बस्तर को बचाना खुद को बचाना है

नथमल शर्मा
अपने बस्तर में दुख पसरा हुआ है. यह दुख उत्तर प्रदेश,बिहार से लेकर हरियाणा तक फैल गया है. दिल्ली तक भी. इन प्रदेशों के गांवों में जवानों के परिजन बिलख रहे हैं. बस्तर के जंगलों की बारूद ने एक बार फिर पच्चीस देशभक्त सपूतों को हमसे छीन लिया. इन घरों में मातम है. टीवी चैनल वाले ऐसी रोती -बिलखती माँ,बहनों की तस्वीरें दिखा रहे हैं. शायद वे भी दुखी हैं. हो सकता है ऐसा “लाइव कवरेज ” कर रहे रिपोर्टर और कैमरामैन की आंखें भी नम हो गई हों.

बस्तर के जंगलों में एक बार फिर गोलियां चली. सुकमा के पास बुरकापाल में नक्सलियों (?) ने घात लगाकर जवानों पर सीधे हमला किया. करीब सौ जवान थे. और तीन सौ नक्सली या माओवादी या आंतकी या और अब वामपंथी उग्रवादी. ये वामपंथी उग्रवादी शब्द इस बार देश के गृहमंत्री ने दिया है. तो हमारे सौ जवानों पर इन तीन सौ उग्रवादियों ने हमला कर दिया. इसमें पच्चीस जवान मारे गए. दिन में करीब बारह बजे सुकमा के पास ये हमला हुआ. इसकी खबर आते-आते शाम हो गई. जंगल की आग की तरह नहीं फैलती बस्तर की खबर. आज भी बचे घने जंगलों से बाहर आने में खबरों को बहुत समय लग जाता है. कई खबरें तो कभी बाहर आती ही नहीं.


बस्तर में समानांतर सरकार है नक्सलियों की। हमारी लोकतांत्रिक सरकार के अफसर भी संभाल रहे हैं बस्तर को। ये ब्यूरोक्रेट्स बहुत ताकतवर है.कई बार तो लगता है कि किसी के प्रति भी जवाबदेह नहीं है. शायद इसीलिए इतने ताकतवर है. लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी यानी जनप्रतिनिधि तो बस्तर में अब सिर्फ नाम के ही हैं. गांवों के सरपंच से लेकर देश की सबसे बड़ी चौपाल संसद तक के लिए निर्वाचित प्रतिनिधि हैं. बस्तर में पिछले दस बरसों में ही करीब तीन हजार लोग मारे गये हैं. संसद और विधानसभा में हमारे इन प्रतिनिधियों ने इतने (तीन हजार ) शब्द भी नहीं कहे हैं. सरपंचों,जिला पंचायतों के प्रतिनिधियों,पार्षदों और राजनीतिक दलों के पदाधिकारियों की तो फिर बात ही क्या की जाए। और हाँ,मीडिया के साथी ? बोलने वाले पत्रकार सबकी आंखों की किरकिरी बने हुए हैं. कुछ कानूनी दांव-पेंचों में फंसा दिए गए हैं तो कुछ को बस्तर छोड़ने मजबूर कर दिया गया. एनजीओ की अपनी कार्यप्रणाली और प्राथमिकताएं। इन सबके बीच बस्तर पिसते रहा, पिस रहा है, सिसक रहा है.

दो बरस पहले आए थे देश के प्रधानमंत्री बस्तर. स्कूली बच्चों से मिले.टेबल पर उंगलियां थपथपाते काफी देर बातें की। नीली धारी वाली शर्ट और गाॅगल्स पहने एक युवा कलेक्टर को दबंग भी कहा।एक अफसर बिना सरकार से पूछे ही सीधे प्रधानमंत्री से मिल लिया. आज उस अफसर से कोई नहीं मिलता. प्रधानमंत्री ने जनता से कहा कि कंधों पर बंदूक नहीं हल होना चाहिए. करीब 24 हजार करोड़ रूपये के एमओयू भी हस्ताक्षरित हुए। मई 2015 में यह सब करते हुए हमारे प्रधानमंत्री ने कहा कि अब बस्तर के लोग भी जुड़ेंगे मुख्यधारा से। ऐसी बहुत सारी बातें कही.प्रधानमंत्री बहुत अच्छी,लोकप्रिय और बहुत सारी बातें करते भी हैं. उनकी बातें लोग पसंद करते हैं. बंदूक नहीं हल वाली बात कहे अभी दो बरस भी नहीं हुए हैं कि बस्तर के जंगलों में गोलियों की आवाज़ गूंज उठी. अब देश के गृहमंत्री आए हैं. कहा कि बहुत हुआ. अब रणनीति बदलेंगे.

