आदिवासी बच्चों की मौत में छत्तीसगढ़ आगे

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ आदिवासी बच्चों की मौत के मामले में देश में चौंथे नंबर पर आ गया है.देश में आदिवासी जनसंख्या में पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर प्रति 1000 में 95.7 है, वहीं छत्तीसगढ़ में यह आंकड़ा 128.5 है. यह सरकारी आंकड़ा छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के विकास और स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के दावों की पोल खोलने वाला है.

कुपोषण के कलंक से जूझ रहे छत्तीसगढ़ में बच्चों की मौत का यह आंकड़ा इसी सप्ताह संसद में सामने आया है. एक सवाल के जवाब में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते ने दावा किया कि सरकार इस समस्या से ग्रस्त इलाकों को अलग से चिन्हित कर के वहां अभियान चला रही है.


आंकड़ों के अनुसार पांच वर्ष से कम आयु के अनुसूचित जनजाति के बच्चों की मौत का सबसे भयावह आंकड़ा मध्यप्रदेश का है, जहां प्रति एक हज़ार अनुसूचित जनजातियों के बच्चों में से 140.7 बच्चे 5 साल की उम्र से पहले ही मौत के शिकार हो जाते हैं. बच्चों की मौत का दूसरा घर झारखंड है, जहां 138.5 बच्चे अपना पांचवां जन्मदिन नहीं मना पाते.

आदिवासी बच्चों की मौत में तीसरा नंबर ओडिशा का है, जहां प्रति 1000 आदिवासी बच्चों में से 136.3 बच्चों की पांच साल से पहले मौत हो जाती है.

चौंकाने वाली बात ये है कि आदिवासी बहुल पूर्वोत्तर के राज्यों में यह संख्या आधी से भी कम है. नागालैंड में बच्चों की मौत का आंकड़ा केवल 65.8 है. इसी तरह सिक्किम में यह 35.9 है. मेघालय में यह 74 है. चिकित्सकों का कहना है कि कुपोषण इन बच्चों की मौत का एक बड़ा कारण है और सरकारी योजनायें कागज़ों में चाहे कितनी भी अच्छी लगें लेकिन धरातल पर हकीकत कुछ और होती हैं. कुपोषण से लड़ने का दावा करने वाले अधिकांश आंगनबाड़ी या दूसरे केंद्रों में बच्चों को ठीक से पौष्टिक खाना तक नहीं मिल पाता है.

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