7वें वेतन आयोग का सच

Friday, July 1, 2016

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सातवां वेतन आयोग

अरुण कान्त शुक्ला
आप चाहें तो केंद्र सरकार की इसके लिए प्रशंसा कर सकते हैं कि उसने सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के एक हिस्से को मात्र छः माह के भीतर स्वीकार किया है. जबकि इसके पूर्व पांचवे वेतन आयोग की सिफारिशों को 19 माह तथा छठवें वेतन आयोग की सिफारिशों को 32 माह तक केंद्र की सरकारों ने लटकाया था. सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें को इस मायने में यूनिक माना जा सकता है कि यह पहला वेतन आयोग है जिसने पिछले 70 वर्षों में सबसे कम ही नहीं बल्कि नगण्य वेतन वृद्धि की सिफारिश की है.

ज्ञातव्य है कि छठवें वेतन आयोग ने 20% बढ़ोत्तरी की सिफारिश की थी, जिसे 2008 में लागू करते समय यूपीए-1 की सरकार ने दो गुना याने 40% कर दिया था. न्यूज पोर्टल्स, ई-अखबारों और प्रिंट मीडिया में इस वेतन पुनर्निर्धारण को “ढाई गुना बढ़े वेतन और पेंशन”, “वेतन में 23.5% की बढ़ोत्तरी की मंजूरी” जैसे शीर्षकों से नवाजा गया है. वहीं केन्द्रीय कर्मचारियों के असंतोष को भी प्रमुखता से उभारा गया है. यह बात और है कि यह असंतोष क्यों है, इसके विवरण में जाने की जरुरत नहीं समझी गयी. सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के खिलाफ केंद्र सरकार के कर्मचारियों का यह असंतोष नया नहीं है.

नवम्बर 2015 में सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें आने के तुरंत बाद ही केन्द्रीय सरकार के कर्मचारी संगठनों की राष्ट्रीय संयुक्त कार्यवाही समिति ने इसके अनेक प्रावधानों और सिफारिश की गयी 14.28% की वेतन वृद्धि को अपर्याप्त बताते हुए केंद्र सरकार से अपेक्षा की थी कि वह लागू करने का निर्णय लेते समय इनमें सुधार करेगी पर, सरकार ने न तो वेतन वृद्धि के प्रस्ताव में कोई सुधार किया और न ही आयोग के द्वारा प्रस्तावित भत्तों में कटौती के प्रस्तावों को नकारा है. उन पर निर्णय आना शेष है.

बुधवार को मंत्रिमंडल के द्वारा प्रस्तावों को हरी झंडी मिलते ही देश में मौजूद कारपोरेट के भगत किस्म के स्तंभकारों ने तुरंत ही केन्द्रीय कर्मचारियों के 1946 के 35 रुपये के वेतन के साथ आज के वेतन की तुलना करते हुए चर्चा भी शुरू कर दी. जबकि आयोग की सिफारिशों में कर्मचारियों के मौजूदा भत्तों के उपर जो कैंची चली है, उस पर वे शातिराना ढंग से खामोश हैं. कर्मचारियों को मिलने वाले वर्तमान आवास भत्ते के स्लेबों को 30% से घटाकर 24%, 20% को घटाकर 16%, और 10% को घटाकर 8% करने, छोटा परिवार भत्ता, त्यौहार अग्रिम को समाप्त करने, नवजात शिशु की देखभाल के लिए दिए जाने वाले अवकाश में वेतन को घटाकर 80% करने जैसे अनेक मुद्दे हैं, जो इस बढ़े हुए वेतन की बढ़ोत्तरी को निष्प्रभावित करते हैं.

सामान्यत: देश के कर्मचारी वर्ग के अलावा अन्य लोगों को सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों, बैंक, बीमा तथा सरकारी क्षेत्रों में होने वाले वेतन-पुनर्निर्धारण के बारे में अंदरुनी जानकारी नहीं होती है और वे आसानी से सरकार तथा कारपोरेट के इस भ्रामक प्रचार को सच मान बैठते हैं.

वेतन पुनर्निर्धारण के पीछे का सच-
वेतन पुनर्निर्धारण किसी भी क्षेत्र में क्यों न हो, स्वयं अपने आप में सरकार की स्वीकृति है कि वह दो वेतन पुनार्निर्धारणों के बीच की अवधि में महंगाई के बढ़ने पर रोक नहीं लगा सकी है और बढ़ी हुई महंगाई अब किसी भी तरह से वापस नहीं हो सकती. तब, एक तयशुदा समय के बाद, जो केन्द्रीय कर्मचारियों के लिए 10 वर्ष है, सरकार को कर्मचारियों को प्रदत्त महंगाई भत्ते को मूल वेतन में जोड़ना पड़ता है. इसका अर्थ हुआ कि सरकार केवल पुराने वेतन के स्तर को संभालती है और मूल वेतन में आया परिवर्तन बढ़ोत्तरी न होकर केवल पुराने वेतन के बराबर लाया जाना होता है क्योंकि तब नए वेतनमान पर मिलने वाला महंगाई भत्ता निर्धारित तिथि, जो अभी 1 जनवरी 2016 है, को शून्य हो जाता है.

