हसदेव अरण्य : हाशिए पर आदिवासी

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ के सरगुजा के तारा गांव से गुजरने वाली मुख्य सड़क की एक दुकान पर खड़े 28 साल के सुखलाल से अगर आप कोल ब्लॉक की बात करें तो वो दिलचस्प अंदाज में हिंदी व्याकरण और संज्ञा की परिभाषा बताना शुरु कर देते हैं.

सुखलाल कहते हैं-“ सरकार और अडानी जैसी कंपनियों ने हमारी संज्ञा बदल दी है. किसी भी व्यक्ति, प्राणी, वस्तु, स्थान, गुण, जाति या भाव, दशा आदि के नाम को संज्ञा कहते हैं. कल तक हमारी पहचान गांव की थी, अब एक कोल ब्लॉक के तौर पर होती है. कल तक तारा एक गांव का नाम था, अब इस तारा गांव को ‘तारा कोल ब्लॉक’ के नाम से जाना जाता है.”


सुखलाल अकेले ऐसे आदिवासी नहीं हैं, जिन्हें ऐसा लगता है. इस इलाके के सैकड़ों गांव अब सरकारी दस्तावेज़ों में कोयला खदानों का हिस्सा हैं और ये कोयला खदानें ही इन गांवों की पहचान हैं.

सुखलाल का कहना है कि गांवों में सरकार और अडानी के लोग आते रहे और हमें बताया गया कि हमारे दिन बदलने वाले हैं लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.

साल्ही गांव की रहने वाली दुबनी सिंह करियाम से अगर कोयला खनन को लेकर सवाल पूछें तो वो साफ़ कहती हैं कि सरकारी अधिकारियों ने फर्ज़ी दस्तावेज़ के सहारे उनके गांव के इलाके में परसा कोयला खदान को मंजूरी दे दी और आदिवासियों की कहीं सुनवाई नहीं हुई.

गांव के लोगों ने इस बारे में कलेक्टर से लेकर मुख्यमंत्री और राज्यपाल तक से शिकायत की है. इस पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई. तत्कालीन कलेक्टर सारांश मित्तर ने इस मामले में जांच की घोषणा की थी. राज्य के वन मंत्री मोहम्मद अक़बर का कहना था कि वे इस मामले का परीक्षण कराएंगे.

राज्यपाल ने भी राज्य के मुख्य सचिव को पत्र लिख कर मामले की जांच के निर्देश दिए थे. राज्यपाल ने पत्र में लिखा था कि जब तक इस मामले की जांच नहीं हो जाती, तब तक परसा खदान को लेकर कोई कार्रवाई न करें. लेकिन इस बात को तीन महीने हो गये. जांच तो नहीं हुई लेकिन परसा कोयला खदान में खनन के लिए आवश्यक कागजी कार्रवाई शुरु हो गई.

ग्राम सभा बनाम सफाई

अडानी कंपनी का कहना है कि उनका इससे कोई लेना-देना नहीं है, उनकी कंपनी को तय मानको के तहत खदान का एमडीओ प्राप्त हुआ है. वे इसके लिए राजस्थान सरकार से बात करने का सुझाव देते हैं.

दिलचस्प ये है कि राजस्थान सरकार इन सारे आरोपों को खारिज करती है. राजस्थान सरकार की ओर से कहा गया कि सब कुछ नियमानुसार किया जा रहा है.

गोंड़ आदिवासी समाज की दुबनी सिंह करियाम कहती हैं-“हमारे गांव में तो कोयला खदान को लेकर ग्राम सभा हुई ही नहीं. हम लोग को तो बाद में पता चला कि फर्ज़ी ग्राम सभा के कागज बना कर कोयला खदान को मंजूरी दे दी गई है. ऊपर से लेकर नीचे तक फर्ज़ी कागज बनाये गए. हम लोगों ने भी सब जगह शिकायत की. मुख्यमंत्री को भी आवेदन दिया. लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई.”

दुबनी सिंह करियाम उन हज़ारों आदिवासियों में शामिल हैं, जो कोरबा, सरगुजा और सूरजपुर ज़िले में फैले हसदेव अरण्य के जंगल में, कोयला खदानों के ख़िलाफ़ लगातार लड़ाई लड़ रही हैं.

पिछले दस सालों से इस इलाके के आदिवासी कोयला खदानों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहे हैं. इन दस सालों में महीनों-महीनों के धरना, प्रदर्शन और क़ानूनी लड़ाइयों में कभी जीत हासिल हुई तो कभी हार.

हालांकि कुछ गांवों में लोग कई सालों की लड़ाई के बाद थक चुके हैं और चाहते हैं कि अडानी उनकी शर्तों के अनुरुप ज़मीन का चार गुना मुआवजा दे और उनसे ज़मीन ले ले.

