गढ़ छत्तीसी का मल्ल युद्ध

विद्याचरण शुक्ल कहते रहे हैं कि सभा में देर से जाने से ग्रेस (सौंदर्य) आता है. यहां तक कि दरभा घाटी के काफिले में भी वे सबसे पीछे रवाना हुए. जोगी के किसी सभा में देर से जाने से सभा का ग्रेस उनके साथ चला जाता है. जोगी पर यह भी आरोप है कि वे अपनी ही पार्टी के उम्मीदवारों को चुनाव में हरवा देते हैं. आलोचक उन्हें कांग्रेस के गले की हड्डी बताते हैं. समर्थक कहते हैं वे कांग्रेस की रीढ़ की हड्डी हैं. इतना तो तय है कि जोगी हड्डी की तरह कड़ियल हैं, लुंजपुंज नहीं.

यदि जोगी ने ईमानदारी से कहा है कि वे भावुक हैं, तो यह भी है कि जोगी पिता पुत्र तो दोनों कवि भी हैं. दिग्विजय सिंह भावुक नहीं हैं. उनकी विनम्रता स्वभाव नहीं दिमाग के जिरह बख्तर में छिपा हथियार है. प्रतिद्वन्द्वी को पछाड़ने के लिए यह मल्ल झुककर अपना कुरता तक फड़वा लेता है. वे छत्तीसगढ़ की राजनीति में लगातार हस्तक्षेप करते रहे हैं. छत्तीसगढ़ निर्माण के समय वे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. दोनों प्रदेशों में भारत पाकिस्तान जैसे रिश्ते पनपे. यह भी आरोप है कि चुन चुनकर नाकारा अधिकारी छत्तीसगढ़ भेजे गए. जोगी को भी गैर राजनीतिक अवांछितों ने घेर लिया था. अन्यथा वे सचिन तेंदुलकर की तरह लंबी पारी खेल सकते थे.


अजीत जोगी भाषा और लोक संस्कृति की ताकत का इस्तेमाल जानते हैं. शहरी सभाओं में भी छत्तीसगढ़ी में ही बोलते हैं. उसका असर उन मूक मतदाताओं पर होता है, जिनके जोगी को दिए जा रहे समर्थन को जांचने का कोई पैमाना नहीं होता. उन्होंने स्थानिकता के नाम पर कई गड़बड़झाले के निर्णय भी किए, जो मुख्यमंत्री के लिए उचित नहीं थे.

उच्च शिक्षा की भारत में इतनी बुरी हालत है कि दुनिया के 200 बेहतर विश्वविद्यालयों में भी भारत का कोई नामलेवा नहीं है. छत्तीसगढ़ में गुरु घासीदास अंतर्राष्ट्रीय ख्याति का नाम हो सकता है. यदि कोई गिरोदपुरी में जैतखांब के अतिरिक्त गुरु घासीदास सत्यशोधक अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय बना दे. अर्जुन सिंह के कहने पर बिलासपुर के विश्वविद्यालय का नामकरण गुरु घासीदास की स्मृति में किया गया. उसका रचनात्मक प्रयोजन कहां हुआ?

छत्तीसगढ़ में लाखों कबीरपंथी हैं. गुरु घासीदास को भी संत कबीर से प्रेरणा मिली थी. कबीर की स्मृति में पूरे प्रदेश में कुछ सार्थक नहीं हुआ है. कांग्रेस के इकलौते सांसद, केन्द्रीय मंत्री और छत्तीसगढ़ कांग्रेस के कार्यवाहक अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत भी कबीरपंथी हैं. उनके अनुयायी कबीर को भगवान के रूप में पूजते हैं. ये राजनेता इन महापुरुषों की शिक्षाओं को लेकर कोई वैज्ञानिक शोधवृत्ति क्यों नहीं विकसित करते?

चरणदास महंत के जुझारू पिता में यदि सूर्य का ताप था तो पुत्र के स्वभाव में चन्द्रमा जैसी शीतलता है. बस्तर में दावानल सुलग रहा है. तब नेतृत्व के ठंडेपन को क्या करना होगा? स्वामी रामानन्द के शिष्य पीपाजी के वंशज दिग्विजय हैं. कबीर भी रामानन्द के शिष्य थे और रविदास (रैदास) भी. आधुनिक रामानन्द सीधी जिले के तिरछे गुरु थे. दिग्विजय, चरणदास महंत और जोगी तीनों उनके शिष्य होने के कारण गुरु भाई रहे हैं.

