में इन दवाओं का उत्पादन हो ही नहीं रहा है. ऐसी स्थिति में अगर सरकार की तरफ से कीमतें तय करने की कोशिश की जाती है, तो इन दवाओं का बहुराष्ट्रीय कंपनियां इसके जवाब में बड़ी आसानी से भारत के लिए इन दवाओं की आपूर्ति ही बंद कर सकती हैं.

ऐसे में अनिवार्य लाइसेंस जारी करने का प्रावधान, सरकार के हाथों में ऐसा अकेला उपाय है जिसका सहारा लेकर, इन नयी दवाओं के दामों में उल्लेखनीय कमी की जा सकती है. दाम में इस उल्लेखनीय कमी की वजह बिल्कुल सीधी है. अनिवार्य लाइसेंस की व्यवस्था, बहुराष्ट्रीय निगमों की उत्पादन की इजारेदारी को तोड़ती है और संबंधित दवा के भारतीय कंपनी द्वारा उत्पादन तथा वितरण की इजाजत देती है. अनिवार्य लाइसेंस दिए जाने के नयी दवाओं के दाम पर पडऩे वाले नाटकीय प्रभाव को, भारत में अब तक दिए गए इकलौते अनिवार्य लाइसेंस के अनुभव से समझा जा सकता है. जब सन 2012 में भारतीय जेनेरिक कंपनी एनएटीसीओ को कैंसररोधी दवा, सोराफेनिब के लिए (जो बहुराष्ट्रीय कंपनी बायर द्वारा नेक्सावार के नाम से बेची जा रही थी) अनिवार्य लाइसेंस दिया गया, इस दवा से उपचार का खर्चा 2 लाख 80 हजार रुपयें से घटकर, 9,000 रुपयें से भी नीचे आ गया. याद रहे कि इसके बावजूद भारत ने सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए, अपने ही कानून के इस प्रावधान का उपयोग करने के मामले में बहुत ही दब्बूपना दिखाया है. जाहिर है कि यह दब्बूपना, अमरीका की नाराजगी की वजह से ही है. यह आश्चर्यजनक किंतु सत्य है कि सोराफेनिब के पेटेंट का मामला, भारत में अनिवार्य लाइसेंस जारी करने संबंधी प्रावधान का प्रयोग किए जाने का इकलौता मामला है.

‘‘भारत में बनाओ’’ की जगह
भारत को लूटकर ले जाओ!

अनिवार्य लाइसेंस अब दिए ही न जाने का मोदी सरकार का आश्वासन, भारतीय दवा उद्योग को भी निरस्त्र करने का और उसे अमरीका तथा योरप के बहुराष्ट्रीय निगमों का दुमछल्ला बनने के लिए मजबूर करने का ही काम करेगा. याद रहे कि भारत का दवा उद्योग, न सिर्फ विकासशील दुनिया का सबसे बड़ा दवा उद्योग है बल्कि पूरी दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा दवा उद्योग भी है. जाहिर है कि यह मजबूत दवा उद्योग, 1970 के उदार पेटेंट कानून के सहारे से खड़ा हुआ था. बहरहाल, अब इस दवा उद्योग को ऐसे प्रतिकूल हालात का सामना करना पड़ रहा है जहां सरकार, मौजूदा पेटेंट कानून में मौजूद बचाव के प्रावधान का उपयोग करने के प्रति ही पूरी तरह से अनिच्छुक हैं, जबकि इसका उपयोग सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा घरेलू दवा उद्योग, दोनों के लिए ही बहुत जरूरी है.

इससे बहुप्रचारित, ‘मेक इन इंडिया’ अभियान की भी पोल खुल जाती है. साफ है कि यह नारा कम से कम ऐसे आत्मनिर्भर तथा प्रतिस्पर्धी घरेलू उद्योग का निर्माण करने का नहीं है, जो भारतीय जनता की जरूरतों को पूरा करता हो. इसके बजाय यह तो अमरीकी तथा योरपीय बहुराष्ट्रीय निगमों को इसके लिए न्यौत-न्यौत कर लाए जाने का ही मामला है कि आएं और भारतीय कौशलों, भारतीय संसाधनों तथा भारतीय बुनियादी ढांचे को लूटें और यह लूट देश के बाहर ले जाएं. यह ‘भारत में बनाओ’ का नहीं, ‘भारत को लूट कर ले जाओ’ का आह्वान है.