फतेपुर के 52 साल के देवसिंह पोर्ते का मानना है कि पड़ोस में जबसे कोयला खदान खुला है, उसके बाद से गांव में मुश्किलें बढ़ी हैं. ऐसे में देर-सबेर तो ज़मीन बेचनी ही है. शर्ते केवल इतनी भर है कि पुराने खदानों के लिए ज़मीन का जो मुआवजा दिया गया था, उसकी तुलना में चार गुना मुआवजा दे दे.

फतेपुर गांव की देव कुमारी का मायका फुलसर गांव में है. उनके पिता सिंचाई विभाग में थे. उनका कहना है कि बांगो बांध का विस्थापन उन्होंने देखा है. लगभग 36 साल पहले ब्याह कर इस गांव में पटेल प्रधान परिवार कर आईं देवकुमारी का कहना है कि पड़ोस के केते-बासन में कोयला खदान की शुरुआत होने के बाद से गांव में पानी की कमी होती जा रही है. पेड़ सूखने लगे हैं, ऐसे में ज़मीन बेच कर जाने के सिवा कोई चारा नहीं है.

देव कुमारी कहती हैं-“केते-बासन में कंपनी खुली तो लोगों को पैसे मिले. लाख रुपये तो उन्होंने कभी देखे नहीं थे. रुपये मिले तो शराब और गाड़ियों में ही सारे पैसे उड़ा दिए. घरों में पैसों को लेकर झगड़े हुए. पूरा परिवार उजड़ गया. हम चाहते हैं कि हमें थोड़े ठीक-ठीक पैसे मिलें, जिसका हम बेहतर उपयोग कर सकें.”

लेकिन बड़ी संख्या में लोग अब भी कोयला खदान के ख़िलाफ़ ताल ठोंक कर मैदान में डंटे हुए हैं.

लड़ाई जारी है

कोरबा ज़िले की पतुरियाडांड के सरपंच उमेश्वर सिंह आर्मो बताते हैं कि दो साल पहले हसदेव-अरण्य बचाओ संघर्ष समिति ने 73 दिनों तक लगातार प्रदर्शन किया था. लेकिन अब जब सरकार ने फिर से ज़मीन अधिग्रहण की कार्रवाई शुरु की है तो गांधी जयंती पर दो अक्टूबर को इलाके के आदिवासियों ने सम्मेलन किया और चार अक्टूबर को अपनी मांगों के साथ पैदल 300 किलोमीटर दूर राजधानी रायपुर के लिए निकल पड़े.

उमेश्वर सिंह आर्मो कहते हैं- “हमारी लड़ाई चौतरफा है. 2 अक्टूबर को फतेहपुर के आदिवासी सम्मेलन को रोकने के लिए अडानी ने हमारे ही कुछ आदिवासी भाइयों को भड़काने की कोशिश की. पुलिस की आंखों के सामने हम पर हमला की कोशिश की गई. हम इन सबसे जूझते हुए पैदल रायपुर रवाना हुए.”

बरसात के मौसम में सैकड़ों आदिवासी बिना डरे हसदेव अरण्य से रायपुर की 300 किलोमीटर की पदयात्रा करते हुए, अलग-अलग कस्बों से होते हुए 13 अक्टूबर को रायपुर पहुंची और राज्यपाल व मुख्यमंत्री से मुलाकात कर अपनी मांग रखी.

हालांकि आदिवासियों की मांग अब भी अनसुनी ही है.

यात्रा करने वाले आदिवासियों में शामिल रामलाल करियाम कहते हैं-“हसदेव अरण्य के जंगल मध्य भारत का फेफड़ा हैं और हम आदिवासी अपने हसदेव अरण्य को बचाने के लिए अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं. हमें भरोसा है कि लड़ेगे तो जीतेंगे भी.”

इस पदयात्रा में शामिल आदिवासियों का आरोप है कि राज्य सरकार निजी कंपनियों के दबाव में आ कर काम कर रही है. कोयला राज्य का विषय नहीं है, इसके बाद भी मंत्रीमंडल में एक साथ 17-17 नये कोयला खदानों को मंजूरी दे रही है. एक तरफ परसा के लोगों को कहा जाता है कि राज्य सरकार आपके साथ है, दूसरी ओर अपना अधिकारी वन मंत्रालय में भेज कर, परसा कोयला खदान को अपनी अनापत्ति देती है.

लेकिन राज्य के वरिष्ठ मंत्री और सरकार के प्रवक्ता रविंद्र चौबे के पास अपना दावा है. रविन्द्र चौबे का कहना है कि कोयला खदानों को लेकर राज्य सरकार सोच समझकर ही फैसला लेगी.