राजनीतिक पद बर्फ की सिल्ली हैं. किए गए काम शिलालेख होते हैं. रविशंकर शुक्ल ने छत्तीसगढ़ को उच्च शिक्षा का केन्द्र बनाया और भिलाई इस्पात कारखाने के जरिए औद्योगीकरण का. श्यामाचरण शुक्ल सिंचाई के वैचारिक थे. विद्याचरण शुक्ल ने दूरदर्शन दिया. जोगी ने हिदायतुल्ला कानूनी विश्वविद्यालय. डॉ. रमन सिंह ने दो रुपये किलो के चावल का झंडा गाड़ा. अरविंद नेताम ने बस्तर में पाईन परियोजना और बोधघाट विद्युत परियोजना का विरोध किया तथा संविधान की छठवीं अनुसूची लागू करने का मुद्दा उठाया. छठवीं अनुसूची को छोड़कर बाकी दोनों मुद्दों का दिग्विजय ने विरोध किया था. जोगी ने सलवा जुडूम का विरोध किया था.

स्मारकों, मूर्तियों, अजायबघरों वगैरह की स्थापना से ज्यादा जरूरी जगदलपुर में आधुनिक सुविधाओं से लैस अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के स्तर का अस्पताल है. हर आदिवासी की छाती पर नक्सली या पुलिस की गोली का नाम लिखा है. इन गोलियों को गरीब सुरक्षाकर्मी भी खाते हैं, अफसर नहीं. छत्तीसगढ़ में हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, आंध्रप्रदेश, उत्तरप्रदेश और बिहार आदि के व्यापारी और लठैत उसके अस्तित्व की नस्ल पर हमला कर रहे हैं. कोयला बाहरी परिवारों को खरबपति बना रहा है. वे एक पार्टी के राष्ट्रीय नेता हैं. दूसरी पार्टी के सांसद, उद्योगपति की कृपा से रायगढ़ राखगढ़ में बदले जाने का खतरा उठाए हुए है. राज्यपाल और मंत्री उद्योगपतियों के हवाई जहाज में उड़ते हैं. छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस में अकिंचन लड़कियों का कौमार्य ढोया जाता है.

जोगी ने तो यह भी कहा था कि छत्तीसगढ़ में इतना खनिज है कि वह टैक्स फ्री राज्य बनेगा. छत्तीसगढ़ तो सबसे ज्यादा टैक्स पीड़ित राज्य है. छत्तीसगढ़ में आदिवासी घट रहे हैं. प्रदूषण बढ़ रहा है. खेती की भूमियां सिकुड़ रही हैं. बेरोजगारों को नौकरी तथा रोजगार नहीं मिल रहा है. जोगी और दिग्विजय को कांग्रेस ने सब कुछ दिया है. दोनों मिलकर छत्तीसगढ़ को कुछ क्यों नहीं देते.

नक्सल समस्या को लेकर दिग्विजय सिंह ने डॉ. रमन सिंह को अंग्रेजी में पत्र लिखा था. डॉ. रमन सिंह ने भी अंग्रेजी में जवाब दिया था. समस्या छत्तीसगढ़ी है, बल्कि गोंडी है. वार्तालाप अंग्रेजी में हुआ. बेहतर तो यही है कि दिग्विजय सिंह अपने अहसानमन्द समर्थकों की मदद से अगले विधानसभा चुनाव के लिए छत्तीसगढ़ कांग्रेस का एक मजमून तैयार करें. अजीत जोगी अपने समर्थकों से सलाह कर वैसा ही एक मजमून तैयार करें. दोनों मजमूनों को सार्वजनिक रूप से एक साथ प्रकाशित किया जाए. दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा कि छत्तीसगढ़ को लेकर किसमें कैसी संवेदनाएं हैं.

रविन्द्र चौबे, मोहम्मद अकबर, बदरुद्दीन कुरैशी, टी. एस. सिंहदेव, धर्मजीत सिंह, भजन सिंह निरंकारी, शिव डहरिया जैसे कई सक्रिय कांग्रेसी विधायक उपलब्ध हैं. इनकी संख्या बढ़ाने के बदले अनुभवी पराजितों को राजनीतिक आकाओं के कारण बार-बार टिकटें दी जा रही हैं. एक ही परिवार को देश और प्रदेश में कांग्रेसी कोषाध्यक्षी का विशेषज्ञ माना जाता है. जोगी प्रशासन पर आर्थिक भ्रष्टाचार के भी आरोप लगे थे. लेकिन कुछ वैश्य प्रशासक अब भी हैं जिन्होंने राष्ट्रीय कीर्तिमान रचे हैं. भ्रष्टाचार के नाबदान से छत्तीसगढ़ बाहर निकलेगा? राजनीति में सदाचार की एक कमजोर आवाज कोरिया से उठकर रायपुर तक किसी को क्यों नहीं सुनाई देती?

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