कल्लूरी तो कल्लूरी हैं…

सुरेश महापात्र
यह बात सुनने और कहने में भले ही अजीब लगे पर सच यही है. शिवराम प्रसाद कल्लूरी यानी छत्तीसगढ़ में सबसे विवादित आईपीएस! जिनकी हर बात निराली है. काम करने का तरीका और अपनी बात रखने का…. बस्तर में यह दूसरी बार हो रहा है जब एसआरपी कल्लूरी को बैकफुट पर जाने की नौबत है. इस बार भी वही पुरानी वजह जिसके चलते पहली बार बस्तर से बाहर होना पड़ा था. ‘ताड़मेटला’ एक ऐसा रणक्षेत्र जहां नक्सल और फोर्स का सीधा सामना होता रहा है. इस इलाके में अब तक करीब डेढ़ सौ जवान शहीद हो चुके हैं. यहां कभी इतनी संख्या में माओवादी मारे गए हैं इसका उल्लेख शायद ही कहीं मिलेगा.

अब के सुकमा जिले के कोंटा ब्लाक के बड़े हिस्से में माओवादियों की सामानांतर सरकार है. इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि सुकमा जिले के पहले आईएएस कलेक्टर अलैक्स पॉल मेनन को नक्सलियों ने बंधक बना लिया था. बड़ी मशक्कत से उन्हें सरकार छुड़ा सकी. नक्सलियों ने कलेक्टर अलैक्स पॉल मेनन को तब बंधक बनाया था जब यहां एसआरपी कल्लूरी ना तो आईजी थे और ना ही एसएसपी. यानी कल्लूरी के रहने और ना रहने के दौरान सुकमा इलाके में माओवादियों का सीधा साम्राज्य संचालित रहा है. सुकमा जिले के कोंटा ब्लाक के अधीन जगरगुंडा को अजीत जोगी के मुख्यमंत्री रहते उप तहसील घोषित किया गया था.


2005 में जब डा. रमन सिंह की सरकार एक बरस पूरा कर चुकी थी तब से जगरगुंडा में पहुंचने के सारे मार्ग पर नक्सली अवरोध है. सुकमा जिले के इस इलाके में पहुंचने के तीन रास्ते हैं पहला है दोरनापाल से जगरगुंडा, दूसरा है दंतेवाड़ा से जगरगुंडा और तीसरा है बासागुड़ा (बीजापुर जिला) से जगरगुंडा. इन तीनों मार्ग पर नक्सलियों का कब्जा रहा है. इसी तरह से सुकमा से कोंटा राष्ट्रीय राजमार्ग 30 पर भी माओवादियों के दबाव के चलते काम अब तक अधूरा है. इसी इलाके के दोरनापाल से जगरगुंडा मार्ग पर चिंतलनार थाना क्षेत्र में ताड़मेटला का इलाका आता है. चिंतलनार को काफी पहले से माओवादियों ने अपनी राजधानी घोषित कर रखी है. इन क्षेत्रों में माओवादियों की इच्छा के बगैर कुछ भी हो पाता हो यह यकीन करना कठिन है.

इसी ताड़मेटला इलाके में सर्चिंग में निकले केंद्रीय रि​जर्व पुलिस बल की कंपनी को माओवादियों ने घेरकर मार डाला था. माओवादियों के इस हमले में 76 जवान शहीद हुए थे. दुनिया की सबसे बड़ी पैरामिलट्री फोर्स को पहली बार इतना बड़ा झटका लगा था. यह इस फोर्स के लिए चिंता और चिंतन का विषय रहा. जिस दौरान यह घटना घटित हुई थी तब शिवराम प्रसाद कल्लूरी डीआईजी दंतेवाड़ा रहे. घटना के बाद जब मैने उनसे घटना के बारे में पूछा तो उन्होंने साफ कहा कि ‘हादसे के बाद मुझे पता चला कि इस इलाके में इस तरह का कोई सर्चिंग आॅपरेशन चल रहा था.’ उन्होंने यह भी कहा था कि उन्हें ऐसे किसी आॅपरेशन के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई थी. उस दौरान एसपी अमरेश मिश्रा थे. इस मामले को लेकर दोनों के बीच काफी खटास भी आई थी. इस घटना के बाद इएन राममोहन कमेटी ने जांच की थी. जांच कमेटी ने अपने काफी बड़ी रिपोर्ट में माओवाद के कारण और फोर्स की स्थिति जैसे मुद्दों पर भी अपनी बात रखी थी. यह भी कहा जाता रहा कि कमेटी ने भी शांतिवार्ता के जरिए समाधान के लिए बात रखी थी.

यह बात और है कि कमेटी ने हादसे के लिए जिन पर उंगलियां उठाईं उनमें शिवराम प्रसाद कल्लूरी का नाम शामिल नहीं था. सो अमरेश मिश्रा को यहां से हटा दिया गया. इसी के बाद दंतेवाड़ा में एसपी के स्थान पर एसएसपी के रूप में एसआरपी कल्लूरी की पदस्थापना की गई. इसके बाद कल्लूरी के कार्यकाल में ही सुकमा के चिंतलनार थाना क्षेत्र में माओवादियों के गढ़ में सघन सर्चिंग अभियान चलाया गया. इस अभियान के बाद सबसे पहले राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि ताड़मेटला के आस-पास के तीन गांवों में फोर्स ने आगजनी कर कई घरों को जला दिया है.