इसमें मारे गए (नहीं शहीद हुए ) पच्चीस जवानों को देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह और प्रदेश के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने पुष्पचक्र अर्पित कर श्रद्धांजली दी.गृहमंत्री ने कहा कि इन जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा. आठ मई को दिल्ली में एक बड़ी बैठक करेंगे. रणनीति बदलेंगे. ऐसा कहकर अपने नेताओं,अफसरों से जानकारी लेकर वे चले गए दिल्ली. इस बार यह सवाल ही नहीं हुआ कि नक्सलियों से बात की जाएगी क्या ? अक्सर ऐसा पूछा जाता था। राजनीति और व्यवस्था चे बड़े खेल होते हैं. मीडिया भी इसमें भागीदार होता है. कई बार हाथी,घोड़े,ऊंट और वज़ीर से प्यादे बहुत तेज भागते हैं. कई बार बस्तर के जंगलों की इबारत स्याही से नहीं लिखी जाती. हरे जंगल लाल हो रहे हैं. निर्दोष लोगों के खून से लाल हो रहे इन जंगलों में गोलियों की नहीं इंसानियत की आवाज़ की जरूरत है.बस्तर पर लिखते समय हम बार-बार लिख चुके हैं कि हर समस्या का समाधान गोलियों से नहीं होता. और यह सिर्फ मानवाधिकार वाली बात नहीं है. “ऐसे मानवाधिकार वादियों ” से सरकार और व्यवस्था संभाल रहे लोग बहुत चिढ़ते हैं. दिल्ली के दाढ़ी वालों को नापसंद करते हैं. खैर वह फिलहाल अलग.

सवाल अपने छत्तीसगढ़ का है. अपने बस्तर का है. बस्तर के जंगलों में प्रकृति का अकूत खजाना छिपा है. इन्हीं जंगलों में प्रकृति की सबसे प्यारी संतान आदिवासी भी हैं. इसी खासियत ने बस्तर को उन लोगों का दुश्मन बना दिया है जिन्हें गांधी “धनपिशाच” कहा करते थे. ये धनपिशाच हमारे बस्तर की एक – एक इंच जमीन खोद लेना चाहते हैं. जंगलों को काट डालना चाहते हैं. विकास की मुख्यधारा (?) में लाना चाहते हैं बस्तर को। उस बस्तर को जिसे बचाने के लिए पचास बरस पहले राजा प्रवीरचंद भंजदेव ने सरकार की गोलियां खाई. बेमौत मारे गए। उसी बस्तर के आदिवासी आज सरकार-पुलिस-नक्सलियों इन तीनों के बीच पिस रहे हैं. नेता-अफसर-उद्यमी की त्रयी इस बस्तर से इसका सब कुछ लूटने को आतुर दिखती है.

पच्चीस जवानों की शहादत के बाद सोशल मीडिया में भी खूब बातें हो रही है. जो कभी बस्तर गए नहीं. वहां के माड़ देखे नहीं. केशकाल के घुमावदार रास्ते को पार नहीं किया. आदिवासियों के हाट-बाजार को समझे नहीं. वे भी विशेषज्ञता के साथ समाधान सुझा रहे हैं. सेना को जंगलों में उतार दिया जाए। गोलियां चलाकर नक्सलियों को भगा दिया जाए। वगैरह -वगैरह.याद रखना चाहिए कि यह अब चारू मजूमदार का नक्सली आंदोलन नहीं रहा. चालीस हजार के टर्न ओवर वाली जंगल सरकार और छत्तीसगढ़ सरकार की लड़ाई है. इससे हर तरीके,हर स्तर और कूटनीति के साथ ही तो निपटोगे। इसमें एक तरीका चर्चा भी है. क्यों नहीं इसके लिए कोशिश की जाती. गांधीवादी केयूरभूषण और उनके साथी अपने छत्तीसगढ़ में ही है. और प्रदेशों में भी ऐसे शांतिप्रिय राजनेता,सामाजिक कार्यकर्ता हैं. इनसे चर्चा की जाए। पहल तो सरकार को ही करनी होगी. निश्चित रूप से समाज जुड़ेगा/जुटेगा। बस्तर के जंगलों से खौफ खत्म नहीं तो कम करिए. राजनीतिक दलों के युवा साथी भी वहां जाने के लिए तैयार है. हमें पता है कि ये सब आदर्शवादी बातें लग सकती हैं,लेकिन आदर्श को ही तो व्यवहार में उतारना जरूरी है. बस्तर को बचाना स्वयं को बचाना ही है आप,हम ,सब उससे अलग नहीं है,ना हो सकते। सवाल ये है कि हम कितने गंभीर और ईमानदार है. मुक्तिबोध के शब्दों में – तुम्हारी पालिटिक्स क्या है पार्टनर !

* लेखक वरिष्ठ पत्रकार और इवनिंग टाइम्स बिलासपुर के संपादक हैं.

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