छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़: पीपीपी मॉडल पर मतभेद

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ कैबिनेट के ताकतवर मंत्रियों में पीपीपी मॉडल पर मतभेद की बात सामने आई है. बुधवार को हुई छत्तीसगढ़ कैबिनेट की बैठक में रायपुर के डीके अस्पताल को पीपीपी मॉडल से सुपरस्पेशलिटी बनाने पर प्रस्ताव पर यह मतभेद देखा गया. एक तरफ रायपुर के ताकतवर मंत्रियों ने इस पीपीपी मॉडल का विरेध किया तो दूसरी ओर वर्तमान स्वास्थ्य मंत्री तथा बिलासपुर के कद्दावर पूर्व स्वास्थ्य मंत्री ने इसे पीपीपी मॉडल से सुपरस्पेशियालिटी अस्पताल बनाने का समर्थन किया.

छत्तीसगढ़ कैबिनेट के बाद मीडिया को दी गई जानकारी के अनुसार, “मंत्रिपरिषद की आज की बैठक में सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल की स्थापना और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के संचालन के लिए दो विकल्पों पर विचार किया गया. इनमें पहला विकल्प सार्वजनिक-निजी भागीदारी, पीपीपी मॉडल का है. दूसरा विकल्प विभागीय रूप से संचालित किए जाने का है. कैबिनेट में विचार-विमर्श के बाद इस बारे में निर्णय लेने के लिए स्वास्थ्य विभाग को अधिकृत किया गया. ” जाहिर सी बात है कि मंत्रिमंडल में इस पर निर्णय नहीं लिया जा सका तथा इसके लिये स्वास्थ्य विभाग को अधिकृत कर दिया गया है.

बैठक के बाद स्वास्थ्य मंत्री अजय चंद्राकर ने बताया कि डी.के.एस. भवन में प्रस्तावित अत्याधुनिक अस्पताल में चिकित्सा सेवाओं से जुड़े 19 विभागों की सुविधाएं होंगी. इनमें हृदय रोगियों के लिए कार्डियोलॉजी विभाग और किडनी के मरीजों के नेफ्रोलॉजी विभाग भी शामिल है. इन विभागों के अलावा न्यूरोलॉजी, न्यूरोसर्जरी, बर्नप्लास्टी, पीडियाट्रिक सर्जरी, रेडियो-डायग्नोसिस, पैथोलॉजी, निश्चेतना, बायोकेमेस्ट्री, माइक्रोबायोलॉजी, एण्डो-क्रायोनोलॉजी, रेहिमेटोलॉजी, मेडिकल ग्रेस्टोइन्ट्रालॉजी, पीईटी स्केन, हिमेटोलॉजी, यूरोसर्जरी, सर्जिकल ग्रेस्ट्रोएंट्रोलॉजी, कार्डियो थोरेसिक सर्जरी के विभाग भी सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल में होंगे.

उल्लेखनीय है कि पीपीपी परियोजना का अर्थ उस परियोजना से है जिसमें एक तरफ सरकार या स्वतंत्र अस्तित्व के वैधानिक निकाय और दूसरी ओर निजी क्षेत्र की कंपनी के बीच एक अनुबंध या रियायती अनुबंध होता है जो बुनियादी ढाँचागत सेवा प्रदान करने के लिए उपभोक्ता से शुल्क वसूल करेगी.

पीपीपी को प्रोत्साहित करने वाली एजेंसियों द्वारा दी गई परिभाषाओं के विपरीत कुछ शैक्षणिक एवं शोध अध्ययनों ने स्पष्ट किया है कि, “जन-निजी भागीदारी शब्द ‘अनुबंध करने’ या ‘निजीकरण’ जैसे शब्दों से बचने के लिए भागीदारियों के पक्ष में गढ़ी गई शब्दावली से अधिक कुछ नहीं है. यह सार्वजनिक प्रबंधन के अंतर्गत एक सामान्य चलन का एक हिस्सा हो सकता है जिसमें समय-समय पर नए लुभावने शब्दों की आवश्यकता पड़ती है या शायद यह उन्हीं नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए अन्य और अधिक आकर्षक नाम देने की प्रथा को प्रकट करता है”.

गौरतलब है कि अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन तथा ब्रितानी प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर के समय नारा गढ़ा था, ” सरकार शासन करने के लिये है व्यापार करने के लिये नहीं.” इसके तहत दुनिया भर के सरकारों ने सामाजिक जिम्मेदारियों जैसे स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, पेंशन आदि से हाथ पीछे खींचने शुरु कर दिये. नतीजन स्वास्थ्य तथा शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र आगे आने लगे जिनका एकमात्र उद्देश्य मुनाफा कमाना होता है. दूसरी तरफ यह भी पाया गया कि अब व्यापारी शासन में हस्तक्षेप करने की स्थिति में आ गये. इसके बाद से आम जनता को स्वास्थ्य तथा शिक्षा के लिये मूल्य चुकाना शुरु करना पड़ा तथा आज स्थिति यह आ गई है कि स्वास्थ्य तथा शिक्षा के लिये जीवन भर की कमाई को एक झटके में खर्च करना पड़ रहा है.

इन सबमें सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि खुद ब्रितानी प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर ने अपने देश में स्वास्थ्य सेवाओं को पूरी तरह से निजी हाथों में नहीं जाने दिया. वहां आज भी स्वास्थ्य सरकार की जिम्मेदारी है.

छत्तीसगढ़ कैबिनेट में पीपीपी मॉडल पर विशेषकर रायपुर के डीके अस्पताल के मुद्दे पर एक राय न होना क्या वैचारिक मतभेद है या महज एक संयोग है, इसका निष्कर्ष तुरंत नहीं निकाला जा सकता है. छत्तीसगढ़ कैबिनेट का यह उहापोह कम से कम यह संकेत तो देता है कि कुछ लोग हैं, जो मानते हैं कि लोकतंत्र में सरकार की भूमिका एक लोक कल्याणकारी राज्य की होती है. लेकिन जब सरकारें नफा-नुकसान देखना शुरु कर दें तो यह लोकतंत्र के लिये एक खतरनाक संकेत है. दुखद ये है कि हम चाहे-अनचाहे इस खतरे से अपना मुंह मोड़ रहे हैं.

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