हसदेव में पेड़ों की कटाई पर रोक

नई दिल्ली | डेस्क: सुप्रीम कोर्ट में राजस्थान विद्युत् निगम और सरकार ने कहा है कि अगली सुनवाई तक हसदेव के इलाके में पेड़ों की कटाई नहीं की जाएगी. मामले की सुनवाई अब नवंबर में होगी.

हसदेव अरण्य में राजस्थान सरकार को आवंटित और अडानी के एमडीओ वाले कोयला खदानों को अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव ने चुनौती दी थी.

इसके अलावा अंबिकापुर के डी के सोनी ने भी इस मामले में याचिका दायर की थी.

तीसरी याचिका घाटबर्रा गांव के जयनंदन पोर्ते और हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति के लोगों ने दायर की थी. घाटबर्रा के लोगों का आरोप है कि उनका वनाधिकार पट्टा गैरकानूनी तरीके से रद्द करते हुए परसा ईस्ट केते बासन खदान का काम शुरु किया गया है.

इससे पहले पिछले महीने इससे जुड़ी सुनवाई में अदालत ने भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद यानी आईसीएफआरई और भारतीय वन्य जीव संस्थान यानी डब्ल्यूआाईआई की रिपोर्ट तलब की थी.

लेकिन आज भी वह रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की जा सकी.

इसके बाद राजस्थान सरकार की ओर से मुकुल रोहतगी ने मामले में समय की मांग की.

इस मामले में याचिकाकर्ता के वकीलों ने कहा कि 13 सितंबर की तरह ही, सुनवाई की अगली तारीख तक परसा ईस्ट केते बासेन के दूसरे चरण की पेड़ों की कटाई और खदान से संबंधित दूसरे कामों पर रोक जारी रहे, जिसे स्वीकार कर लिया गया.

याचिकाकर्ताओं की ओर से सीयू सिंह, प्रशांत भूषण और नेहा राठी उपस्थित थे.

क्या है मामला

असल में भारत सरकार वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने जुलाई 2011 में 1898 हेक्टर में परसा ईस्ट केते बासन कोल ब्लॉक के लिए प्रथम चरण की अनुमति प्रदान की. जबकि भारत सरकार की ही फॉरेस्ट एडवाइजरी कमिटी ने इस आबंटन को निरस्त करने की अनुशंसा की थी.

बाद में 2012 में दूसरे चरण का फाइनल क्लीयरेंस भी जारी कर दिया गया और 2013 में खनन का काम शुरु भी कर दिया गया.

इस आदेश से व्यथित होकर बिलासपुर के अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव द्वारा एक अपील एनजीटी, प्रिंसिपल बेंच में दायर की गई थी.

एनजीटी ने कार्यों को निलंबित कर दिया तथा आदेशित किया कि पर्यावरण और वन मंत्रालय फॉरेस्ट एडवाइजरी कमिटी से नई राय लेगी. एनजीटी ने सुझाव दिया कि इसके लिए भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद और भारतीय वन्यजीव संस्थान से राय और विशेषज्ञ ज्ञान ले सकती है.

यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है.

इसके बाद वर्ष 2017 में पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने केते एक्सटेंशन का अप्रूवल इस शर्त के साथ जारी किया कि दोनों संस्थाओं से हसदेव अरण्य कोल फील्ड की जैव विविधता पर रिपोर्ट ली जाएगी.

इस दौरान अंबिकापुर के अधिवक्ता डीके सोनी ने भी इस मामले में याचिका दायर की.

इधर तीसरी याचिका हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति और जयनंदन पोर्ते ने दायर की है.

इन तीनों मामलों की सुनवाई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और हिमा कोहली की पीठ कर रही है.

रिपोर्ट में क्या दी है चेतावनी?

हसदेव अरण्य कोल फील्ड, छत्तीसगढ़ के 3 जिलों सरगुजा, सूरजपुर और कोरबा में फैला बहुमूल्य जैव विविधता वाला वन क्षेत्र है. जिसमें परसा, परसा ईस्ट केते बासन, तारा सेंट्रल और केन्ते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक आते हैं.

वर्तमान में सिर्फ परसा ईस्ट केते बासन में खनन चालू है.

इसके अलावा राज्य सरकार ने परसा और केते एक्सटेंशन में इसी साल खनन की अनुमति दी है.

277 पेज की रिपोर्ट में भारतीय वन्यजीव संस्थान ने सभी महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि देश के 1 प्रतिशत हाथी छत्तीसगढ़ में हैं, जबकि हाथी मानव द्वंद में 15 प्रतिशत जनहानि छत्तीसगढ़ में होती है.

