पास-पड़ोस

मप्र: ‘अदृश्य पत्रकारों’ को विज्ञापन!

भोपाल | समाचार डेस्क: मध्य प्रदेश में ‘अदृश्य महिला पत्रकारों’ को करोड़ों रुपयों का विज्ञापन दिया गया है. हाल ही में मध्य प्रदेश विधानसभा में एक सवाल के जवाब में जो उत्तर दिया गया है कम से कम उससे तो यही प्रतीत होता है. मध्य प्रदेश सरकार के इस काम पर आलोचकों का कहना है कि चांदी का जूता चलाया जा रहा है वहीं, सरकारी अधिकारियों का कथन है कि सबकुछ नियमानुसार हो रहा है.

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में महिला पत्रकारों की जो संख्या है, वह आपको चकित कर सकती है. मगर इनमें अधिकांश हैं अदृश्य! इन्हें किसी ने कभी किसी कार्यक्रम का कवरेज करते नहीं देखा. सिर्फ प्रदेश का जनसंपर्क संचालनालय इन्हें अपने ‘दिव्यचक्षु’ से देखता है और इनके द्वारा संचालित वेबसाइटों के लिए करोड़ों के विज्ञापन जारी करता है.

वैसे तो देश में महिलाओं को हर क्षेत्र में आरक्षण दिए जाने की जिरह चल रही है, मध्य प्रदेश में भी सरकार नौकरियों में महिलाओं को आरक्षण दिए जाने को लेकर कई बड़े फैसले कर चुकी है, लगता है कि राज्य का जनसंपर्क संचालनालय भी महिलाओं का हिमायती है. कम से कम वेबसाइटों के लिए जारी विज्ञापनों को देखकर तो यही लगता है.

पिछले दिनों विधानसभा में कांग्रेस विधायक बाला बच्चन द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में जनसंपर्क मंत्री राजेंद्र शुक्ल ने वेबसाइटों, पोर्टल आदि को जारी किए गए विज्ञापनों का जो ब्योरा जारी किया है, वह चौंकाने वाला है. बीते तीन वर्षो में लगभग 200 वेबसाइटों को कई करोड़ रुपये के विज्ञापन दिए गए. इनमें 50 से ज्यादा वेबसाइटें महिलाओं के नाम पर हैं.

वरिष्ठ पत्रकार भारत शर्मा का कहना है, “यूं तो हर राज्य की सरकारें मीडिया को भ्रष्ट करने में लगी रहती हैं, मगर मध्य प्रदेश का हाल और भी बुरा है. सरकार पहले तो मीडिया प्रतिष्ठान के मालिकान को खूब विज्ञापन देकर संतुष्ट करती है और जो पत्रकार तंत्र की कमजोरी को उजागर करने वाली खबर लिखने का माद्दा रखते हैं, प्रलोभन देकर उनकी कलम की धार को कुंद करने से भी नहीं चूकती.

कई पत्रकार ऐसे हैं जो किसी मीडिया संस्थान में काम करते हुए अपनी वेबसाइट चलाते हैं. वे जब खुद सरकारी विज्ञापन हासिल करने में नाकाम हो जाते हैं, तब अपने परिवार के किसी सदस्य के नाम पर दूसरी वेबसाइट शुरू करते हैं, जिसके लिए सरकार की कृपा बरसती है. हां, तब उनकी कलम की धार जरूर कुंद हो जाती है और यही कारण है कि राज्य के बड़े से बड़े मुद्दे भी स्थानीय मीडिया में जगह नहीं ले पाते.

शर्मा का कहना है कि सरकार की ओर से पत्रकारों को खुश कर गंभीर मुद्दों को दबाने की कोशिश होती है और अगर कोई पत्रकार किसी मुद्दे पर खबर प्रकाशित करवा लेता है, तो उसे सबक सिखाने यानी नौकरी से निकलवाने तक के प्रयास में सरकार से जुड़े लोग जुट जाते हैं. समझौता न करने वाले पत्रकारों के तबादले तो यहां आम बात है.

जनसंपर्क संचालनालय ने महिलाओं के नाम से संचालित जिन वेबसाइटों को विज्ञापन दिए हैं, उनमें से कई के परिजन पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं. इतना ही नहीं, कई वेबसाइटें तो सरकारी आवासों से चल रही हैं और एक ही आवास का पता एक से ज्यादा वेबसाइट के लिए दिया गया है.

महत्वपूर्ण बात यह है कि जो महिला पत्रकार सक्रिय हैं, उनमें से इक्का-दुक्का की वेबसाइट को ही सरकार की ओर से विज्ञापन मिल पा रहे हैं. ऐसी कई वेबसाइटें तीन साल में कई लाख का विज्ञापन पा चुकी हैं.

कांग्रेस विधायक और विधानसभा में उपनेता बाला बच्चन ने कहा कि उन्हें इस बात की आशंका थी कि कहीं सरकार बोगस पत्रकारों को तो नहीं, वेबसाइटों के नाम पर सरकारी फंड लुटा रही है, इसीलिए सवाल पूछा था. ब्योरा उन्हें मिला है, वे स्वयं इसका परीक्षण कर रहे हैं, इस सूची में कितने बोगस लोग हैं.

जनसंपर्क विभाग के सूत्रों का कहना है कि प्रतिमाह 25 हजार रुपये से 50 हजार रुपये प्रतिमाह वेबसाइटों को विज्ञापन दिए जाते हैं. जो जितना प्रभावशाली होता है, उसे उतना विज्ञापन मिलता है. यही कारण है कि बीते तीन वर्ष में किसी को 50 हजार रुपये का ही विज्ञापन मिला तो किसी को 18 लाख रुपये का.

सूचना का अधिकार कार्यकर्ता एश्वर्य पांडे का कहना है कि सरकार ने मीडिया को अपने नियंत्रण में रखने के लिए बड़ी संख्या में उन लोगों से जुड़े लोगों को विज्ञापन दिए हैं, जो पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. यही कारण है कि पत्रकारों को कई बार खबरें विज्ञापन देने वालों के दवाब में रोकनी पड़ती है.

वह कहते हैं, “सभी पत्रकार ऐसे हैं, ऐसा भी नहीं है. इसके अलावा कई पत्रकार सरकार से विज्ञापन लेकर भी खबरों पर आधारित वेबसाइट चला रहे हैं, जो किसी तरह का समझौता नहीं करते.”

वहीं जनसंपर्क विभाग के आयुक्त अनुपम राजन से वेबसाइटों को विज्ञापन जारी किए जाने के मसले पर सवाल किया गया तो उनका जवाब था, “नियमों के तहत विज्ञापन दिए गए होंगे, कोई तो प्रक्रिया रही ही होगी, आवेदन किया होगा, तभी तो विज्ञापन पाया होगा. हर वेबसाइट की एक अलग फाइल होती है जो वल्लभ भवन में रहती है. ऐसा कैसे हुआ, यह तो फाइलों को देखकर ही बताया जा सकेगा.”

राज्य में वेबसाइटों को विज्ञापन जारी करने के लिए नीति है, और उसमें साफ कहा गया है कि डीएवीपी के नियमों के आधार पर ही विज्ञापन जारी किए जाएंगे, मगर जानकार कहते हैं कि विभाग मनमाफिक तरीके से विज्ञापन जारी करता है.

error: Content is protected !!