विवेकानन्द को पढ़ो

Sunday, February 16, 2014

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स्वामी विवेकानंद

कनक तिवारी
कांग्रेसी महान लोग हैं. संघ परिवार और नरेन्द्र मोदी एक एक कर कांग्रेस के पूर्वजों को भगवा रंग में रंग रहे हैं. कांग्रेस है कि उसे अपने पूर्वजों की सुध नहीं है. केवल गांधी और नेहरू ऐसे हैं जिनको लेकर संघ परिवार बहुत अधिक उत्साह में नहीं होता. उस पर गांधी की हत्या का आरोप लगा था. भले ही अदालती कार्यवाही में कुछ सिद्ध नहीं हो पाया.

लोकस्मृति अदालती फैसलों से ऊपर होती है. नेहरू खानदान लगातार सत्ता पर काबिज होने से भाजपा की हिट लिस्ट में है. वैसे भी नेहरू और गांधी का धर्मनिरपेक्ष रवैया हिन्दुत्व की आंख की किरकिरी है. फिलहाल सरदार पटेल भाजपा रक्षक बनाए गए हैं. संसार में सबसे बड़ी मूर्ति अहमदाबाद में नरेन्द्र मोदी बनवा रहे हैं. विवेकानन्द का 150 वां जन्मवर्ष भी बिल्ली के भाग से टूटे छींके की तरह संघ परिवार के खाते में आया. जबकि विवेकानन्द पूरी तौर पर धर्मनिरपेक्ष हैं.

उन्होंने कट्टर हिन्दुत्व की बखिया उधेड़ी है. युवकों के हृदय सम्राट शहीदे-आज़म भगतसिंह ने केवल जवाहरलाल नेहरू की प्रगतिशील विचारों की वजह से प्रशंसा की है. महान कांग्रेसियों को कुछ पता नहीं है. फिर भी वे लोकसभा चुनाव लड़ने जा रहे हैं.

शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन के प्रसिद्ध भाषण के बाद विवेकानन्द इंग्लैंड भी गए थे. अपने छोटे भाई महेन्द्रनाथ दत्त से कांग्रेस के जन आंदोलन की जानकारी मिलने पर उन्होंने साफ कहा था कि भीख मांगने से आज़ादी नहीं मिलेगी. कांग्रेस नेताओं से कहो कि ऐलान कर दें कि भारत आज़ाद हो गया है. केवल कुछ पढ़े लिखे शहरी बाबुओं के दम पर आंदोलन करने के बदले आम जनता को कांग्रेस के आंदोलन से जोड़ो. इतिहास गवाह है कि कांग्रेस ने ऐसा ही किया.

यह पूछे जाने पर कि क्या उन्होंने कांग्रेस आन्दोलन की ओर कुछ ध्यान दिया है,‘‘ विवेकानन्द ने कहा ‘‘मैं यह नहीं कह सकता कि मैंने काफ़ी ध्यान दिया है. मेरा कार्यक्षेत्र दूसरा है. पर मैं इस आन्दोलन को महत्वपूर्ण मानता हूं और हृदय से उसकी सफलता चाहता हूं.‘‘ भारत के जागरण के संबंध में भी विवेकानन्द ने कहा था कि अच्छी तरह संसार उसे शायद मुख्यतया कांग्रेस आन्दोलन और सामाजिक सुधारों के क्षेत्र में देखता है.

एक अवसर पर उन्होंने कांग्रेसियों को झिड़की भी लगाई कि उग्र दुर्भिक्ष, बाढ़, रोग और महामारी के दिनों में कांग्रेस-वाले कहां हैं? क्या यह कहना पर्याप्त होगा कि ‘राजशासन हमारे हाथ में दे दो?‘ और उनकी सुनेगा भी कौन? यदि मनुष्य काम करता है, तो क्या उसे अपना मुख खोलकर कुछ मांगना पड़ता है? यदि तुम्हारे जैसे दो हजार लोग कई ज़िलों में काम करते हों, तो राजकाज के विषय में अंग्रेज़ स्वयं बुलाकर तुमसे सलाह लेंगे! देश में जो बुराइयां और कुरीतियां हैं, उन्हें दूर करने के लिए कांग्रेस तथा देशभक्त संस्थाएं प्रचार और आन्दोलन कर रही हैं तथा अंग्रेज़ सरकार से प्रार्थना भी कर रही हैं. क्या इससे अच्छा भी अन्य कोई मार्ग है?
* उसने कहा है-15

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