इसके बाद प्रभावित गांवों में प्रशासन द्वारा राहत पहुंचाने की कोशिशों पर रोक को लेकर प्रशासन और पुलिस के बीच बड़ी ​दीवार खड़ी हो गई. जिसके परिणाम स्वरूप प्रशासन ने मामले पर अपनी ओर से जांच टीम गठित कर दिया. उसमें बतौर सदस्य मुझे भी शामिल किया गया. पर इससे पहले कि जांच शुरू हो और कुछ तथ्य हासिल किए जाते, सरकार ने न्यायिक आयोग का गठन कर दिया. मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी गई. विवाद बढ़ा और एसएसपी कल्लूरी और दंतेवाड़ा कलेक्टर आर प्रसन्ना को एक साथ राज्य सरकार ने हटा दिया.

संयोगवश जिस दिन दोनों अफसरों को हटाने की खबरें राजधानी के अखबारों में प्रथम पृष्ठ पर थीं उसी दिन मेरा रायपुर में पहुंचना हुआ. यानी जब मैं दंतेवाड़ा से रायपुर की राह पर था तब सरकार ने आदेश जारी कर दिए थे. दूसरे दिन मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह से मुलाकात हुई उनसे जब यह कहा कि ‘दंतेवाड़ा में ताड़मेटला हादसे के परिप्रेक्ष्य में कलेक्टर और एसपी को एक साथ हटाने से नक्सलियों की जीत होगी और पुलिस-प्रशासन का मनोबल गिरेगा.’ तब मुख्यमंत्री ने कहा कि यह ‘मजबूरी है कि किसी भी एक को हटाना भी उचित नहीं होगा.’ यानी एसएसपी कल्लूरी और कलेक्टर प्रसन्ना में से किसी एक को हटाकर सरकार जोखिम लेना नहीं चाह रही थी.

दंतेवाड़ा में डीआईजी से एसएसपी और उसके बाद बस्तर में आईजी के रूप में एसआरपी कल्लूरी अपनी सेवाएं दे रहे हैं. बस्तर में बतौर आईजी पोस्टिंग के बाद कई नए मामलों को लेकर विवादों के घेरे में हैं. बावजूद इसके बस्तर का एक बड़ा वर्ग उनके साथ खड़ा दिखता है. इस वर्ग को लेकर भले ही सभी की अपनी परिभाषा अलग हो पर सच यह है कि केवल माओवाद प्रभावित गांव-गांव में ग्रामीणों को जागरूक कर माओवादियों के खिलाफ अभियान चलाने की योजना में बड़ा बदलाव आया. अब उन शहरी क्षेत्रों को भी प्रभाव में लिया गया और शहरी क्षेत्र से माओवादियों के खिलाफ आवाजें उठाकर दबाव बढ़ाने की कोशिश की गई. बस्तर आईजी के रूप में अपनी विशिष्ट कार्यशैली से आम जनमानस में माओवाद से मुक्ति का यशगान प्रारंभ कराने का श्रेय कल्लूरी को जाता है.

जब ताड़मेटला इलाके में ग्रामीणों के घरों में आगजनी को लेकर विवाद उठा तो उसके बाद एसपीओ और फोर्स एसएसपी कल्लूरी के साथ खड़ा था. ऐसा लगने लगा था कि अगर इस मामले को सही तरीके से हैंडल ना किया गया तो प्रशासन और फोर्स के बीच ही सीधी लड़ाई शुरू हो जाएगी. पर राज्य सरकार ने संभाल लिया. इस बार भी जब इसी ताड़मेटला को लेकर सीबीआई की चार्जशीट के बाद सुप्रीम कोर्ट की ओर से फैसला आया है तो बिल्कुल वही माहौल है.

बस्तर संभाग भर में सोमवार को पुलिस जवानों ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक दलों के ऐसे नेताओं के नाम से पुतले फुंके जिन पर माओवादियों के साथ देने का आरोप पुलिस लगाती रही है. यह भी पहली बार है जब अभिव्यक्ति और प्रदर्शन के लोकतांत्रिक अधिकार के साथ पुलिस के जवान पुतले लेकर निकले और चौराहों में फुंक दिए. संभवत: पुलिस जवानों का यह प्रदर्शन सभी के लिए पृथक रूप से विचार का विषय हो.

भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसा केवल आम लोगों के अधिकार में है कि वह व्यवस्था के विरूद्ध लोकतांत्रिक प्रदर्शन करने के लिए स्वतंत्र हैं. पुलिस जवानों द्वारा इस तरह के किसी प्रदर्शन का कोई उल्लेख बस्तर में इससे पहले देखने को ​नहीं मिला है. एक आईजी के तौर पर भले ही कल्लूरी की कार्यशैली कैसी भी हो पर इस बात को अगर उन्होंने प्रश्रय दिया है तो इसे उचित नहीं माना जा सकता. पर कल्लूरी तो कल्लूरी हैं. वे आगे क्या करेंगे और क्या नहीं यह वे ही बेहतर बता सकते हैं. लेकिन यह बात तो तय है कि विवाद और कल्लूरी एक दूसरे के पर्याय रहे हैं और रहेंगे ऐसा साफ दिखाई दे रहा है.
*लेखक दंतेवाड़ा से प्रकाशित बस्तर इंपैक्ट के संपादक हैं.

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