हसदेव अरण्य बनाम कोयला खदान

भारत में उपलब्ध 326495.63 मिलियन टन कोयला भंडार में से 59907.76 मिलियन टन कोयला यानी लगभग 18.34 फ़ीसदी कोयला भंडार छत्तीसगढ़ में है, जहां सर्वाधिक कोयला का उत्पादन होता है.

छत्तीसगढ़ के 184 कोयला खदानों में से, 23 कोयला खदान हसदेव-अरण्य के जंगल में हैं. आदिवासी 1,70,000 हेक्टेयर में फैले इसी हसदेव अरण्य के इलाके में तारा, परसा, परसा पूर्व व केते-बासन और केते एक्सटेंसन जैसे कोयला खनन का विरोध कर रहे हैं.

भारत सरकार की रिपोर्ट बताती है कि जैव विविधता और पारिस्थितकी के लिहाज से यह अत्यंत संवेदनशील इलाका है, जहां कई विलुप्त प्राय प्रजातियां पाई जाती हैं. इसके अलावा राज्य के पांच सौ से अधिक जंगली हाथियों का यह प्राकृतिक आवास रहा है. यह इलाका महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के घने जंगलों को झारखंड तक जोड़ता है, जहां वन्यजीवों का निर्बाध तरीक़े से आवागमन होता है.

यही कारण है कि 2010 में कोयला मंत्रालय और वन पर्यावरण मंत्रालय ने हसदेव अरण्य के जंगलों की अति संपन्न जैव विविधता और पारिस्थितकी रुप से संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए इसे ‘नो-गो एरिया’ घोषित कर दिया था. इस इलाके में किसी भी तरह के खनन को प्रतिबंधित कर दिया गया था.

लेकिन कुछ ही सालों के भीतर, एक-एक कर इस इलाके को कोयला खदानों के लिए खोलने की शुरुआत हो गई.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भारत सरकार के निर्देश पर भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद यानी आईसीएफआरई ने इस इलाके का व्यापक अध्ययन किया और उसकी रिपोर्ट सरकार को सौंपी.

इस अध्ययन में कहा गया है कि इस इलाके में कोयला खनन से यहां कि पारिस्थितकी तो प्रभावित होगी ही, इसका पूरे इलाके पर प्रतिकूल असर पड़ेगा. इसके अलावा इंसान और हाथियों के बीच संघर्ष और बढ़ने की चेतावनी दी गई है. रिपोर्ट के अनुसार अगर इस इलाके में खनन हुआ तो यहां रहने वाले आदिवासी समुदाय की आजीविका, पहचान और संस्कृति खतरे में आ जाएगी. इसके अलावा इलाके की नदियां भी प्रभावित होंगी.

विशेषज्ञों की राय है कि 433,500 हेक्टेयर सिंचाई क्षमता वाले हसदेव नदी पर बना हसदेव बांगो बांध भी कोयला खनन के कारण प्रभावित होगा क्योंकि इस बांध का मुख्य कैचमेंट इलाका यही जंगल है. बिजली बनाने के लिए तो छत्तीसगढ़ के इस सबसे बड़े बांध के पानी का उपयोग होता ही है, बड़ी संख्या में उद्योगों को भी इसी बांध से पानी मिलता है.

सूरजपुर ज़िले के कांटारोली गांव के बागेश्वर कहते हैं-“अगर जल, जंगल, जीव, जीवन सब पर बुरा असर पड़ने वाला है तो किसी को भी इसकी इजाजत कैसे दी जा सकती है? कोयला ज़्यादा ज़रुरी है या जीवन? कोयला खदान शुरु होने के कारण हाथियों का जंगल पूरी तरह से उजाड़ हो चुका है. ऐसे में हाथी कहां जाएगा? बस्ती में ही तो आएगा. इसलिए हमलोग नहीं चाहते कि यहां कोई खदान खुले. अगर ये खदान खुले तो पूरे छत्तीसगढ़ में हाथी और आदमी के बीच संघर्ष और बढ़ जाएगा.”

हाथी-मानव संघर्ष

हसदेव अरण्य के घने जंगल बरसों से हाथियों का स्थाई आवास रहे हैं. यही कारण है कि 11 मार्च 2005 को राज्य सरकार ने इस इलाके के 450 वर्ग किलोमीटर में लेमरु हाथी रिजर्व बनाने का अशासकीय संकल्प विधानसभा से पारित किया, जिस पर 5 अक्टूबर 2007 को केंद्र सरकार ने अपनी सहमति भी दे दी. लेकिन कोयला खनन के कारण भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने 2018 तक के अपने कार्यकाल में, इसकी फाइलें ठंडे बस्ते में डाल दीं.

