एक विचार का यूं बदल जाना

दिवाकर मुक्तिबोध
यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का करिश्माई व्यक्तित्व, उनका भाषाई कौशल, लोकदृष्टि और सबका साथ सबका विकास जैसे लोकलुभावन नारे का कमाल है या समानांतर चलते उस खौफ का, जो विचारों को रौंदता है, उन्हें बदलने को मजबूर कर देता है. इसे तय कर पाना बड़ा मुश्किल है. वस्तुस्थिति तो वही बता सकता है जो इस दौर से गुजरता है या गुजर रहा है और जो वैचारिक दृष्टि से प्रबल है, लोकतांत्रिक है.

करीब दो वर्ष पूर्व देश में घटित विभिन्न घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में सहिष्णुता-असहिष्णुता पर लंबी बहस चली, तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई, साहित्यिक, सांस्कृतिक व कलावादी पुरस्कारों को लौटाने का लंबा चौड़ा सिलसिला शुरू हुआ, इतिहास को बदलने की कुचेष्टा की गई, सांस्कृतिक दुष्चक्र, साम्प्रदायिक भावनाओं का विस्तार, उनका पोषण और फासिस्ट ताकतों का उत्थान देश ने देखा और अभी भी देख रहा है. जनता खामोश है. जो नहीं हैं उन्हें चुप कराया जा रहा है या पक्ष में बोलने के लिए विवश किया जा रहा है. उन्हें हथियार दिखाए जा रहे हैं. शब्दों के हथियार.

इसी वर्ष जनवरी 2017 को प्रख्यात लेखक जी. राजशेखर ने देश में बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में कर्नाटक साहित्य पुरस्कार को स्वीकार करने से इंकार कर दिया. याद करें वर्ष 2015 में प्रख्यात कथाकार उदय प्रकाश ने ऐसी ही एक लौ जलाई थी. इसी मुद्दे पर साहित्य अकादमी का पुरस्कार लौटा दिया था. उनके द्वारा जलाई गई छोटी सी लौ जो एक फूंक में बुझ सकती थी, ज्वाला बन गई. पूरा देश असहिष्णुता के सवाल पर उद्वेलित हो गया. देश की साहित्यिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक बिरादरी तीखी बहसों में उलझ गई, इसमें राजनीति भी कूद पड़ी. लेकिन शाब्दिक हमलों के बाद उम्मीदों से भरी लपटें शांत हो गई. उसे शांत करा दिया गया.

यह शांति ऐसी पसरी कि कर्नाटकी लेखक के विरोध को लेखक बिरादरी ने ही अनसुना कर दिया. कहीं कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई. राजशेखर का पुरस्कार से इंकार पर एक छोटी सी खबर अखबारों में बनी और गुम हो गई. राजशेखर को उनकी प्रसिद्ध कृति ‘बहुवचन-भारत’ के लिए पुरस्कृत करने का निश्चय किया गया था. पुरस्कार ठुकराते हुए जी राजशेखर ने मीडिया को दिए गए बयान में कहा था कि दक्षिणपंथी ताकतें विरोध में उठ रही आवाजों का गला घोंट रही है. धर्मनिरपेक्षता की बात करने वालों को दरकिनार कर दिया गया है. वर्ष 2016 तो 2015 से भी ज्यादा बुरा गुजरा है.

असहिष्णुता एवं बढ़ती साम्प्रदायिकता के विरोध में राग अलापने वाले बुद्धिजीवी कर्नाटक के लेखक के फैसले पर क्यों चुप रहे, क्यों प्रतिक्रिया से बचते रहे, यह एक विचारणीय प्रश्न है. यह इत्तफाक ही है कि राजशेखर कर्नाटक से है और प्रख्यात इतिहासकार रामचंद्र गुहा भी इसी राज्य से हैं जिन्होंने हाल ही में उन्हें मिले धमकी भरे इमेल का खुलासा करते हुए उन्हें गंभीरता से नहीं लिया था. कोई महत्व नहीं दिया, क्योंकि ऐसी धमकियां उन्हें पहले भी कई बार मिल चुकी थी. असहिष्णुता पर वे पहले भी अनेक बार तीखी प्रतिक्रिया देते रहे, राजनीतिक व्यवस्था पर चोट करते रहे पर इतिहास के इस जाने-माने अध्येता और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के प्रशासक ने कुछ ऐसा कहा कि जो आश्चर्यचकित करता है. उनके नजरिए पर सवाल उठाता है.

