कांग्रेस में इस्तीफों का दौर

Wednesday, June 8, 2016

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कांग्रेस मुख्यालय-दिल्ली

रायपुर | अन्वेषा गुप्ता: इन दिनों कांग्रेस पार्टी में एक के बाद एक राज्यों में इस्तीफों का दौर चल रहा है. सोमवार को छत्तीसगढ़ के कद्दावर नेता अजीत जोगी तथा महाराष्ट्र के प्रभावशाली नेता गुरुदास कामत ने पार्टी से अलग-अलग कारणों से इस्तीफा दे दिया. मंगलवार को तो त्रिपुरा में कांग्रेस के छः विधायकों ने इस्तीफा देकर तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया. इन तीनों राज्यों में नेताओं के द्वारा दिये गये इस्तीफें कांग्रेस पर दूरगामी प्रभाव छोड़ेगें इसमें शक नहीं है.

छत्तीसगढ़ में पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने नई पार्टी बना ली है. अंतागढ़ टेपकांड के खुलासे के बाद जोगी परिवार पर कांग्रेस का जो कहर टूटा उससे नाराज़ अजीत जोगी के पास और कोई दूसरा रास्ता बचा ही नहीं था. निश्चित तौर पर अजीत जोगी द्वारा हाथ का साथ छोड़कर अपना झंडा बुलंद किये जाने का 2018 के विधानसभा चुनाव में प्रभाव पड़ेगा यह अभी से तय माना जा रहा है.

महाराष्ट्र के पुराने तथा प्रभावशाली नेता गुरुदास कामत ने पी चिदंबरम को राज्यसभा की टिकट दिये जाने से ख़फ़ा होकर यह इस्तीफा दिया है. हालांकि गुरुदास कामत के इस्तीफे को अभी ‘फायनल’ कहना जल्दबाजी होगी. उन्हें मनाने के लिये कांग्रेस की ओर से कोशिशें जारी हैं. सामने मुंबई महानगर पालिका का चुनाव होना है ऐसे में गुरुदास कामत का साथ छोड़ जाना कांग्रेस के लिये धक्के से कम न होगा.

उधर, त्रिपुरा में कांग्रेस के दस में से छः विधायकों ने पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस द्वारा लेफ्ट को निर्णायक मात देने के बाद अपना पाला बदला है. जाहिर है कि उन्हें पार्टी से ज्यादा अपने राजनीतिक भविष्य की चिंता सता रही है. ममता बनर्जी ने अपना फोकस त्रिपुरा पर कर रखा है. ऐसे में भविष्य में सत्ता पाने की चाह उनके कांग्रेस छोड़ने की मुख्य वजह है. वैसे उससे एक दिन पहले कांग्रेस के एक विधायक ने फिर से माकपा का दामन थाम लिया है.

कुल मिलाकर राष्ट्रीय स्तर पर देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस से इस्तीफों का दौर शुरु हो गया है परन्तु गहराई से जाने पर इन तीनों ही राज्यों में अलग-अलग कारणों से पार्टी से इस्तीफा दिया गया है. छत्तीसगढ़ में पार्टी की बेरुखी से मजबूर होकर, महाराष्ट्र में अपना वजन दिखाने के लिये तो त्रिपुरा में बेहतर राजनीतिक भविष्य की चाह में यह किया गया है.

हाल ही में हुये विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को असम से हाथ धोना पड़ा है परन्तु उसे सत्तारूढ़ हुई भाजपा से ज्यादा मत मिला है यह कांग्रेस आलाकमान के लिये दिलासे वाली बात है.

बेशक, 2014 के लोकसभा तथा दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने करारी मात खायी है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है. इसके पीछे कारण यूपीए-2 सरकार के कार्यकाल में हुये कोल घोटाला, टू-जी घोटाला, मुंबई का आदर्श घोटाला, राष्ट्रमंडल खेल घोटाला रहा है. उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानों यूपीए-2 सरकार की उपलब्धियां भ्रष्ट्राचार के अलावा और कुछ नहीं है. लोग जल्द ही मनरेगा तथा आरटीआई कानून को भूल गये.

दूसरी तरफ महंगाई बढ़ रही थी, रोजगार के अवसर कम होते जा रहे थे (हालांकि आज भी हालत नहीं बदले हैं) ऐसे में मतदाताओं का कांग्रेस से मोहभंग होना लाज़िमी था. मतदाताओँ ने चुनावी शोर-शराबे के बीच भाजपा को अपने दुश्वारियों से निज़ात दिलाने का जिम्मा सौंपा. वैसे आज भी हालात बदले नहीं हैं. 80 रुपये किलो की दाल 200 रुपये के करीब हो गई है. जमाखोरी के कारण खाद्य पदार्थो के दाम इतने बढ़े कि यूपीए-2 के समय गाये जाने वाले गाने ‘खाना है दाल आज पहली तारीख है..’ फीका लगने लगा है.

तमाम दावों के बाद पढ़ा-लिखा युवा रोजगार की तलाश में भटक रहा है, न तो काला धन वापस अपने वतन आया और न ही उसके निकट भविष्य में आने की कोई उम्मीद दिखाई दे रही है.

उलट, देश के अल्पसंख्यकों के मन में असुरक्षा की भावना बढ़ी है. देश का युवा राष्ट्रवाद के बढ़ते ज्वार के बीच अपने लिये रोजगार का कोई अवसर नहीं देख पा रहा है. विदेशों से निवेश के लिये अनगिनत समझौतें हो रहें हैं पर उनसे कितनों को रोजगार मिल सका है यह किसी से छुपा हुआ नहीं है.

स्वीमिग पूल में तैरना तथा इंग्लिश चैनल को पार करने में फर्क होता है. इसे तब तक नहीं समझा जा सकता जब तक स्वीमिंग पूल से निकलकर इंग्लिश चैनल में गोता न लगा लिया जाये.

बात कांग्रेस से इस्तीफों की हो रही थी. देश के मौजूदा हालात ऐसे हैं कि वह जल्द ही एक राष्ट्रीय विकल्प की तलाश के लिये लोगों को फिर से मजबूर कर देगी. उस समय कौन से पार्टी की नीतियां उसे उसकी दुश्वारियों से निज़ात दिलाती दिखेगी जनता उसे ही वोट देगी. कांग्रेस की मर्सिया पढ़ने की जल्दबाजी में यह नहीं भूलना चाहिये कि चुनाव के समय जनता को सपने दिखाना, बेचना तथा बाद में उसे हकीकत में तब्दील करनें में बड़ा अंतर है.

कांग्रेस में चल रहें इस्तीफों के दौर के बाद भी उसका मर्सिया पढ़ने का दौर अभी नहीं आया है.

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