यौन उत्पीड़न का दोषी कौन ?

Saturday, December 7, 2013

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रेप

जे के कर
लड़कियों पर केन्द्रीय मंत्री फारुख अबदुल्ला द्वारा दिया गया बयान समाज से पूछ रहा है कि यौन उत्पीड़न का दोषी कौन है? यौन उत्पीड़क या स्वंय पीड़िता. यदि दोषी पीड़िता नहीं है तो तो उसे पीए रखने में हर्ज ही क्या है. दंड का भागी तो है उत्पीड़क तथा उसकी मानसिकता. जिसे दंडित करने तथा नियंत्रण में रखे जाने की जरूरत है. यह अत्यंत शर्मनाक है कि देश के एक केन्द्रीय मंत्री यौन उत्पीड़न के लिये पीड़िता को ही अपरोक्ष रूप से दोषी ठहरा रहें.

फारुख अब्दुल्ला साहब से जब अशोक कुमार गांगुली मामले में प्रतिक्रिया मांगी गई तो उन्होंने कहा, ‘अब तो ये हालत हो गई है कि आजकल लड़की से बात करने में भी डर लगने लगा है. बल्कि हम तो समझते हैं कि हम में से अब किसी को सेक्रेटरी ही नहीं रखनी है लड़की. खुदा-ना-खास्ता हमारे खिलाफ शिकायत न हो जाए और हम ही जेल न पहुंच जाएं. हालत ऐसी हो गई है. मैं मानता हूं कि हिंदुस्तान में रेप बढ़ गए हैं. ऐसी बात नहीं है कि ऐसा नहीं है, मगर कहीं तो कोई रुकावट होनी चाहिए.’

फारुख अब्दुल्ला साहब को इतना तो मालूम अवश्य होगा कि पुरुष केवल अपनी पीए या सहकर्मी का ही यौन उत्पीड़न नही करते हैं वरन् इससे ज्यादा मामले तो जान-पहचान, पास-पड़ोस, तथा रिश्तेदारी में किये जाते रहें हैं. उसे कैसे रोका जा सकता है. क्या पुरुष समाज से महिलाओं को दूर कर देना समस्या का हल है. मूल समस्या तो यह है कि इतना विकसित होनें के बावजूद भी समाज के पुरुषों का हिस्सा अपने मानसिकता में परिवर्तन नही ला पाया है. उसकी काम पिपासा है कि उन्मुक्त होकर विचरण करना चाहती है.

हालांकि किसी भी महिला या महिला संगठनों ने यह सवाल नही खड़ा किया है कि पुरुषों को महिला पीए नही मिलना चाहिये. जिसका तात्पर्य ही यह है कि महिलाओं को पुरुष समाज पर इतने उत्पीड़न के बावजूद भी अविश्वास नहीं है. हैरत की बात यह है कि फारुख अब्दुल्ला उस राजनीतिक विरासत का प्रतिनिधित्वय करते हैं जिसने कश्मीर को भारत में शामिल करने के बाद उसके राजनीतिक प्रमुख के जिम्मेवारी का निर्वहण किया है. उस समय तो किसी भी महिला ने एक पुरुष को प्रमुख बनाने का विरोध नहीं किया था. कश्मीर में फारुख अब्दुल्ला तथा उनके पिता के दौर में भी बलात्कार होते थे. फारुख अब्दुल्ला ने तब क्यों नही पुरुषों के सरकारी अफसर बनने का विरोध नही किया था.

इसे समझा जा सकता है कि फारुख अब्दुल्ला का महिलाओं पर दिया गया बयान उनके पुरुषवादी नजरिये का ही परिणाम है, जिससे हम-आप भी पीड़ित हैं. महिलाएं हमेशा से ही दोहरे शोषण का शिकार होती आयी है. चाहे वह दास प्रथा का जमाना हो या सामंतशाही का दौर हो या वर्तमान पूंजी परस्त व्यवस्था हो. महिलाएं दो प्रकार से शोषण का शिकार होती आयी हैं पहला व्यवस्थागत तथा दूसरा अपने महिला होनें के लिये. यह सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है. जिसका मिशाल जस्टिस अशोक कुमार गांगुली तथा तरुण तेजपाल प्रकरण से समझा जा सकता है.

मन करता है कि फारुख साहब से पूछू कि दिल्ली की निर्भया किसकी पीए थी ? लेकिन उसे भी पौरुषवादी अत्याचार का शिकार होकर अपना जान गवांना पड़ा था. महिलाएं दुनिया के आबादी का आधा हिस्सा है जिसे काम करने से नही रोका जा सकता है. यदि महिलाओं को काम करने से रोकने के समर्थन में बात की जाती है तो मानना पड़ेगा कि समाज के पहिये को पीछे घुमाने की कोशिश की जा रही है. ऐसा क्यों होता है कि कुछ पुरुष यह सोचने लगते हैं कि उसके पीए या सहकर्मी के शरीर पर भी उसका अधिकार है. क्या इसलिये की नारी आज भी अबला से सबला नही बन पाई है.

प्रकृति ने पुरुष को पौरुष की शक्ति तथा महिलाओं को मातृत्वय का वरदान दिया है. जिसके संयमित मिलन से ही नये समाज का जन्म होता है. यदि नारी में मातृत्वय का वरदान न होता तो हम आप नही होते न ही फारुख अब्दुल्ला साहब, जस्टिस अशोक कुमार गांगुली तथा तरुण तेजपाल होते. जरूरत है प्रकृति के नियमों को समझने की. पशुओं में भी में सेक्स के मामले में एक अनुशासन देखा जा सकता है. कुछ जिंदगी भर के लिये जोड़े बनाते हैं और कुछ एक मौसम के लिये. बलात्कार शायद ही मनुष्य के अलावा कोई और प्राणी करता होगा. जंगल का राजा शेर भी तब तक शेरनी से संबंध स्थापित नही कर पाता जब तक शेरनी इसके लिये तैयार न हो जाये.

मनुष्य तथा पशुओं में एक अंतर होता है. पशु प्रकृति की गुलामी करते हैं जबकि मनुष्य प्रकृति को अपने रहने लायक बनाने की क्षमता रखता है. इसका कारण है कि कुदरत ने मनुष्य को एक बहुत ही विकसित दिमाग दिया जो मनुष्य को इस धरा का प्रथम श्रेणी का बाशिंदा साबित करता है. इस सर्वोच्य बाशिंदे को साबित करना पड़ेगा कि उसका लैंगिक व्यवहार पशिओं से बेहतर है अन्यथा उसके तथा पशुओं में कोई अंतर नही रह जायेगा.

शुक्रवार को मीडिया में इस मुद्दे पर चली बहस के बाद फारुख साहब ने माफी तो मांग ली है परन्तु उन्होंने जो घाव दिये हैं उसका क्या इलाज है. समाज के कानून में भी है कि दोषी पीड़िता नहीं उत्पीड़क है फिर इससे अलग मत रखने की फारुख अब्दुल्ला साहब को क्या जरूरत आन पड़ी थी. समाज दोषी को बचाने के बजाये उसे दंडित करने में सहयोग करे. महिलाओं पर ऊल जलूल आरोप लगाने से पुरुषों तथा पद की गरिमा को ठेस पहुंचती है फारुख साहब.

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