माओवादियों से सीधे मुकाबले का साल रहा 2017

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ में 2017 माओवादियों से सीधे मुकाबले का साल रहा. इस साल कुल 76 माओवादी मारे गये. राहत की बात ये रही कि कुछ मामलों को छोड़ दें तो पिछले दो सालों की तुलना में इस वर्ष फर्जी मुठभेड़ के आरोप बहुत ही कम लगे. पिछले दो-तीन सालों में बस्तर में पुलिस पर फर्जी मुठभेड़ के दर्जनों आरोप लगे, जो हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे और छत्तीसगढ़ की पुलिस पर सवाल खड़े हुये. लेकिन इस साल ऐसे मामले कम ही सामने आये.

इसका एक बड़ा कारण तो यही माना जा रहा है कि नक्सल ऑपरेशन की कमान संभालते ही विशेष पुलिस महानिदेशक डीएम अवस्थी ने बजाप्ता चिट्ठी लिख कर पुलिस को फर्जी मुठभेड़ की घटनाओं से दूर रहने की चेतावनी दी थी. ऐसे में आंकड़ों को बढ़ाने के लिये फर्जी मुठभेड़ की घटनाओं पर लगभग रोक लगी रही.


सुरक्षाबल के जवानों ने अपनी जान की परवाह किये बिना माओवादियों से मुकाबला किया और जमीनी हालात को देखें तो कई इलाकों में माओवादियों के पैर उखाड़ने में भी सफलता पाई. हालांकि जवानों को इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी और बड़ी संख्या में जवान भी मारे गये.

इस साल सुरक्षाबलों को सुकमा जिले में भारी नुकसान उठाना पड़ा और माओवादियों के साथ लड़ाई में केवल दो हमलों में ही 40 जवानों को अपनी जांन गंवानी पड़ी. यही कारण है कि इस साल नवंबर तक छत्तीसगढ़ में माओवादियों के साथ लड़ाई में मारे जाने वाले जवानों की संख्या 60 तक पहुंच गई.

पुराने आंकड़ों को देखें तो 2014 में भी माओवादियों के साथ मुठभेड़ में मारे जाने वाले जवानों की संख्या 60 ही थी. 2015 में यह 48 और 2016 में 38 थी. लेकिन पिछले साल यानी 2016 की तुलना में इस साल माओवादी हमलों में मारे जाने वाले आम नागरिकों की संख्या में कमी आई है. 2016 में 69 आम नागरिक मारे गये थे, जबकि इस साल यह संख्या 66 रही.

माओवादियों के प्रभाव क्षेत्र की बात करें तो इस साल सुरक्षाबलों ने माओवादियों के उन इलाकों पर धावा बोला, जहां उनकी लगभग समानांतर सरकार चलती थी. कई इलाके तो पूरी तरह से माओवादियों से मुक्त कराये गये. इनमें सुकमा, दंतेवाड़ा, बीजापुर और नारायणपुर के इलाके शामिल हैं.

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