रिपोर्ट में उल्लेखित किया गया है कि किसी एक स्थान पर कोल खनन चालू की जाती है तो उससे हाथी वहां से हटने को मजबूर हो जाते हैं और दूसरे स्थान पर पहुंचने लगते हैं, जिससे नए स्थान पर हाथी-मानव द्वंद बढ़ने लगता है. ऐसे में हाथियों के अखंड आवास, हसदेव अरण्य कोल फील्ड क्षेत्र में नई माइन खोलने से दूसरे क्षेत्रों में मानव-हाथी द्वंद इतना बढ़ेगा कि राज्य को संभालना मुश्किल हो जाएगा.

रिपोर्ट में कहा-नो गो एरिया घोषित करें

एनजीटी ने अपने आदेश में कुछ प्रश्नों का उत्तर देने को आदेशित किया था. जिनमें से कुछ प्रश्न थे-
(अ) अगर खनन के पक्ष में हैं तो क्या शर्तें डालना चाहेंगे?
अपनी रिपोर्ट में भारतीय वन्य जीव संस्थान ने कहा कि वर्तमान में परसा ईस्ट केते बासन में खनन चालू है और खनन की अनुमति सिर्फ इसी के लिए रहनी चाहिए. अद्वितीय, अनमोल और समृद्ध जैव विविधता और सामाजिक सांस्कृतिक मूल्यों को देखते हुए हसदेव अरण्य कोल फील्ड का और उसके चारों तरफ का एरिया नो-गो एरिया घोषित किया जाना चाहिए.

(ब) क्या परसा ईस्ट केते बासन क्षेत्र में संकटग्रस्त वनस्पति और जीव जंतु थे और हैं?
इसके जवाब में भारतीय वन्य जीव संस्थान ने रिपोर्ट में कहा है- हां यहाँ दुर्लभ, संकटग्रस्त और विलुप्तप्राय वन्यप्राणी थे और हैं.

(स) क्या हसदेव अरण्य कोल फील्ड क्षेत्र में वन्यजीवों, विशेष रूप से हाथियों का कारीडोर है?
भारतीय वन्यजीव संस्थान ने रिपोर्ट में कहा- हां… हसदेव अरण्य में पूरे वर्ष भर हाथी रहते हैं. यहां तक कि कोरबा वन मंडल में, हसदेव अरण्य कोल फील्ड क्षेत्र के पास बाघ भी देखा गया है. हसदेव अरण्य कोल फील्ड, अचानकमार टाइगर रिजर्व, भोरमदेव वन्यजीव अभ्यारण तथा कान्हा टाइगर रिज़र्व से जुड़ा हुआ है.

आदिवासी वन पर आश्रित हैं

रिपोर्ट में बताया गया है कि हसदेव अरण्य कोल फील्ड और उसके आसपास के क्षेत्र में मुख्य रूप से आदिवासी रहते हैं. जो कि वनों पर बहुत ज्यादा आश्रित हैं. नान टिंबर फॉरेस्ट प्रोड्यूस से इन्हें 46 प्रतिशत मासिक आय होती है. इसमें जलाऊ लकड़ी, पशुओं का चारा, दवाई वाली वनस्पति, पानी शामिल नहीं है. अगर इनको शामिल कर लिया जाए तो कम से कम से कम 60 से 70 प्रतिशत इनकी आय वनों से होती है.

भारतीय वनजीव संस्थान ने यहाँ कई वन्य प्राणियों की कैमरे में उपस्थिति पाई है. जिनमें भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अधिसूची एक के हाथी, भालू, भेड़िया, बिज्जू, तेंदुआ, चोसिंगा, रस्टी स्पॉटेड बिल्ली, उड़न गिलहरी, पैंगोलिन. अधिसूची दो के सियार, जंगली बिल्ली, लोमड़ी, लाल मुंह के बन्दर, लंगूर, पाम सीवेट, स्माल सीवेट, रूडी नेवला, कॉमन नेवला. अधिसूची तीन के लकड़बग्गा, स्पॉटेड डिअर, बार्किंग डिअर, जंगली सूअर. अधिसूची तीन के खरगोश, साही शामिल है. आईयूसीएन की रेट लिस्ट के अनुसार यहां पर दो प्रजातियां विलुप्तप्राय श्रेणी की हैं, तीन संकटग्रस्त हैं, पांच पर खतरा आ सकता है और 15 सामान्य हैं.

रिपोर्ट में इसके अलावा बताया गया है कि इस क्षेत्र में 92 प्रकार के पक्षी भी रहते हैं. क्षेत्र की वनस्पति पर भी इस रिपोर्ट में विस्तार से प्रकाश डाला गया है.

* इस रिपोर्ट को 19 अक्टूबर की शाम 7:54 पर अद्यतन किया गया है.

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