सीबीएसई की किताब में माओवादी नेता किशनजी?

रायपुर | संवाददाता: सीबीएसई के पाठ्यक्रम में माओवादी नेता किशन जी के उल्लेख किये जाने को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं.दसवीं के पाठ्यक्रम में शामिल एनसीईआरटी की सोशल साइंस डेमोक्रेटिक पॉलिटिक्स-2 में किशन जी और उनकी विचारधार को लेकर रोशनी डाली गई है. गौरतलब है कि मल्लोजुला कोटेश्वर राव ऊर्फ किशनजी को भारत में प्रतिबंधित सीपीआई माओवादी की सेंट्रल कमेटी के सदस्य के रुप में जाना जाता है. 24 नवंबर 2011 को कोबरा जवानों ने किशन जी को बंगाल के मिदनापुर में मार गिराया था.

हालांकि टाइम्स ऑफ इंडिया की इस खबर को लेकर किताब की संपादक मंडल के सदस्य ने आपत्ति जताई है और कहा है कि जिस किशन जी का जिक्र किताब में किया गया है, वो समाजवादी नेता किशन पटनायक हैं, न कि माओवादी नेता किशन जी. किसान आन्दोलन : दशा और दिशा, भारतीय राजनीति पर एक दृष्टि और विकल्पहीन नहीं है दुनिया जैसी उनकी किताबें प्रसिद्ध रही हैं. इसके अलावा उनके संपादन में प्रकाशित होने वाली सामयिक वार्ता महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में शुमार होती रही है.


टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी एक खबर में दावा किया है कि सीबीएसई द्वारा संचालित स्कूलों के लिये एनसीईआरटी की सोशल साइंस डेमोक्रेटिक पॉलिटिक्स-2 के छठवें अध्याय में पालिटिकल पार्टिस शीर्षक से विभिन्न विचारधाराओं का उल्लेख किया गया है. इसी पाठ के पृष्ठ 76 पर ‘राजनीति की नैतिक ताकत’ शीर्षक से शुरुआत की गई है कि एख वैकल्पिक राजनीतिक ढांचा खड़ा करने की बात से किशन जी का क्या मतलब था? किशन जी के वैकल्पिक राजनीतिक गठन से क्या आशय है? किताब में उल्लेख किया गया है कि “सुधा, करुणा, शाहीन और ग्रेसी की बातचीत के क्रम में यह सवाल उठा. ये चारों महिलायें देश के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे मज़बूत जनांदोलनों से जुड़ी थीं. ये चारों ओड़िसा के एक गांव में बैठी थीं और जनांनोलनों के भविष्य पर नए सिरे से विचार कर रही थीं और यहां उनको आंदोलनों के रोज-रोज के कामों की चिक-चिक भी परेशान नहीं कर रही थी. ”

किताब में लिखा गया है कि “स्वाभाविक तौर पर बातें किशन जी की तरफ़ मुड़ीं, जिन्हें देश भर की आंदोलनकारी जमातें अपना मित्र, राजनीतिक-दार्शनिक और नैतिक मार्गदर्शक मानती थीं. किशन जी का तर्क था कि जनांनदोलन के लोग चुनावी राजनीति में सीधी हिस्सेदारी करें. यह एक सरल लेकिन ताकतवर तर्क था.”

इसके अलावा इसी पन्ने पर किशन जी की विचारधारा को लेकर भी सवाल पूछे गये हैं. देश और दुनिया की किताबों में राजनीतिक विचारधारा के तौर पर माओत्से-तुंग को भी पढ़ाया जाता है और चे ग्वेरा के आंदोलन को भी विस्तार से जगह दी गई है. भारत के विभिन्न पाठ्यक्रमों में माओवाद और माओवादी विचारधारा को भी जगह दी गई है.

हालांकि टाइम्स ऑफ इंडिया की इस खबर को लेकर सवाल भी खड़े हो रहे हैं कि जिस किशन जी का उल्लेख किताब में किया गया है, वो समाजवादी नेता किशन पटनायक हैं, जो अपने ज़माने में सबसे कम उम्र के सांसद चुने गये थे. किताब के संपादक मंडल के सदस्य योगेंद्र यादव ने इस मसले पर ट्वीट करते हुये टाइम्स ऑफ इंडिया से इस रिपोर्ट के लिये माफी मांगने के लिये कहा है. अपने मौलिक समाजवादी चिंतन के लिये लोकप्रिय रहे किशन पटनायक ओडिशा से सांसद भी चुने गये थे.

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