इसे वर्तमान सन्दर्भ में इस तरह समझा जा सकता है कि छठवें वेतन आयोग ने न्यूनतम वेतन 7000 रुपये तय किया था. उसमें 1.1.2016 को लागू 125% महंगाई भत्ता 8,750 रुपये जोड़ने के बाद कुल न्यूनतम वेतन 15,750 रुपये होता है. 18000 रुपये न्यूनतम वेतन तय करने का अर्थ हुआ कि कुल बढ़ोत्तरी मात्र 2250 रुपये अर्थात लगभग 14.28% हुई. यही तरीका सरकार को असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, कर्मचारियों के दैनिक वेतन को तय करते समय अपनाना पड़ता है, जिसमें वह हमेशा ही हेराफेरी करती है. इस तरह मूल वेतन में वास्तविक बढ़ोत्तरी 23.55% नहीं है, जैसा कि कुप्रचार है. यह केवल 14.28% है.

14.28% की यह बढ़ोत्तरी भी कर्मचारियों पर कोई दया अथवा दान नहीं है. एक कर्मचारी लगभग 30 से 35 वर्ष तक सरकार की सेवा में रहता है, जिसके दौरान उसके ऊपर परिवार के भरण-पोषण के अतिरिक्त देश तथा समाज के लिए अच्छे सुशिक्षित नागरिक प्रदान करने की जिम्मेदारी होती है. जिसके लिए उसे अपने बच्चों को बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा दिलानी होती है, साथ ही उनके वैवाहिक संस्कारों को संपन्न कराने के दायित्व का भी निर्वाह करना होता है. यह हमारी समाज व्यवस्था की विडंबना है कि जिस दायित्व का निर्वाह सरकार और समाज को करना चाहिए उसे एक व्यक्ति की व्यक्तिगत जिम्मेदारी में डालकर सरकार पल्ला झाड़ लेती है. समाज के अन्दर मौजूद कुपोषण से लेकर अशिक्षा और बेरोजगारी जैसी अनेक समस्याओं के पीछे का सच यही है कि सरकारें समाज निर्माण के इस दायित्व पर निष्क्रिय हैं. ये दायित्व हमेशा बढ़ते क्रम में होते हैं और वेतन में मात्र 14.28% की बढ़ोत्तरी से उन्हें निभाना असंभव सा कार्य है.

न्यूनतम एवं अधिकतम वेतन में अंतर-
हमें केंद्र सरकार और राज्यों की सरकारों का प्रशासनिक ढांचा पराधीन भारत से विरासत में मिला है. अंग्रेजों को अपना शासन चलाने के लिए ऐसे प्रशासनिक अधिकारी चाहिए थे, जो न सामान्य देशवासियों को बल्कि केंद्र व राज्य के कमचारियों को भी प्रशासनिक अधिकारों के साथ साथ अपने रुतबे तथा रहन-सहन के ढंग से भी दबा कर रख सकें. इसीलिये, पराधीन भारत में निचले स्तर के कर्मचारयों का ही नहीं बल्कि आम कामगारों का भी वेतन अधिकारी, सुपरवाईजर्स स्तर के लोगों की तुलना में कई गुना कम रखा जाता था. आय में यह असमानता अनेक सामाजिक व्याधियों की जननी होती है. स्वतन्त्र भारत में केन्द्रीय कर्मचारियों के मामले में न्यूनतम और अधिकतम आय में यह अंतर पहले और दूसरे वेतन आयोग ने क्रमश: 36 तथा 37 गुना रखा था. लेकिन, तीसरे वेतन आयोग ने इसे कम कर 18 गुना, चौथे और पांचवें आयोग ने और कम करके 10 गुना तथा छटवें आयोग ने यह 11 गुना रखा.

अब सातवें वेतन आयोग ने न्यूनतम वेतन 18,000 और अधिकतम वेतन 2,50,000 करके इस अंतर को 13 गुना कर दिया है. यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि नवउदारवाद के दौर में भी इस अंतर को कम नहीं किया गया तो बनाए रखने की कोशिश की गयी. अब इसे बढाने का सीधा अर्थ है कि केंद्र सरकार देश के अन्दर मौजूद और लागातार बढ़ती असमानता की खाई को कम करने की कतई उत्सुक नहीं है बल्कि उसे और बढ़ाने की ओर अग्रसर है. जबकि, केंद्र सरकार के कर्मचारी संगठनों की संयुक्त कार्यवाही समिति ने इसे घटाकर 1:8 करने की मांग की थी. सरकार की इस सोच को नजरअंदाज इसलिए भी नहीं किया जा सकता कि जिस निजी क्षेत्र के मुकाबले वेतन वृद्धि को सरकार ठहरा रही है वहां पहले से ही यह अंतर बहुत व्यापक है और सरकार के इस कदम से वहां उस खाई के और चौड़ा होने की संभावना बनती है.

