वन्यजीव अपराध रोकने में छत्तीसगढ़ फेल

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ में वन्यजीव अपराध को रोकने की दिशा में सरकार लगातार फेल हो रही है. यही कारण है कि राज्य में धड़ल्ले से वन्यजीवों का शिकार और उसकी तस्करी हो रही है. रामानुजगंज से लेकर कोंटा तक हालात एक जैसे हैं.

राज्य में हाल ही में इंद्रावती टाइगर रिजर्व में मारे गये एक बाघ की खाल बरामद की गई थी. इसके अलावा तस्करों से पैंगोलिन भी बरामद किया गया. इसी साल केंद्र सरकार की एक रिपोर्ट में यह राज खुला कि राज्य में बाघों की संख्या 46 से घट कर केवल 19 रह गई है. वन्यजीवों के तस्कर मोबाइल पर वीडियो भेज-भेज कर सौदा कर रहे हैं लेकिन अधिकारी इस दिशा में कार्रवाई करने से बच रहे हैं.


अब वन एवं पर्यावरण विभाग की एक रिपोर्ट बता रही है कि छत्तीसगढ़ में वन्यजीवों के अपराध को रोकने की दिशा में उदासीनता है.

केंद्रीय वन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि वन्यजीवों को लेकर 2014 में 60 मामले दर्ज़ किये गये थे. इसी तरह 2015 में 28 और 2016 में वन्यजीव अपराध के 42 मामले दर्ज़ किये गये थे.

लेकिन अगले साल यानी 2017 में राज्य में वन्यजीव अपराध के 40 मामले दर्ज़ हुये और 2018 में यह आंकड़ा घट कर महज 15 रह गया. यह वही दौर है, जब देश भर में बाघों की संख्या बढ़ी और छत्तीसगढ़ में बाघों की संख्या घट कर आधी रह गई.

छत्तीसगढ़ में विन विभाग के दस्तावेज़ों को देखें तो पता चलता है कि विभाग के क्षेत्रिय अधिकारी कई कई महीनों तक अपने इलाके में नहीं जाते. सबसे बुरा हाल बस्तर का है. बस्तर के इलाके में माओवादियों का हवाला दे कर अधिकारी फिल्ड में जाने से बचते हैं लेकिन उन्हीं जंगल के इलाकों में सड़क निर्माण और कथित नाइट पेट्रोलिंग के नाम पर लाखों रुपये हर साल फूंके जा रहे हैं.

यहां तक कि वन विभाग जंगल के जिन इलाकों में जाने से डरने का हवाला देता है, उन्हीं इलाकों में वन विभाग टेंपरेरी हट बनाने के नाम पर हर साल पैसे खर्च करने का दावा करता है. हालत ये है कि वन्यजीवों की तस्करी के मामले में भी वन विभाग कार्रवाई करने से बच रहा है.

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