लेफ्ट की मर्सिया पढ़ने वाले कहां हैं

Friday, June 24, 2016

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सवाल

त्वरित टिप्पणी | बादल सरोज: समाजवाद-साम्यवाद के अंत की घोषणा करने वाले कहां हैं? ब्रिटेन की जनता ने आज बड़े पूंजीवादी गठजोड़ के खिलाफ़ अपना मत प्रकट किया है. यह उन लोगों की वैचारिक हार है जो मान बैठे थे कि वर्तमान व्यवस्था के पास अपनी जनता को देने के लिये सब कुछ है. यदि जनता को देने के लिये सब कुछ है तो जनता ने क्यों उस गठजोड़ को ख़ारिज किया जिसे अपराजेय माना जा रहा था.

बेशक, यह मतसंग्रह समाजवाद-साम्यवाद के पक्ष में नहीं है परन्तु यह वर्तमान व्यवस्था के खिलाफ़ वहां की जनता के रोष की उद्घोषणा जरूर है.

इंग्लैंड की जनता ने यूरोपीय यूनियन से पल्ला झाड़ने का निर्णायक सन्देश दे दिया है. इस भूकंप से लन्दन की सत्ता ही नहीं कंपकंपाई अमरीका और खुद हमारी दलाल स्ट्रीट सहित सट्टाबाजार हिलडुल रहा है. फ्रांस पहले से ही उबला पड़ रहा है. ब्राजील समेटे नहीं सिमट रहा. ग्रीस में उड़ी धूल अभी बैठी नहीं है. संकट है कि बढ़ता ही चला जा रहा है. जिससे एक के बाद एक देश प्रभावित हो रहें हैं.

दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करने वाले ब्रेटनवुड संगठनों- आईएमएफ-विश्वबैंक-मुद्राकोष ने चौथे संगठन नाटो के साथ रिश्ते प्रगाढ़ कर चण्डाल चौकड़ी पूरी कर ली है. दुनिया नए अज्ञात भविष्य वाले अन्धकार में दाखिल होने की ओर है.

ऐसे में पेरिस से लन्दन की धमक एक बड़े मंथन की अभिव्यक्ति है जहां पिछले पंद्रह दिनों से लोग सड़को पर सरकारी नीतियों का विरोध कर रहें हैं. दो दिन पहले ही वहां की पुलिस ने कह दिया है कि अब हमें भी कुछ दिन आराम करने के लिये दीजिये. एक बड़ी बीमारी का लक्षण है. दुनिया भर में जारी कारपोरेट पूंजी बनाम जनता, सामराजी वर्चस्व बनाम राष्ट्र राज्य, निर्बाध मुनाफा बनाम लोकतंत्र की टकराहटों से निकली चिंगारियां हैं. लक्षण ऐसी बीमारी के हैं जिसकी दवा वर्तमान व्यवस्था के पास नहीं हैं.

इसीलिए इस घनगरज के बीच सोवियत विघटन के बाद इतिहास के अन्त के घोषणावीर चुप हैं. वर्तमान व्यवस्था की अपराजेयता के चारण भाट खामोश है.

समाजवाद का नारा लगाते हुए बर्नी सांडर्स का अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव की दौड़ में काफी आगे तक पहुँच जाना, ब्रिटेन की लेबर पार्टी का अध्यक्ष धुर वामपंथी कहे जाने वाले जेरेमी कोर्बिन का बन जाना रोग की मुफीद दवा तलाशने की छटपटाहट का प्रमाण है.

मजे की बात है कि ये छटपटाहट वर्तमान व्यवस्था के अभेद्य कहे जाने वाले दुर्गों में हो रही है.

यह मंथन अपने में उम्मीद और आशंकाएँ दोनों से भरा है. इसमें से विष और अमृत दोनों निकल सकते हैं. इस कुहासे में डूबते उतरते अतीत के प्रेत भी हैं. जो कही डोनाल्ड ट्रम्प के मुखौटे में हैं तो कहीं आव्रजन विरोधी संकीर्णतावादी हुजूमो में हैं. इससे दक्षिणपंथ कमजोर भी हो सकता है और मजबूत भी.

अन्तर्निहित आशंकाओं के बावजूद जनअसंतोष के बादल उमड़ घुमड़ रहे हैं, यह कारपोरेटियों की नींद उड़ाने और सही विकल्प के लिए लड़ने वालो की आलस तोड़ने के लायक मामला तो है ही. भारत में भी हालिया विधानसभा चुनावों में समाजवादी ताकतों की हार से उदास तथा खुश लोगों के लिये ब्रिटेन की जनता ने एक संदेश दिया है जिसे जानने, समझने की जरूरत है.

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