अडानी को 15 दिन की मोहलत

Tuesday, September 2, 2014

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अडानी कोल ब्लॉक

अंबिकापुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ में अडानी के कोयला ब्लॉक में खनन का काम बुधवार से फिर से शुरु हो सकेगा. अडानी के इस कोल ब्लॉक में खनन का काम पिछले पांच दिनों से ठप्प पड़ा हुआ था. शुक्रवार को इस खदान के कारण विस्थापित ग्रामीणों ने कंपनी का काम पूरी तरह से बंद करवा दिया था. ग्रामीणों ने खदान के इलाके में वाहनों के परविहन को भी ठप्प कर दिया था.

गौरतलब है कि इस कोयला ब्लॉक में दो साल पहले खनन का काम शुरु किया गया था. परसा, केते, हरिहरपुर, घाट्बर्रा और फतेहपुर के विस्थापित ग्रामीणों का आरोप है कि पुनर्वास की शर्तों का पालन किये बिना कंपनी कोयला खनन का काम कर रही है.

इसी साल मार्च में नेशनल ग्रीम ट्रिब्यूनल ने भी इस खदान पर रोक लगा दी थी. लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ खनन जारी रखने की अनुमति दे दी थी. लेकिन अडानी ने विस्थापितों की मांगों पर कोई कार्रवाई नहीं की. इसके बाद शुक्रवार को ही सैकड़ों विस्थापितों ने अडानी के खदान में कामकाज ठप्प करा दिया था.

मंगलवार को प्रशासन के साथ हुए लिखित समझोते के बाद ग्रामीणों ने अपना आंदोलन 15 दिन के लिए स्थगित कर दिया है. लेकिन ग्रामीणों ने साफ किया है कि अगर 15 दिन में मांग पूरी नहीं हुई तो खदान को बंद करवा कर अनिश्चित कालीन धरना शुरू किया जायेगा.

समझौते में अन्य मांगों के साथ यह तय हुआ है कि 15 दिन के भीतर जमीन का भूमि पूजन कर पुनर्वास के लिए घरों का निर्माण कार्य शुरू किया जायेगा. साथ ही प्रत्येक महीने की 1 तारीख को प्रशासन के साथ बैठकर कार्यो की समीक्षा की जाएगी.

गौरतलब है कि दक्षिण सरगुजा के हसदेव-अरण्य कोल फिल्ड्स के परसा ईस्ट और केते बासन में 2711 हेक्टेयर का हिस्सा राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड को आवंटित किया गया था. लेकिन इस परियोजना में 74 फ़ीसदी की साझेदारी अडानी समूह की है और केवल 26 प्रतिशत का हिस्सा राजस्थान सरकार के पास है.

इस कोल ब्लॉक में 1898 हेक्टेयर हिस्सा वन भूमि है और यह पूरा इलाक़ा हाथियों के रहवास वाला हिस्सा है.

कम्पनी के लिए भू-अधिग्रहण तथा वन भूमि के डायवर्सन वन अधिकार कानून 2006 एवं पेसा कानून के प्रावधानों के विपरीत जाकर किया गया है. जिस पर हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति की शिकायतों पर केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण एवं वन मंत्रालय दुवारा जाँच के आदेश जारी किये गए हैं परन्तु आज तक स्थानीय प्रशासन द्वारा जाँच नहीं की गई है.

हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति के आलोक शुक्ला ने ताज़ा घटनाक्रम को लेकर कहा है कि अडानी और प्रशासन के आश्वासन के बाद ग्रामीणों ने अपना आंदोलन स्थगित किया है लेकिन इस बार जनता आर या पार की लड़ाई के मूड में है. इलाके के ग्रामीणों की लोकतांत्रिक मांगों को कंपनी हिंसक और अलोकतांत्रिक तरीके से ठुकराती रही है. अगर इन 15 दिनों के भीतर कानूनन ग्रामीणों की मांगें नहीं मानी गयी तो क्षेत्र की जनता लंबी लड़ाई लड़ने के लिये सड़क पर उतरने से हिचकिचाएगी नहीं.

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