पहले गुहाजी के बारे में कुछ विस्तार से जान लें. 58 वर्षीय रामचन्द्र गुहा देश के प्रसिद्ध इतिहास लेखक हैं. उनकी कई किताबें हैं जिनमें ‘इंडिया आफ्टर गांधी’, गांधी बिफोर इंडिया, मेक्स आफ माडर्न इंडिया, ए कार्नर ऑफ ए फारेन फील्ड : द इंडियन हिस्ट्री आफ ब्रिटिश स्पोर्ट बहुचर्चित हैं तथा उन्हें लेखक के रूप में विशिष्ट दर्जा देती है. रामचन्द्र गुहा क्रिकेट के भी खासे जानकार हैं. प्रथम श्रेणी के क्रिकेट पर वे लगातार लिखते रहे हैं. इस विषय पर उनके लेख देश-दुनिया के अखबारों में नियमित छपते हैं. क्रिकेट पर उनकी इसी विशेषज्ञता के चलते उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने इसी वर्ष 30 जनवरी को बीसीसीआई का प्रशासक नियुक्त किया है. इतिहास, क्रिकेट और समसामयिक विषयों पर उनकी टिप्पणियां गौर से पढ़ी जाती हैं. वे किसी खास राजनीतिक विचारधारा से बंधे हुए नहीं हैं. उनके कटाक्ष समान रूप से हर किसी राजनीतिक दल पर, व्यवस्था पर प्रहार करते हैं जिनमें भाजपा-कांग्रेस व कम्युनिस्ट पार्टियां भी शामिल हैं.

ऐसे निष्पक्ष और गंभीर विचारक यदि अकस्मात अपनी धारा बदल दे, अपने विचारों से उलट बातें कहें और किसी राजनेता का गुणगान करने लगे तो आश्चर्य होता है और झटका भी लगता है. सवाल खड़े होते हैं कि ऐसा वैचारिक बदलाव किस वजह से? क्या विवशतावश या भयातुर होकर या परिस्थितियों के दबाव से या फिर कमजोर नैतिक बल की वजह से? आखिर कारण क्या?

पिछले महीने 28 मार्च को देश के छोटे-बड़े अखबारों में रामचन्द्र गुहा के हवाले से खबर छपी जो उनके ट्वीट पर आधारित थी. उन्होंने कहा था बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना के चलते उन्हें दर्जनों धमकी भरे ई-मेल मिले हैं. ई-मेल के इन संदेशों में भाषा एक जैसी है जिसमें कहा गया है कि दिव्य महाकाल की ओर से मिलने वाली सजा के लिए वे तैयार रहें. उन्हें चेतावनी दी गई कि दुनिया को बदलने के लिए दिव्य महाकाल की ओर से चुने गए और उनसे आशीर्वाद प्राप्त नरेन्द्र मोदी व अमित शाह की आलोचना बंद करें. यह भी कहा गया था कि मोदी की तुलना इंदिरा गांधी व अमित शाह की तुलना संजय गांधी से न करे. उन्हें उनके बीच का अंतर समझना चाहिए. जाहिर है गुहा ने ऐसे संदेशों को गंभीरता से नहीं लिया और उन्हें इसलिए सार्वजनिक किया ताकि लोग जान लें कि देश में क्या चल रहा है. गुहा ने किसी का नाम नहीं लिया पर हाल ही में ‘आधार’ के मामले में उन्होंने एक खबर रीट्रीट की थी. इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि वे हर चीज में ‘आधार’ को जरूरी करने में केन्द्र सरकार की योजना के खिलाफ हैं.

गुहा ने केन्द्र सरकार की नीतियों की आलोचना कोई पहली बार नहीं की थी. समय-समय पर सरकारों के कामकाज पर उनकी टिप्पणियां आती रही हैं. याद करें 6 दिसम्बर 2015 को चौथे बेंगलूरू साहित्य महोत्सव में ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सामने आठ खतरे’ विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा था ”प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली केन्द्र सरकार अब तक सबसे अधिक बुद्धिजीवी विरोधी सरकार है और विभिन्न शैक्षणिक व सांस्कृतिक संगठनों में उसके द्वारा की गई नियुक्तियों से यह स्पष्ट हो जाता है. पहलाजानी और गजेन्द्र चौहान की नियुक्तियों को देखिए. उनकी नियुक्तियां क्या दर्शाती हैं? यह विद्वानों, साहित्य व कला के प्रति पूर्ण अवमानना दर्शाती है. प्रधानमंत्री अपनी धारणा की वजह से नहीं मानते कि बुद्धिजीवी, लेखक और कलाकार समाज में कोई योगदान करते हैं. यह उनका अपना अनुभव है और यह बात नीचे तक है.”

