छत्तीसगढ़ में एक और बाघ मारा गया

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ के गुरुघासीदास अभयारण्य में एक और बाघ मारा गया. वाइल्ड लाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो ने सूरजपुर के बिहारपुर से बाघ की खाल के साथ शिकारियों को पकड़ा है.

जिन्हें आरंभिक पूछताछ के बाद छत्तीसगढ़ के वन विभाग को सौंप दिया गया है.

जून के महीने में भी गुरुघासीदास अभयारण्य में एक बाघिन मारी गई थी.

इससे पहले पिछले पखवाड़े कांकेर से एक बाघ की खाल बरामद की गई थी. इसे पुलिस विभाग ने पकड़ा था.

पुलिस के अनुसार मध्यप्रदेश के वन विभाग को खबर मिली थी कि कुछ शिकारी बाघ की खाल बेचने की फिराक में हैं.

इसके बाद मध्यप्रदेश के सिंगरौली ज़िले के माड़ा वन परिक्षेत्र की टीम और वाइल्ड लाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो ने इसकी निगरानी शुरु की.

इस टीम ने पहले शिकारियों को सिंगरौली ज़िले के मकरोहर गांव में बुलाने की कोशिश की. लेकिन आरोपी मध्यप्रदेश की सीमा में नहीं आना चाहते थे.

इसके बाद मकरोहर से लगभग पांच किलोमीटर दूर, छत्तीसगढ़ के सूरजपुर के बिहारपुर इलाके में बाघ की खाल के साथ आरोपियों को दबोचा गया.

रविवार को इन आरोपियों को पूछताछ के लिए मध्यप्रदेश के वैढ़न थाने में रखा गया, जिसे बाद में छत्तीसगढ़ वन विभाग को सुपुर्द कर दिया.

आरंभिक तौर पर वाइल्ड लाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो को पता चला कि छत्तीसगढ़ के ही रहने वाले इन आरोपियों ने गुरुघासीदास अभयारण्य में शिकार को अंजाम दिया है.

इससे पहले इसी साल जून के पहले सप्ताह में गुरुघासीदास अभयारण्य के ही रामगढ़ रेंज स्थित सलगवा खुर्द में एक बाघिन का शव मिला था.

आशंका जताई गई थी कि मवेशियों पर हमले से नाराज़ ग्रामीणों ने जहर दे कर बाघिन को मार डाला था.

अगर बाघ के ताज़ा शिकार के मामले को देखा जाए तो पिछले चार महीने में ही गुरुघासीदास अभयारण्य के दो बाघ कम हो गए हैं.

2019 में टाइगर रिजर्व बनाने की हुई थी घोषणा

राज्य सरकार ने 2019 में छत्तीसगढ़ राज्य वन्य जीव बोर्ड की 11वीं बैठक में कोरिया जिले के गुरू घासीदास राष्ट्रीय उद्यान को टाइगर रिजर्व घोषित करने का निर्णय लिया था.

इस फ़ैसले का चौथा साल आ चुका है लेकिन राज्य सरकार इस फैसले पर अमल नहीं कर सकी है.

2022 में भी इस टाइगर रिजर्व का कहीं अता पता नहीं है.


हालत ये है कि राज्य सरकार के अनुरोध के बाद केंद्र सरकार ने भी इस टाइगर रिजर्व को मंजूरी दे दी थी.

इस मंजूरी को भी एक साल से अधिक का वक्त गुजर चुका है. लेकिन खनन के लिए रातों-रात फैसले लेने वाली राज्य सरकार इस मंजूरी के बाद से चुप है.

राज्य सरकार इसे अपनी उपलब्धि के तौर पर गिनाते रही है. भाषणों और विज्ञापनों में भी इसका जिक्र होता रहा है. लेकिन धरातल पर यह टाइगर रिजर्व सामने नहीं आ पाया है.

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