फौजी हो या मनमौजी?

Wednesday, February 26, 2014

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पूर्व सेनाध्यक्ष वी के सिंह

कनक तिवारी
भाजपा इन दिनों तरह तरह के सेवानिवृत्त खाकीधारी अखाड़चियों का अखाड़ा बनती जा रही है. पूर्व महिला आईपी.एस. अधिकारी किरण बेदी भाजपा पर मेहरबान हैं. मुम्बई के पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह सेवा छोड़कर भाजपा में जा चुके हैं.

पूर्व गृह केन्द्रीय गृह सचिव आर.के. सिंह और पूर्व रॉ प्रमुख संजीव त्रिपाठी भी भाजपा में शरणम गच्छामि हो चुके हैं. इन सबसे बड़ा ओहदेदार किरदार पूर्व थलसेनाध्यक्ष विजय कुमार सिंह का है. वे भी मोदी की सभा में बगलगीर रहे देखे सुने गए. वी.के. सिंह बहुचर्चित सेनापति हैं. यह तय ही नहीं हुआ कि उनकी असली जन्मतिथि क्या है. इस कारण उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध रक्षा मंत्रालय ने सेवानिवृत्त कर दिया. सिंह सुप्रीम कोर्ट गए. वहां का फैसला उन्हें रास नहीं आया. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी कर दी. सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर फटकार लगाई तो उन्होंने बिना शर्त माफी मांग ली.

वे अपने एक कनिष्ठ अधिकारी पर गोपनीयता भंग करने का आरोप लगा चुके. कनिष्ठ अधिकारी ने मुकदमा ठोंक दिया. सिंह उसके बाद रालेगणसिद्धि में अन्ना के अनशन समाप्ति समारोह में शामिल हुए. अन्ना ने केन्द्र सरकार को अल्टीमेटम दिया था कि वह लोकपाल बिल संसद में पारित करे. इस सभा में भी वी.के. सिंह ने कुछ विवादास्पद बयान दिए. प्रेस ने जब सफाई मांगी तो टालमटोल कर गए.

सिंह का ताज़ा बयान है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने से देश की सीमाओं की मुस्तैदी के साथ रक्षा होगी. क्या इसका यह अर्थ है आज तक के सेनाध्यक्षों ने देश की सीमाओं की वांछित रक्षा नहीं की? ऐसे सेनाध्यक्षों में सिंह खुद भी तो शामिल कहे जाएंगे. सेनाध्यक्ष मानेक शॉ के रहते पूर्वी पाकिस्तान को तोड़कर बांग्लादेश बना दिया गया. क्या सिंह उसे भारत की सरहद की रक्षा से बड़ा काम नहीं कहेंगे? नरेन्द्र मोदी अन्य भारतीय प्रधानमंत्रियों के मुकाबले क्या कोई सैन्य विशेषज्ञ हैं?

भाजपा में शामिल होकर लोकसभा का टिकट वी.के. सिंह को दिए जाने की संभावनाएं कुलबुला तो रही हैं. यह कैसा देश है जहां की सुरक्षा इकाइयों के तरह तरह के प्रमुख सेवानिवृत्त होते ही राजनीतिक दलों की ओर मार्चपास्ट करने लगते हैं. यह अर्थ लगाया जा सकता है कि उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धताएं वर्षों से उसी संभावित राजनीतिक पार्टी की सदस्यता लेने के लिए पक रही होंगी. यदि ऐसी पार्टी विपक्ष में रही हो तो उसके नेताओं से उनकी सांठगांठ भी रही होगी. यदि सांठगांठ रही होगी तो गोपनीयता भी भंग हो सकती रही होगी.

कुल मिलाकर यह दृश्य संशयग्रस्त है. राजनीतिक पार्टियों के निष्ठावान अनुभवी कार्यकर्ताओं के ऊपर सेवानिवृत्त सुरक्षा अधिकारियों को लादकर सांसद बनाए जाने का कुचक्र राजनीतिक पार्टियों को जनसेवा का माध्यम रहने देने के बदले सत्ता की सीढ़ी बना देता है. ऐसे निजी महत्वाकांक्षी अफसरों से बचने पर ही लोकतंत्र मजबूत रह सकता है.
* उसने कहा है-17

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