कैसे बनता है कोई हिंसक राष्ट्रवादी?

Tuesday, March 8, 2016

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कन्हैया कुमार से मारपीट

सुनील कुमार
इन दिनों हिंदुस्तान में जेएनयू के कुछ बावले छात्र-छात्राओं की मेहरबानी से राष्ट्रवाद, राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रद्रोह पर खासी गंभीर चर्चा हो रही है. और इसे सरहद पर शहीद होने वाले सैनिकों के साथ जोड़कर देखा जा रहा है, और इस काम में वे लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं, जो अपनी पूरी जिंदगी से युद्धोन्माद के शौकीन रहे हैं, और आज भी उनका बस चले, तो खुद राजधानियों में बैठे हुए लाखों सैनिकों को एक जंग में शहादत के लिए और धकेल दें.

इस माहौल में राष्ट्रवाद को लेकर जिस तरह की दीवानगी चल रही है, वह कोई सकारात्मक दीवानगी नहीं है जैसी कि भगत सिंह की थी. यह दीवानगी अपने ही लोगों की जान लेने की है, उन लोगों की जिनका कि धर्म अलग है, जिनकी सोच अलग है, जिनका रंग अलग है, या जिनकी जाति अलग है. अपनी हर किस्म की नफरत को दूसरों के लहू से गूंथकर राष्ट्रवाद का एक लड्डू सा तैयार किया जा रहा है, और उसे इस देश को चढ़ाया जा रहा है. यह बात बहुत अजीब नहीं है, इंसानों को खासे पहले से मानवबलि देने के लिए जाना जाता है, और यह मानवबलि कभी ईश्वर को खुश करने के लिए, तो कभी किसी बुरी आत्मा की नाराजगी को टालने के लिए दी जाती है. आज हिंदुस्तान में भारतमाता को खुश करने के लिए राष्ट्रवाद उन तमाम लोगों की ऐसी बलि देने पर आमादा है जो लोग भारतमाता की उनकी सोच से परे की कुछ सोच रखते हैं, जो भारत से तो मोहब्बत करते हैं, लेकिन भारत को लेकर उनकी सोच कुछ और है, उनकी शिकायत कुछ और है, उनकी उम्मीदें कुछ और हैं. ऐसे कुछ और वाले तमाम लोगों को निपटाने को देशभक्ति मानने और मनवाने वाला यह राष्ट्रवाद अपने देश के लोगों के भले के लिए ही नहीं बना है, यह अपने देश के लोगों में फर्क करके, देशसे परे बाकी तबकों को खत्म करके, उनकी असहमति का कत्ल करके अपनी देशभक्ति साबित करने वाला राष्ट्रवाद है.

लेकिन इसके पीछे की वजहें क्या हैं? इसके बारे में सोचते-सोचते एक बात समझ आती है कि ऐसे हिंसक और हमलावर राष्ट्रवाद के झांसे में, उसकी गिरफ्त में जो लोग आते हैं, उनके साथ कुछ बुनियादी कमियां रहती हैं. मेरा ऐसा मानना है कि जिन लोगों को बचपन से अपने घर-परिवार में दकियानूसी बातें सुनने मिलती हैं, कट्टरता और नफरत की बातें सुनने मिलती हैं, वैसे बच्चे एक हिंसक राष्ट्रवाद के शिकार होने का बहुत बड़ा खतरा लेकर बड़े होते हैं. इसके अलावा दूसरी बात मुझे लगती है कि जिन बच्चों को दूसरी जाति के लोगों के साथ, दूसरे धर्म के लोगों के साथ, दूसरे प्रदेशों के लोगों के साथ पड़ोस में रहने नहीं मिलता, स्कूल में पढऩे नहीं मिलता, खेलने और घूमने नहीं मिलता, दोस्ती करने नहीं मिलता, वैसे बच्चे बड़े होकर यह खतरा अधिक झेलते हैं.

अब राष्ट्रवाद के शिकार हो जाने की वजहों में अगली वजह मुझे दिखती है लोगों में वैज्ञानिक सोच की कमी. बच्चे स्कूल और कॉलेज में विज्ञान तो पढ़ लेते हैं, लेकिन वैज्ञानिक सोच उन्हें छू भी नहीं पाती क्योंकि चारों तरफ का सामाजिक-पर्यावरणीय प्रभाव ऐसा रहता है कि वह उन्हें वैज्ञानिक सोच से परे रखने में जुटे रहता है. ऐसे में बच्चे न न्यायसंगत हो पाते, न तर्कसंगत हो पाते, और न ही विज्ञानसंगत हो पाते. वे एक बड़ा खतरा अपने आसपास के दायरे से ही विरासत में हासिल करते हैं, और इसी की विरासत अपने आसपास के दायरे को, अपनी अगली पीढ़ी को देते भी जाते हैं.

लोगों के हिंसक और हमलावर राष्ट्रवादी, युद्धोन्मादी होने के पीछे की एक और बड़ी वजह मुझे यह लगती है कि लोग अपने शहर या प्रदेश के बाहर, अपने इलाके या वैसी संस्कृति से बाहर, अपने देश से बाहर कम घूमे रहते हैं, और ऐसे में दूसरे इलाकों, दूसरी संस्कृतियों के बारे में न तो उनकी समझ विकसित हुई रहती है, और न ही उनकी सहनशीलता. दूसरे प्रदेशों, देशों, इलाकों के लोगों को जो लोग करीब से देखते हैं, वहां जाते हैं, कुछ जीते हैं कुछ सांस लेते हैं, उनकी सोच का दायरा बढ़ता है. मेरा ऐसा अंदाज है कि आज राष्ट्रवाद के हमलावर संस्करण को हाथों में लिए खूनी आंखों से असहमति को ढूंढते हुए जो लोग घूम रहे हैं, उन्होंने अपने कुएं से परे बहुत ही कम कुछ देखा है. अगर उन्होंने बाहर की दुनिया को देखा होता तो अपनी सुरंगई सोच को वे दुनिया न मान बैठते.

