यूपी में अमित शाह की अग्निपरीक्षा

नई दिल्ली | विशेष संवाददाता: यूपी चुनाव अमित शाह के लिये अग्निपरीक्षा के समान है. जिस यूपी के लोकसभा चुनाव के समय भाजपा को 80 में से 71 सीटें मिली थी उसमें इस बार 403 विधानसभा सीटों में से 202 जीतने की चुनौती है. इससे पहले यूपी का समर भाजपा के लिये उतना कठिन नहीं लग रहा था. समाजवादी पार्टी में हुये दंगल के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की छवि चक्रव्यूह को भेद पाने वाले राजनीतिक के तौर पर हुई है. समाजवादी पार्टी के दंगल के समय उनकी नाव डवांडोल लग रही थी परन्तु अब लहरें सिमटकर अखिलेश यादव के पक्ष में आ गई हैं. इसके बाद कांग्रेस के साथ हुये गठबंधन ने यूपी की जनता के सामने एक भरोसेमंद विकल्प पेश किया है. जिसका सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा को होता प्रतीत हो रहा है.

खबरों के अनुसार यह गठबंधन प्रियंका गांधी तथा डिंपल यादव की जोड़ी को प्रचार के लिये उतारने वाला है. जिसका सबसे ज्यादा फायदा कांग्रेस को होने जा रहा है. लंबे समय से कांग्रेस के कार्यकर्ता प्रियंका गांधी के राजनीति में सक्रिय होने की मांग उठाते रहें हैं. कम से कम प्रियंका के पूरे प्रदेश में प्रचार करने से कांग्रेसी नेताओँ तथा कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा. कहा जाता है कि युद्ध में हथियार नहीं हौसले लड़ते हैं. यह कहावत अब कांग्रेस पर लागू होगी तथा वह आक्रमक तरीके से चुनाव मैदान में उतरेगी.


दूसरी तरफ मायावती के अपने प्रतिबद्ध वोटर हैं. मायावती चाहेगी कि उसे अल्पसंख्यकों का समर्थन मिले परन्तु उसमें अब कठिनाई आ सकती है. आमतौर पर देखा गया है कि अल्पसंख्यक रणनीतिक तौर पर वोट करते हैं तथा जिताऊ पार्टी या गठबंधन को वोट देते हैं. यदि यह रुझान इस बार भी बना तो मायावती के बजाये अल्पसंख्यकों का वोट समाजवादी-कांग्रेस गठबंधन के खाते में जाता दिख रहा है.

दूसरी तरफ भाजपा की अंदरुनी स्थिति यह है कि यूपी विधानसभा चुनाव की टिकटे बांटने का एकाधिकार चुनाव समिति की दो बैठकों के बाद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को दे दिया गया है. प्रधानमंत्री के चुनाव क्षेत्र बनारस में लगातार सात बार के विधायक श्यामदेव रायचौधरी ‘दादा’ का टिकट कटने के बाद से प्रदर्शन हो रहे हैं. मनमाने टिकट बंटवारे पर आरएसएस के यूपी में सक्रिय छह में से चार क्षेत्रीय प्रचारकों ने नाराजगी जताई है.

यह पहला मौका है जब पार्टी कार्यकर्ता इतनी तादाद में टिकट बंटवारे के ख़िलाफ़ नेताओं की गाड़ियों के आगे लेटकर रास्ता रोक रहे हैं, अमित शाह समेत प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्य और प्रदेश प्रभारी ओम माथुर के पुतले फूंके जा रहे हैं. दलबदल कर आने वाले तथा पार्टी के बड़े नेताओं के रिश्तेदारों को टिकट बांटना मुद्दा बनता जा रहा है.

यहां तक कि गोरखनाथ पीठ के महंत आदित्यनाथ की हिंदू युवा वाहिनी ने ‘देश में मोदी यूपी में योगी’ के नारे के साथ पार्टी के समांतर उम्मीदवार तक उतार दिये हैं. प्रत्यक्ष तौर पर सांसद आदित्यनाथ मुख्यमंत्रई पद की दावेदारी नहीं कर रहें हैं परन्तु लेकिन वे चाहे तो पूर्वांचल में भाजपा का खेल बिगाड़ सकते हैं.