इसके उलट राज्य में तेज़ी से कोयला खनन का काम ज़रुर शुरु हो गया और हाथी राज्य के अलग-अलग हिस्सों में भटकने लगे. हर दिन मानव-हाथी संघर्ष की घटनाएं सामने आने लगीं.

आज की तारीख़ में कहीं हाथी मारे जा रहे हैं तो कहीं मनुष्य. लगभग 550 से अधिक जंगली हाथी, घरों, फसलों और मनुष्यों को रौंदते हुए, अपने घर और भोजन की तलाश में यहां से वहां भटक रहे हैं.

2018 में सत्ता में आई कांग्रेस पार्टी की सरकार ने 15 अगस्त 2019 को, इन्हीं कोयला खदान के 1995.48 वर्ग किलोमीटर इलाके में हाथी रिज़र्व बनाने की घोषणा की. उसी महीने मंत्रीमंडल से इसकी मंजूरी भी हो गई. लेकिन साल भर बाद भी इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं हुई.

इसके बाद राज्य सरकार ने दो क़दम आगे बढ़ कर 3827 वर्ग किलोमीटर के दायरे में हाथी रिजर्व बनाने की योजना पर काम करना शुरु कर दिया. इसके लिए ग्रामसभा भी की गई.

इस इलाके के कद्दावर नेता और मंत्री टीएस सिंहदेव ने हाथी रिजर्व के मामले पर अपना रुख साफ करते हुए मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखी कि पूरे इलाके को यूपीए शासनकाल की तर्ज़ पर किसी भी तरह के खनन को प्रतिबंधित करते हुए, इसे फिर से ‘नो गो एरिया’ घोषित किया जाए.

इधर राज्य सरकार ने हसदेव अरण्य के 18 कोयला खदानों- परसा, केते-एक्सटेंशन, गिधमुड़ी-पतुरिया, तारा, पेंडराखी, सैदू उत्तर व दक्षिण, नकिया-1-2-3, भकुर्मा मतरिंगा, लक्ष्मणगढ़, पुटा परोगिया, मदनपुर उत्तर, मदनपुर दक्षिण, मोरगा-1, मोरगा-2, मोरगा-3, मोरगा-4, मोरगा दक्षिण और सरमा को हाथी रिज़र्व में शामिल करने का फ़ैसला किया.

राज्य सरकार ने केंद्र को कई चिट्ठी भी लिखी कि इस इलाके में कोयला खदानों की नीलामी न की जाए.

इसी साल 11 जनवरी को राज्य के खनिज सचिव अंबलगन पी द्वारा केंद्र सरकार को लिखी चिट्ठी की बानगी देखें- “हाथियों के संरक्षण, हाथी एवं मानव के बीच संघर्ष में हो रही वृद्धि को रोकने, क्षेत्र में अन्य जनधन की हानि को रोकने, पर्यावरणीय संतुलन को बनाये रखने, जल उपलब्धता के साथ प्रचुरता से विद्यमान जैव एवं वानस्पत्ति विविधता को संरक्षित करने के दृष्टिकोण से भविष्य में कोयला खदान आवंटन की प्रक्रिया से प्रस्तावित लेमरु हाथी रिजर्व क्षेत्र लगभग 3827 वर्ग किलोमीटर को संरक्षित किये जाने हेतु मदनपुर साऊथ कोयला खदान की भूमि को कोयला धारक क्षेत्र अर्जन और विकास अधिनियम 1957 की धारा-4 की उपधारा-1 के अंतर्गत कृत कार्यवाही एवं इस अधिनियम की अन्य धाराओं के तहत प्रस्तावित कार्यवाही पर राज्य शासन आपत्ति दर्ज करता है। अतः प्रकरण में आगामी कार्यवाहियों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाये जाने का अनुरोध है.”

इस चिट्ठी में उसी मदनपुर के इलाके का उल्लेख था, जहां चुनाव पूर्व राहुल गांधी ने 15 जून 2015 को सभा की थी. राहुल गांधी ने आदिवासियों को भरोसा दिया था कि आदिवासियों और ग्राम सभा की सहमति के बिना कोयला खनन नहीं होगा और कांग्रेस पार्टी की सरकार उनके साथ है.

लेकिन इन तमाम चिट्ठियों और वादों का सच ये है कि सत्ता में आने के बाद सबसे पहले कोयला खदान के लिए आदिवासियों की ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया इसी मदनपुर में शुरु की गई और हाथी रिजर्व का दायरा घटा कर अधिसूचना जारी कर दी गई.

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