बेशक, चौतरफा आलोचनाओं के सामने सरकार को पीआइबी के जरिए प्रसारित एक वक्तव्य के जरिए इस आशय के आरोपों का जवाब देना पड़ा है कि उसने अमरीकी दवा उद्योग को निजी तौर पर इस तरह के आश्वासन दिए हैं कि अनिवार्य लाइसेंस जारी नहीं किए जाएंगे. लेकिन, इन आरोपों का सरकार ने जो जवाब दिया है, उसे चकरा देने वाला ही कहा जाएगा. बेशक, ऐसे किसी भी सरकारी बयान में इस तरह का खंडन तो रहना ही रहना था कि, ‘एतद्वारा स्पष्ट किया जाता है कि इस तरह की खबरें तथ्यात्मक रूप से गलत हैं’. आखिरकार, सरकार से ऐसे निजी आश्वासन देने की बात मानने की उम्मीद तो कोई नहीं करता है, जो सार्वजनिक नीति के खिलाफ जाते हैं. बहरहाल, आगे चलकर इसी बयान में यह कहना जरूरी समझा गया है कि, ‘भारत में बौद्धिक संपत्ति अधिकारों की हिफाजत करने के लिए, एक सुस्थापित ट्रिप्स-अनुरूप विधायी, प्रशासनिक तथा न्यायिक ढांचा मौजूद है. सार्वजनिक स्वास्थ्य पर ट्रिप्स समझौते के संबंध में दोहा घोषणा के तहत, हरेक सदस्य (देश) को यह अधिकार है कि अनिवार्य लाइसेंस जारी करे और उसे ऐसे लाइसेंस जारी करने के आधार तय करने की आजादी है.’

लेकिन, यह सब कहना अनिवार्य लाइसेंस जारी न किए जाने के ‘निजी आश्वासन’ दिए जाने पर उठे सवालों का किसी भी तरह से जवाब नहीं देता है. उल्टे वास्तव में इस मुद्दे पर यही चिंता जतायी जा रही है कि ऐसा लगता है कि भारत, दोहा घोषणा में व्यक्तिगत रूप से अलग-अलग देशों के लिए जिन अधिकारों का अनुमोदन किया गया था, उनकी कुर्बानी ही देने के लिए तैयार हो चला है.

खंडन या
परोक्ष स्वीकृति

वास्तव में इसी बयान में सरकार की ओर से यह भरोसा भी दिलाया गया है कि वह, ‘नयी खोजों को बढ़ावा देने और व्यक्तिगत अधिकारों की हिफाजत करने की जरूरत के प्रति सचेत’ है. यह मौजूदा सरकार के असली सोच को ही दिखाता है जो व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा को, नयी खोजों को बढ़ावा दिए जाने के साथ जोडक़र देखती है. यह एक तरह से इसी की सफाई ज्यादा लगती है कि क्यों सरकार, अनिवार्य लाइसेंस जारी करने के लिए इतनी अनिच्छुक बनी रही है? भीमकाय दवा बहुराष्ट्रीय निगमों तथा कड़े बौद्धिक संपदा अधिकार संरक्षणों के हिमायतियों की तरह, हमारी सरकार भी इस तरह के लाइसेंसों को ‘निजी अधिकारों पर अतिक्रमण’ की तरह ही देखती है. यह इसके बावजूद है कि वैश्विक अनुभव, नयी खोज और कड़े बौद्घिक संपदा संरक्षण के बीच ऐसे किसी संबंध की पुष्टि नहीं करता है. उल्टे सारी दुनिया का अनुभव तो यही दिखाता है कि जो देश, प्रौद्योगिकीय प्रगति के मामले में, इस पहलू से ऐतिहासिक रूप से अपेक्षाकृत उन्नत देशों को पकडऩे की कोशिश कर रहे हों, उनके लिए बौद्घिक संपदा का नरम संरक्षण, सार्वजनिक नव-खोज प्रणालियों के लिए मदद और निजी अधिकारों के मुकाबले सार्वजनिक हितों को ऊपर रखना, मददगार साबित होते हैं.

वास्तव में उक्त प्रेस वक्तव्य में इस तथ्य का जिक्र किया जाना संदेह और भी बढ़ाने वाला है कि भारत में अब तक ‘‘सिर्फ एक’’ अनिवार्य लाइसेंस ही जारी किया गया है और यह लाइसेंस भी, ‘‘एक सुचिंतित तथा सुनिर्धारित प्रक्रिया के बाद (जारी किया गया है) जिसे आगे चलकर देश की सर्वोच्च अदालत तक ने सही माना है.’’ इस तरह का ‘स्पष्टीकरण’ तो वास्तव में इसी की आशंकाओं की पुष्टि करता है कि यह सरकार अनिवार्य लाइसेंस जारी किए जाने को एक दुर्लभ तथा अतिवादी कदम की तरह देखती है. वास्तव में इस स्पष्टीकरण से तो इसी की आशंकाओं की पुष्टिï होती है कि वास्तव में उक्त खंडन भी बड़ी दवा कंपनियों तथा अमरीकी सरकार को इसका भरोसा दिलाने के हिसाब से गढ़ा गया है कि भारत निकट भविष्य में तो कोई अनिवार्य लाइसेंस जारी करने नहीं जा रहा है.

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