क्या यह खजाने पर बोझ है-
सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें आते ही वित्तमंत्री ने यह प्रचारित करना शुरू कर दिया था कि इन सिफारिशों से सरकार के खजाने पर 1 लाख करोड़ रुपये का बोझ आयेगा, जिसे वर्तमान में सहन नहीं किया जा सकता है. केंद्र की सरकार ने नवउदारवाद के जिस दौर को अंतिम चरण तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया है, उसमें देश के किसानों, मजदूरों, कर्मचारियों और आम जनता के कमजोर तबकों के उपर होने वाले व्यय को सरकारें, कारपोरेट और संपन्न तबके बोझ ही समझते हैं. यह केंद्र और राज्यों की सरकारों की प्रत्येक नीति में देखा जा सकता है. सरकार में वित्तमंत्री वंचित और दबे तबके के रक्षक के बतौर नहीं बल्कि बड़े कारपोरेट घरानों और संपन्न तबकों के रक्षक के रूप में दिखते हैं. तभी काले धन पर सिर्फ शब्द-वर्षा होती है और उसे एक माह में वापस लाया जाएगा, एक राजनीतिक जुमला बन जाता है.

4 लाख करोड़ रुपयों का वह कर्ज, जो कारपोरेट घरानों और संपन्नों ने बैंकों से लिया और डकार गए, वित्त मंत्री की भृकुटी में बल नहीं लाता. दो बजट में हंसते-मुस्कराते 4 लाख करोड़ की टैक्स राहत और कर अदायगी से माफी कारपोरेट को दे दी जाती है. जबकि आम लोगों पर अप्रत्यक्ष करों और उपकरों का बोझ लादा जाता है. सामाजिक सुरक्षा पर होने वाले खर्चों में कटौती की जाती है. छोटी बचत योजनाओं पर दिए जाने वाले ब्याज में कमी की जाती है तथा कर्मचारियों के भविष्यनिधि पर निशाना लगाया जाता है.

14.28% की बढ़ोत्तरी क्यों कम है?
केन्द्रीय कर्मचारियों तथा राज्यों के कर्मचारियों का वेतन पुनर्निर्धारण सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों तथा बैंक, बीमा अथवा ऐसे ही अन्य संस्थानों की तरह प्रत्येक पांच वर्ष में नहीं होता है. संगठित क्षेत्र में, जहां वेतन पुनर्निर्धारण पांच वर्ष में होता है, अमूमन वेतन वृद्धि 17 से लेकर 22-23% के मध्य कहीं होती है. केन्द्रीय कर्मचारियों की संयुक्त कार्यवाही समिति ने उसी अनुसार न्यूनतम वेतन 26,000 करने की मांग की थी. इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए 2008 में यूपीए ने 40% की वेतन वृद्धि दी थी. वित्तमंत्री का यह कहना कि सिफारिशों को मंजूरी देते समय निजी क्षेत्र में दिए जा रहे वेतन से समरूपता हो, इसका खयाल रखा गया, केवल हवाई बात है. जबकि वास्तविकता यह है कि उच्च अधिकारियों के मामले में भी, जहां वेतन बढ़ोत्तरी निचले तबके के कर्मचारियों की तुलना में बेहतर है, उच्च अधिकारियों का वेतन निजी कंपनियों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों की तुलना में कुछ भी नहीं है, जो करोड़ों रुपये के पैकेज पर कार्य करते हैं.

जहां तक तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों का सवाल है, यह सर्वविदित तथ्य है कि निजी क्षेत्र सबसे बड़ा कम वेतन देने वाला निर्दयी नियोक्ता है. बल्कि सरकार ने निजी क्षेत्र के दबाव में ही आकर निचले कर्मचारियों के वेतन को कम रखा है. क्योंकि, सरकारी अथवा सार्वजनिक क्षेत्र में वेतन स्तर के ऊंचा उठने पर निजी संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों पर भी निचले स्तर के कर्मचारियों के वेतन में बढ़ोत्तरी का दबाव पड़ता है और उन्हें वेतन स्तर को उठाना पड़ता है. 18,000 रुपये पर निर्धारित इस न्यूनतम वेतन में से यदि 1.1.2004 के बाद भर्ती हुए कर्मचारियों के मामले में नई पेंशन योजना की राशि 10% की दर से कम कर दी जाए, जो आवश्यक कटौती है तो वास्तविक बढ़ोत्तरी मात्र 450 रुपये रह जायेगी और वह भी 10 वर्षों के अंतराल के बाद.

इसी तरह 1.1.2004 के पहले के कर्मचारियों के वेतन से 6% सामान्य भविष्य निधि की राशि निकाल दी जाए तो वास्तविक रूप से बढ़ोत्तरी केवल 1,170 ही रह जाती है. अभी यह भी स्पष्ट नहीं है कि सरकार उनके वर्त्तमान भत्तों के साथ क्या करने वाली है? स्वाभाविक है कि 10 वर्षों के अंतराल के बाद केवल आंकड़ों की कलाबाजी दिखाई जायेगी तो केन्द्रीय कर्मचारी असंतुष्ट और रुष्ट दोनों होंगे.

(लेखक छत्तीसगढ़ के ट्रेड यूनियन नेता रहे हैं)

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