पहले भाजपा ने पाकिस्तान के अंदर घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी के जरिये कालेधन के खात्मे को मुद्दा बनाया था लेकिन अब दोनों एजेंडे से धीरे-धीरे ग़ायब हो रहे हैं. सभाओं में भाजपा नेता जब नोटबंदी के फ़ायदों का जिक्र करते हैं तब चुप्पी छाई रहती है. इसके बजाय अब पुराने आजमाये नुस्खे यानी धार्मिक ध्रुवीकरण पर ज़ोर है. मुज़फ्फ़रनगर के कैराना से हिंदुओं के तथाकथित पलायन और भाजपा की सरकार बनने पर माफिया मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद और आज़म ख़ान को जेल भेजने को मुद्दा बनाया जा रहा है.

नोटबंदी ने कितनी गहराई तक वोटरों पर असर डाला है इसके आंकड़ों अब तक सतह पर नहीं आये हैं. जानकारों का मानना है कि नोटबंदी से यूपी के किसान से ख़फ़ा हैं. उन्हें अपनी फसलों का वाज़िब दाम नहीं मिला है. दूसरी तरफ गेहूं पर केन्द्र ,सरकार ने आयात शुल्क पूरी तरह से हटा दिया है ताकि विदेशों से सस्ता गेहूं आयात हो सके.

माना जा रहा है कि इसका सबसे बुरा असर यूपी के के गेहूं उत्पादक किसानों पर पड़ने जा रहा है. उल्लेखनीय है कि देश में सबसे ज्यादा गेहूं का उत्पादन उत्तर प्रदेश तथा पंजाब में होता है. इसमें उत्तर प्रदेश गेहूं के उत्पादन के मामले में पहले नंबर पर है तथा पंजाब दूसरे नंबर पर है. उत्तर प्रदेश की 76 फीसदी आबादी तथा पंजाब की 63 फीसदी आबादी खेती पर ही निर्भर है.

इस कारण से सबसे ज्यादा नुकसान इन्हीं दोनों राज्यों के गेहूं उत्पादक बड़े, छोटे एवं मध्यम किसानों पर पड़ेगा. यहां के किसानों को अपने गेहूं को कम कीमत पर बेचना पड़ेगा. जिससे उन्हें नुकसान होगा. इससे गेहूं उत्पादक किसानों में केन्द्र सरकार के खिलाफ माहौल बनेगा.

इस बार लोकसभा चुवा के समान ‘मोदी लहर’ का अभाव है. उस समय नारों तथा वादों पर भरोसा करके लोगों ने भाजपा को वोट दिया था. अब उन नारों तथा वादों को कसौटी पर कसा जायेगा. पूरा विपक्ष इस मामले में एकजुट है तथा लोकसभा चुनाव के समय किये गये वादों, चाय पे चर्चा के समय हुये बातों की जमीनी हकीकत से जनता को रूबरू कराने की जी जान से कोशिश कर रहा है.

तमाम अंदुरुनी तथा बाहरी हालात भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के नियंत्रण की बाहर की चीज है. उसके बावजूद अमित शाह को फिर से यूपी चुनाव जिताने की कमान सौंप दी गई है. ऐसे में वे इस विधानसभा चुनाव में भी लोकसभा चुनाव के समान करिश्मा दोहरा पायेंगे कि नहीं या उससे ज्यादा या कम कर पायेंगे इसका खुलासा मतगणना के दिन होगा.

कुलमिलाकर यूपी चुनाव अमित शाह के लिये अग्निपरीक्षा के समान है. इस अग्निपरीक्षा में यदि वे सफल होते हैं तो उन्हें भारतीय राजनीति का बेताज बादशाह कहा जाने लगेगा. हां, हार का ठीकरा भी उन्हीं के सिर पर फोड़ा जा सकता है.
(बीबीसी हिन्दी के इनपुट के आधार पर)

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