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सिंहासन खाली करो कि भाजपा आती है

नई दिल्ली | विशेष संवाददाता: 6 राज्यपालों से इस्तीफा देने कहा गया है. इससे रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” का भाजपाई रूप देखने को मिल रहा है. फर्क केवल इतना सा है कि राज्यपालों से कहा जा रहा है कि सिंहासन खाली करों जिसमें भाजपा के बुजुर्ग नेता आने वाले हैं.

हालांकि, इसकों लेकर शीला दीक्षित ने विवाद की शुरुआत कर दी है. गौरतलब है कि भाजपा को लोकसभा चुनाव में बहुमत पाने के बाद सात रेस कोर्स रोड में अपना प्रधानमंत्री तैनात करने का संवैधानिक अधिकार मिल गया है परन्तु हो सकता है कि भाजपा को फिर से कई राज्यों के राज भवनों में कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ जाये.

मंगलवार को खबर आई कि केन्द्रीय गृह सचिव अनिल गोस्वामी ने 6 राज्यपालों को केन्द्र सरकार की मंशा से अवगत करा दिया है. इन 6 राज्यपालों से कहा गया है कि वे अपना इस्तीफा भेज दें. खबरों के अनुसार इनमें राजस्थान की राज्यपाल मार्ग्रेट अल्वा, गुजरात की राज्यपाल कमला बेनीवाल, बंगाल के राज्यपाल एमके नारायणन, केरल की राज्यपाल शीला दीक्षित, महाराष्ट्र के राज्यपाल शंकरनारायणन तथा त्रिपुरा के देवेन्द्र कुंवर हैं. इसके अलावा खबर यह भी है कि कुल 12 राज्यपालों को हटाया जाना है.

जाहिर सी बात है कि जब इतने राज्यपालों को हटाया जा रहा है तो उनके स्थान की भरपाई के लिये एनडीए-भाजपा के पास कोई विकल्प तो जरूर होगा. याद करें कि अपने सरकार के गठन के समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक फार्मूला बनाया था जिसके तहत बड़ी उम्र के भाजपा के नेताओं को मंत्री का पद नहीं दिया गया था.

कारण बताया गया था कि मोदी चाहते हैं कि उनके मंत्री दिन में 16 से 18 घंटे तक काम करें जो बड़ी उम्र के नेताओं के लिये संभव नहीं हो पायेगा. यह अलग बात है कि इस फार्मूले से मोदी ने आडवाणी तथा मुरली मनोहर जोशी जैसे नेताओं को मंत्री बनने से रोक दिया था.

उसी समय से कयास लगाये जा रहें हैं कि भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेता जिनमें कभी दिल्ली में मुख्यमंत्री पद के दावेदार रहे वीके मल्होत्रा, अयोध्या आंदोलन के सेनापति कल्याण सिंह, उत्तरप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष रहे केशरीनाथ त्रिपाठी, पार्टी के बुजुर्ग नेता लालजी टंडन, कैलाश जोशी, यशवंत सिन्हा और ओ राजगोपाल को राज्यपाल की कुर्सी से नवाज़ा जा सकता है.

मंगलवार को ही उत्तरप्रदेश के राज्यपाल बीएल जोशी ने अपना इस्तीफा राष्ट्रपति को भेज दिया है. वहीं, खबरों के अनुसार केरल की राज्यपाल शीला दीक्षित ने इसका विरोध किया है.

गौर करने वाली बात यह है कि यूपीए ने भी 2004 में सत्ता में आते ही एनडीए के समय के चार राज्यपालों को अपने पद से हटा दिया था. जाहिर है कि राजनीतिक टकराव उसी तरह हो सकता है जैसा 2004 में हुआ था. इससे पहले भी राज्यपाल की नियुक्ति में राजनीतिक दखल को लेकर राजनीतिक विवाद उठते रहे हैं.

कानून तथा संविधान के जानकारों के मुताबिक इस बार की स्थिति 2004 के समय से अलग है. इसका कारण यह है कि 2010 में सर्वोच्य न्यायालय का इस बारे में एक फैसला आया था. जो राज्यपाल की नियुक्ति और केंद्र सरकार के हस्तक्षेप को सीमित करता है. ऐसे में कानूनी जानकारों की मानें तो राज्यपाल को हटाना अब केंद्र सरकार के लिए आसान काम नहीं है.

संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक राष्ट्रपति जब तक चाहें राज्यपाल अपने पद पर बने रह सकते हैं, लेकिन कैबिनेट की सलाह से अगर राज्यपाल को हटाया भी जाता है तो उसके लिए ठोस वजह होनी जरूरी है. यहां पर सरकारिया कमीशन के सिफारिशों पर भी एक नजर डाल लेते हैं.

सरकारिया कमीशन का साफ कहना था कि किसी क्षेत्र में अहम योगदान देने वाले शख्स को ही राज्यपाल होना चाहिए. उसे राज्य से बाहर का होना चाहिए और राज्य की राजनीति के घनिष्ठ संपर्क में नहीं होना चाहिए. अच्छा हो वो उस दल का न हो जिस दल की केंद्र में सरकार हो.

अब भाजपा सरकारिया आयोग के सिफारिशों को कितना वजन देती है या राज्यपालों को हटाने के लिये कौन सा ठोस कारण बताती है यह भविष्य के गर्भ में है. इसके लिये इंतजार करना पड़ेगा परन्तु इतना स्पष्ट है कि वह यूपीए के समय के राज्यपालों से कह रही है कि “सिंहासन खाली करो कि भाजपा आती है.”

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