ग़रीब से कर्ज वसूली और अमीरों से?

देविंदर शर्मा
कुछ दिन पहले झारखंड के किसान मिथिलेश मेहता की गर्भवती बेटी ने अपने पिता द्वारा लिए कर्ज की एवज में ट्रैक्टर जब्त करने का विरोध किया तो एक बड़ी फाइनेंस कंपनी के वसूली-गुर्गों ने वाहन से कुचलकर मार डाला. खबरों के मुताबिक, मिथिलेश ने ट्रैक्टर खरीदने के लिए एक निजी वित्तीय कंपनी से ऋण लिया था. उसने कुछ किश्तें चुकाईं भी लेकिन कोविड महामारी के दौरान कर्ज चुकाने का क्रम टूट गया.

इसके बाद कंपनी अधिकारियों और उनके बीच नया करार हुआ जिसके तहत बकाया कर्ज पर अतिरिक्त सूद देना मंजूर किया. हालांकि 10,000 रुपये जैसी छोटी रकम को लेकर असहमति थी.

‘एक इंसानी जिंदगी की क्या कीमत है’-व्यथित मिथिलेश ने पूछते हुए आगे कहा- ‘महज 10000 रुपये’. उसकी बेटी स्नातक थी और उसने वसूली एजेंट द्वारा ट्रैक्टर जब्त करने से पहले ‘जब्ती कागजात’ दिखाने की बात कहने की हिमाकत की थी. इस पर गुर्गों ने कहा- ‘कागज मांग रही है, हट गाड़ी चढ़ा देंगे’ और उसे वाहन तले रौंद डाला.

जहां वित्तीय कंपनी ग्रुप के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने इस दुखद घटना पर माफी मांगी है और वसूली कंपनी की भूमिका की जांच का वादा किया है, वहीं एक युवा स्त्री की मौत ने एक बार फिर जबरिया वसूली और निष्ठुरता भरे तौर-तरीकों की ओर ध्यान खींचा है, जिसका उपयोग गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां किसानों को दिए ऋण की वसूली के लिए करती आई हैं.

यह जानते हुए भी कि किसानों की आर्थिक हालत इतनी सहज नहीं है, वसूली-गुर्गे हर किस्म के हथकंडे अपनाते हैं ताकि अपना हिस्सा पा सकें. क्योंकि मामला वित्तीय सेवाओं का है, इसलिए प्रशासन और संबंधित नियामक एजेंसियां आंखें मूंदे रखती हैं.

यह कोई पहला अवसर नहीं है, जब कर्ज देने वाली कंपनियों के वसूली-गुर्गों की करतूतें सामने आई हैं. तथ्य यह है कि बतौर तीसरा पक्ष वसूली करने का यह काम अब एक संगठित धंधा बन गया है. एक साइकिल के लिए कर्ज उठाकर देखें आपको स्वयं पता चल जाएगा कि पीछे लगे वसूली गुर्गे क्या-क्या हथकंडे अपनाते हैं.

बहरहाल, यह सर्वविदित है कि ज्यादातर किसान इसलिए आत्महत्या करते हैं जब बैंक, गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं और सूक्ष्म वित्तीय संस्थाओं द्वारा की गई बेइज्जती और दबाव बर्दाश्त से बाहर हो जाता है. इस मामले में भी, फाइनेंस कंपनी ने सब कुछ जानते हुए भी बकाया कर्ज की वसूली में विशेषज्ञ एक बाहरी कंपनी की सेवाएं ली हुई हैं. इसलिए अपनी जिम्मेवारी से इतनी सरलता से पल्ला नहीं छुड़ा सकती.

जब कोई वसूली एजेंट किसी किसान के घर अनचुके ऋण के एवज में ट्रैक्टर या अन्य खेती मशीन जब्त करने पहुंचता है तो अड़ोस-पड़ोस की खोजी-उपहास करती आंखों से इसको अपनी एक बड़ी बहुत बड़ी बेइज्जती के तौर पर लेता है और यह स्थिति अंतिम कदम उठाने को उद्यत करती है.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, किसानों की आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण बैंक से लिया ऋण है और 80 फीसदी मामले इससे संबंधित हैं.

बैंक और निजी कर्जदाता अक्सर वसूली करने के लिए बाहरी एजेंसियों की सेवाएं लेते हैं. इसके अलावा बैंक खाली चेक के रूप में जमानत रख लेने के लिए कुख्यात हैं और कर्ज अदायगी का क्रम टूटने पर बकाया राशि इनमें भरकर न्यायालय के जरिये जेल भिजवाने की नौबत बनाकर, अप्रत्यक्ष वसूली वाला पैंतरा अपनाते हैं.