रामचन्द्र गुहा की इन टिप्पणियों से जाहिर है कि वे सरकार के कामकाज व उसकी नीतियों से संतुष्ट नहीं हैं. और उन्हें देखने का उनका अपना नजरिया है जो उनकी और निष्पक्षवादियों की दृष्टि से तर्कसंगत है. हालांकि इस विषय पर बहस की पर्याप्त गुंजाइश भी है. लेकिन धमकी भरे ईमेल के दो दिन बाद 30 मार्च 2017 को रामचन्द्र गुहा का जो बयान आया वह चौंकाने वाला रहा. नई दिल्ली में लंदन स्कूल आफ इकॉनामिक्स के इंडिया समिट को संबोधित करते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की शान में कसीदे काढ़े. उन्होंने कहा ‘मोदी एक महान नेता हैं. मोदी का करिश्मा और अपील जाति व भाषा की सीमा से परे है. पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू व इंदिरा गांधी के बाद वे देश के तीसरे सबसे सफल प्रधानमंत्री बनने के करीब हैं बल्कि बन चुके हैं. वे एक शानदार वक्ता और नेता हैं. वे इकलौते हैं जो अखिल भारतीय दृष्टिकोण अपनाने के मामले में नेहरू व इंदिरा गांधी के समकक्ष हैं.’

इस बयान से क्या यह अर्थ निकाला जाए कि रामचन्द्र गुहा ने मोदी व केन्द्र के प्रति फिलहाल अपना दृष्टिकोण बदल दिया है. चंद माह पूर्व उनकी सरकार को बुद्धिजीव विरोधी कहने वाले गुहा को अब मोदी में वे तमाम खासियतें नजर आ रही हैं जो नेहरू व इंदिरा गांधी में थीं. विचारों में अकस्मात ऐसे बदलाव की वजहें क्या हो सकती हैं? जो व्यक्ति अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता व निष्पक्षता के लिए मशहूर है, उसने यकबयक अपना स्टैंड क्यों बदल दिया? क्या यह उन्हें ईमेल से मिली धमकियों का परिणाम था? क्या वे मोदी सरकार व भाजपा के अतिउत्साही व उग्रवाद समर्थकों के शाब्दिक हमले से घबरा गए? क्या फासिस्ट ताकतों से वे डर गए? क्या उन्हें लगने लगा कि मोदी और उनकी सत्ता का गुणगान करना ही समय और परिस्थिति की जरूरत है. क्या पांच-छह माह पूर्व केंद्र सरकार उन्हें घोर बुद्धिजीवी विरोधी नजर आ रही थी, वह दो-चार दिन में ही बुद्धिजीवी समर्थक बन गई जो समाज के उत्थान में कला, साहित्य और संस्कृति की भूमिका को अहम मानती है. मोदी के नीतिगत फैसलों से वे अब इतने प्रभावित हैं कि उन्हें वे देश के तीसरे सबसे सफल प्रधानमंत्री मानते हैं. उनकी नजर में मोदी श्रेष्ठ वक्ता हैं. वे नेहरू, इंदिरा के समकक्ष हैं.

आखिरकार ऐसी क्या वजहें थी कि रामचन्द्र गुहा जैसे प्रखर बुद्धिजीवी को ऐसा कहना पड़ा. बड़ा गंभीर सवाल है और इसका जवाब गुहा ही दे सकते हैं या फिर आने वाले वक्त में उनकी लेखनी, उनके ट्वीट और महत्वपूर्ण मुद्दों पर उनके बयान वस्तुस्थिति का खुलासा करेंगे. लेकिन फिलहाल क्या यह माना जाए – अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने कोई तैयार नहीं, कोई मठ और गढ़ तोडऩे तैयार नहीं, कोई दुर्गम पहाड़ों के उस पार जाने तैयार नहीं. क्या हर कोई अंधेरे में रहना चाहता है? नहीं ऐसा नहीं है. राजशेखर हैं. कला-साहित्य और संस्कृति को ईमानदारी से जीने वाले अनेकानेक हैं. आखिरकार उम्मीद पर ही तो दुनिया कायम है.

* लेखक हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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