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तरीघाट में खारून नदी घाटी सभ्यता

रायपुर: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 28 किलोमीटर की दूरी पर खारून नदी के किनारे ग्राम तरीघाट में प्राचीनतम व्यापारिक केंद्र होने की संभावना व्यक्त की गई है. पुरातत्व विभाग द्वारा की जा रही खुदाई के बाद पुरातत्वविदों ने इसे खारून नदी घाटी की सभ्यता का नाम दिया है. पुरातत्व विभाग के अधिकारियों ने वहां लगभग 15 हेक्टेयर की सरकारी जमीन पर फैले मिट्टी के चार बड़े टीलों में से एक टीलें की खुदाई शुरू करके गहराई में दबे एक शहर के होने की संभावनाओं का पता लगाया है. उत्खनन का काम पिछले चार महीनों से चल रहा है.

पुरातत्व विभाग के अधिकारियों का कहना है कि अलग-अलग परतों में दबे सैकड़ों अवशेषों के संकेत वहां मिल रहे हैं, जिससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि वहां इससे भी ज्यादा शायद ढाई हजार साल या उससे भी पुराना कोई शहर रहा होगा. वहां पर ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के शुंग वंश और उसके बाद के अलग-अलग कालखण्डों में क्रमशः कुषाण, सातवाहन, शरभपुरीय (गुप्त) वंश, मौर्य वंश और कालान्तर में कलचुरी राजवंशों के शासन काल के भी प्रमाण प्राप्त हो रहे हैं.

नदी किनारे इस जगह पर ग्रामीणों ने दशहरा मनाने के लिए गांव के युवाओं की नवयुवा नदी समिति ने हाल के वर्षो में रावण की एक विशाल मूर्ति भी बनवा रखी है. रावण की विशाल मूर्ति के सामने स्थित टीले में खुदाई चल रही है. करीब 20 फीट की खुदाई हो चुकी है. इसमें शरभपुरीय (गुप्त) राजवंश के समय के राजा महेन्द्रादित्य और राजा प्रसेनजीत के शासनकाल में प्रचलित स्वर्ण सिक्कों को लगभग एक हजार 600 वर्ष पुराना माना जा रहा है. कुषाण राजवंश के समय में प्रचलित कार्यालयीन सील (मोहर) भी मिली है. यह सील करीब दो हजार 300 वर्ष पुरानी है. उस युग में प्रचलित तांबे के आभूषण भी वहां प्राप्त हुए हैं, जिनमें महिलाओं द्वारा पहनी जाने वाली चूड़ियां भी शामिल हैं.

अब तक मिले सैकड़ों वर्ष पुराने मकानों के अवशेषों के साथ उत्खनन में मानव के दैनिक जीवन से जुड़ी जो कुछ भी वस्तुएं प्राप्त हो रही हैं, उनका अध्ययन करने के बाद पुरातत्ववेत्ता इस निष्कर्ष पर जरूर पहुचे हैं कि तरीघाट किसी जमाने में निम्न और मध्यम आय वर्ग के लोगों का एक शहर हुआ करता था. उनका यह भी कहना है कि जिस प्रकार मोहन जोदाड़ो और हड़प्पा के उत्खनन में प्राप्त वस्तुओं से अधिकांश वस्तुएं मनुष्य के दैनिक जीवन की जरूरतों से जुड़ी हुई है, जिनसे तत्कालीन समय की सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों का पता चलता है, ठीक उसी तरह तरीघाट के प्राचीन अवशेष भी यह संकेत दे रहे हैं कि आज से करीब-करीब ढाई हजार साल पहले वहां का जन-जीवन और रहन-सहन कैसा रहा होगा.

पुरातत्वविदों का कहना है कि मकानों के निर्माण में उस जमाने में ईंटों का इस्तेमाल अपेक्षाकृत कम होता था. लोग सैंडस्टोन का इस्तेमाल करते थे. उनकी जोड़ाई मिट्टी से की जाती थी. पुरातत्ववेत्ता इसे छत्तीसगढ़ में खारून घाटी की सभ्यता के रूप में देख रहे हैं. उनका कहना है कि इस नदी के किनारे न केवल तरीघाट बल्कि पाटन और कौही में भी ऐसे टीले हैं, जिन्हें खुदाई के लिए चिन्हांकित कर लिया गया है. पुरातत्व अधिकारियों ने यह भी अनुमान लगाया है कि तरीघाट खारून नदी के किनारे किसी जमाने में एक बड़ा व्यापारिक केन्द्र रहा होगा. सभी टीलों का भू-उपग्रह आधारित सर्वेक्षण भी कराया गया है.

अधिकारियों ने बताया कि पुरातत्व विभाग के अधिकारियों ने यह भी कहा कि फिलहाल वहां पर उत्खनन प्रारंभिक चरण में हैं, लेकिन अब तक जितना उत्खनन हुआ है, उनमें कुषाण युग के कुछ सोने के सिक्के भी मिले हैं. इसके अलावा बड़ी मात्रा में मिट्टी के बर्तनों, महिलाओं के सामान्य आभूषणों के अवशेष भी प्राप्त हो रहे हैं. शरभपुरीय (गुप्त) वंश के किसी तत्कालीन शासक की ब्राम्ही लिपि में एक कार्यालयीन मुहर भी प्राप्त हुई है. वहां पर उस जमाने में चौसर, पासा खेलने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले चौकोर टुकड़े भी प्राप्त हुए हैं. हालांकि पुरातत्ववेत्ता इसे महाभारत युग से जोड़ने की जरूरत नहीं मानते. उनका कहना है कि प्राचीन भारत में पासा कई युगों से खेला जाता रहा है.

तरीघाट में लोहे के भाले, हंसिया जैसे औजारों के अवशेष भी वहां पर उत्खनन में मिले हैं. राजा महेन्द्रादित्य के समय के तीन स्वर्ण सिक्के प्राप्त हुए है, जिन पर गरूड़ के साथ-साथ शंख और चक्र और ब्राम्ही लिपि में ‘श्री प्रसन्न मात्र’ शब्द भी अंकित हैं. बाल संवारने के लिए वहां उस युग में हाथी दांत की कंघी का इस्तेमाल होता था. उसका भी एक हिस्सा वहां प्राप्त हुआ है. कुछ तांबे से निर्मित सिक्के भी वहां मिले हैं. पुरातत्व अधिकारियों ने बताया कि वर्ष 2008 में तरीघाट में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का एक दल सर्वे के लिए आया था. दल के सदस्यों को वहां मिट्टी के टीलों में चमकीले काले रंग के मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े जमीन से झांकते नजर आए. इस पर उन्होंने राज्य सरकार को वहां उत्खनन की सलाह दी.

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