आये दिन ऐसी खबरें आती हैं कि महज छोटी-सी बकाया रकम के लिए कोई किसान सलाखों के पीछे भेज दिया गया, उनमें कुछ की कैद के दौरान मरने की सूचना है.

इस बरस, पंजाब सरकार को लगभग 2000 किसानों के खिलाफ जारी हुए गिरफ्तारी वारंट रद्द करने पड़े जो पंजाब स्टेट को-ऑपरेटिव एग्रीकल्चर डेवलपमेंट बैंक से लिया कर्ज वापस करने में चूक गए थे.

यहां सवाल पैदा होता है कि वसूली-तंत्र क्या केवल आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लिए बना रखा है? कॉर्पोरेट्स का बकाया कर्ज उगाहने को वसूली करने वाली इन बाहरी कंपनियों को क्यों नहीं लगाया जाता?

यहां तक कि अहमदाबाद में स्टेट बैंक की एक शाखा ने किसान की महज 31 पैसों की बकाया के एवज में अनापत्ति पत्र जारी करने से मना कर दिया! आगे इस मामले में गुजरात उच्च न्यायालय ने बैंक को लताड़ते हुए इसको और कुछ नहीं ‘केवल तंग करना’ बताया. परंतु जब मामला बड़े कर्जदारों की उगाही का हो तब बैंक खेल खेलने लगते हैं.

मनीलाइफ की रिपोर्ट के अनुसार, अधिसूचित बैंकों का आंकड़ा बताता है कि पिछले पांच वर्षों में, इस साल बकाया वसूली का आंकड़ा तीन गुणा बढ़कर 8.58 लाख करोड़ छू गया है.

जहां वसूली-गुर्गों ने कृषक मिथिलेश मेहता की बेटी को महज 10,000 रुपये के पीछे कुचलकर मारा डाला वहीं विभिन्न बैंकों ने 30,359 ऐसे लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया हुआ है, जिनमें हरेक के ऊपर 1 करोड़ से ज्यादा का कर्ज बकाया है.

सूची में महाराष्ट्र सबसे ऊपर है, दिल्ली दूसरा और तेलंगाना तीसरे स्थान पर है. सवाल यह है कि जब कर्ज उगाही में वसूली कंपनियों को बतौर एक प्रभावी औजार की तरह लिया जाता है और जब चाहा किसानों पर इस्तेमाल किया जाता है, तब फिर यही तरीका बड़े ऋण-अपराधियों पर क्यों नहीं लगाते?

अदालती मुकदमा जब बड़ी मछलियों के खिलाफ होता है तो हम जानते हैं कि यह सालों-साल लटकेगा, इसी तर्ज पर गलती करने वाले किसानों पर मुकदमा क्यों नहीं चलाते?

इसी तरह खाली चेक का इस्तेमाल केवल किसान की ऋण उगाही के लिए ही क्यों, बड़े गुनहगारों के विरुद्ध क्यों नहीं? अलग लोगों के लिए अलग नियम?

जहां चूक करने वाले किसान को मुसीबतें और अत्याचार झेलने पड़ते हैं वहीं अमीर बकायादार जन्मदिन पार्टियों पर करोड़ों खर्च करते नजर आते हैं. सरफाइसी कानून, ऋण उगाही न्यायाधिकरण, इन्सॉलवेंसी एंड बैंकरप्सी कोड और एकमुश्त अदायगी के बावजूद अमीर कर्जदारों की जिंदगी पहले की तरह चलती रहती है.

असल में विशालकाय कर्ज के अनुपात में उतने ही बड़े संत्रास और अवसाद में डूबने के बजाय अमीर कर्जदारों के लिए पल्ला झाड़कर नये सिरे से ऋण लेने की प्रक्रिया शुरू करना आसान है, मानो कुछ हुआ नहीं. लेकिन, जैसा कि हम जानते हैं किसान इतने खुशनसीब नहीं हैं.

यह जानते हुए कि स्वेच्छा से विशालकाय ऋण न चुकाने वाले अमीरों की संख्या 10,000 है यानी जिनके पास अदायगी की हैसियत है लेकिन करना नहीं चाहते, ज्यादातर बैंक तो उनकी पहचान तक बताने को राजी नहीं. रिजर्व बैंक को अवश्य ही बैंकों को सदा के लिए यह स्पष्ट करना चाहिए कि कर्जदारों से वसूली की एक समान संहिता क्या हो.

यह सारा धन जनता का है और इसको निजी संपत्ति के तौर पर न इस्तेमाल किया जाये. ठीक इसी वक्त, एक ऐसी व्यवस्था बनाई जाये जो, अमीर हो या गरीब, कर्ज देने और लेने में, सबके लिए न्यायप्रिय, समानता वाली और न्यायसम्मत हो.

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