लेकिन आज हिंदुस्तान में राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने वालों में ऐसे बहुत से लोग जिन्होंने दुनिया को खूब देखा है, जिन्होंने मुरली मनोहर जोशी की तरह विज्ञान को पढ़ा और पढ़ाया है, जिन्होंने मुंबई के ठाकरे परिवार की तरह हिंदुस्तान के सारे प्रदेशों से आए हुए लोगों को देखा है, और बाकी दुनिया से मुंबई में आए हुए लोगों को भी देखा है. इसके बाद भी ऐसे अनगिनत लोग हैं जिन्होंने अपने से परे भी राष्ट्रवाद को खूब हिंसक बनाया है, बढ़ाया है, फैलाया है.

तो ऐसे वे कौन से लोग हैं जो कि अपने तजुर्बे के बावजूद, अपनी समझ विकसित होने की तमाम संभावनाओं के बावजूद राष्ट्रवाद के, हिंसक राष्ट्रवाद के झंडाबरदार बने हुए हैं? मेरा ख्याल है कि ये वे लोग हैं जिनको अपनी राजनीति, अपनी सामाजिक या क्षेत्रीय नेतागिरी कायम करने के लिए, और जारी रखने के लिए ऐसे राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने की जरूरत लगती है. मैं ऐसे लोगों को इतना बेवकूफ भी नहीं मानता कि वे हिंसक और आक्रामक राष्ट्रवाद के खतरे नहीं समझते. वे समझते तो हैं, लेकिन एक मुजरिम की तरह फिर भी वे इसे बढ़ावा देते हैं, जिस तरह किसी एक बुजुर्ग को एक मुजरिम ठग लेता है, यह जानते हुए कि उसके बाद उस बुजुर्ग जीना कितना मुश्किल होगा. जिस तरह एक किसी बच्ची के साथ एक मुजरिम बलात्कार करता है, अपने पल भर के मजे के लिए, यह जानते हुए कि इसके बाद उस बच्ची का जीना कितना मुश्किल होगा.

तो भारत में हिंसक राष्ट्रवाद को बढ़ाने वाले ये लोग समझदार हैं, बेवकूफ तो वे हैं जो अपनी अविकसित समझ के चलते ऐसे लोगों के झांसे में हैं, और जो असहमति को कुचलने के लिए झूठ से बनाए हुए हथौड़े और घन को कानूनी औजार मानते हैं, और सफेद झूठ के साथ हमले करते हुए जो चारों तरफ लाल लहू बिखेर देते हैं.
आज भारत में इस हिंसक राष्ट्रवाद की सुनामी फैलाने के लिए साजिश और बदनीयत के साथ जो तरीके इस्तेमाल हो रहे हैं, वे ऐसे राष्ट्रवाद के लिए दुनिया में जगह-जगह पहले भी इस्तेमाल हुए हैं. जब किसी देश-प्रदेश के लोगों को दूसरे लोगों की दहशत दिखाई जाती है, तो उन्हें उस अनदेखे दूसरे नामौजूद दुश्मन पर हमला करने के लिए एक करना आसान होता है. और ऐसे हमले के साथ-साथ अपने बीच असहमति रखने वालों को देशद्रोही, गद्दार, देश का दुश्मन करार देना एक कारगर हथियार होता है.

आज जेएनयू को कोसने के लिए, वहां के छात्र-छात्राओं को गद्दार साबित करने के लिए जेएनयू और देश की सरहद पर शहीद होते जवानों के बीच मुकाबले की एक तस्वीर गढ़ी जा रही है. ऐसा साबित करने की कोशिश हो रही है कि जेएनयू के नौजवान देश की सरहदों पर देश के जवानों को मारने का काम कर रहे हैं. इतना बड़ा, और निरमा से धुला हुआ ऐसा जगमगाता सफेद झूठ शायद लंबी जिंदगी नहीं जिएगा, क्योंकि लोग होश में आएंगे, क्योंकि ऐसी साजिशों के पीछे के हिंसक लोगों के मुकाबले किसी भी देश में साफ दिल लोग अधिक रहते हैं, और हम हिंदुस्तान में ऐसे लोगों के अधिक बोलने, अधिक खड़े होने की राह देख रहे हैं.

जिस छत्तीसगढ़ में बैठकर आज मैं यह कॉलम लिख रहा हूं, उसी छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कल जय श्रीराम के नारे लगाते हुए एक नौजवान गिरोह ने गरीबों के एक छोटे से चर्च पर हमला किया, तोडफ़ोड़ की, महिलाओं के कपड़े फाड़े, और बच्चों को फेंका. और तकरीबन उसी वक्त दूर केरल में एक कब्र में ईसाई रीति-रिवाजों से सीआरपीएफ के एक शहीद को दफन किया जा रहा था जिसने छत्तीसगढ़ के नक्सल मोर्चे पर चार दिन पहले अपनी जान दी थी. शहादत और अदावत को गिनाने के लिए जेएनयू और देश की सरहद की जरूरत नहीं है, बस्तर का नक्सल मोर्चा, और राजधानी के चर्च को लेकर भी शहादत के सम्मान और अपमान की बात हो सकती है.

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