विविधता को स्वीकारे: भागवत

Friday, May 13, 2016

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मोहन भागवत-सरसंघचालक

उज्जैन | समाचार डेस्क: संघ प्रमुख भागवत ने कहा विविधिता को स्वीकार करने की जरूरत है. देश में ‘भारत माता की जय’ और सहिष्णुता को लेकर चल रही बहस के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने देश की विविधता का जिक्र किया और कहा कि विविधता में सिर्फ सहिष्णुता की नहीं, बल्कि उसे स्वीकार करने के साथ सम्मानित करने की जरूरत है. मध्यप्रदेश के उज्जैन में चल रहे सिंहस्थ कुंभ के दौरान निनौरा में आयोजित तीन दिवसीय ‘अंतर्राष्ट्रीय विचार कुंभ’ का उद्घाटन करते हुए गुरुवार को आरएसएस प्रमुख ने कहा कि विकास करते समय प्रत्येक देश की प्रकृति का विचार करना चाहिए. ऐसा ही परिवर्तन दुनिया की वैचारिकता में दिखाई दे रहा है.

उन्होंने कहा कि विविधता को स्वीकार किया जा रहा है और दुनिया कहने लगी है कि विविधता को अलंकार के रूप में देखना चाहिए, दोष के रूप में नहीं. अब तो यह भी कहा जाने लगा है कि विविधता को स्वीकार कर सम्मानित करना चाहिए, सिर्फ सहिष्णुता नहीं, उससे भी आगे जाना है.

भागवत ने कहा कि अस्तित्व के लिए संघर्ष के बजाय अब समन्वय की ओर जाना पड़ेगा, धीरे-धीरे सभी लोग यह मानने लगे हैं. व्यवस्था समतायुक्त और शोषणमुक्त होनी चाहिए. जब तक सभी को सुख प्राप्त नहीं होता, तब तक शाश्वत सुख दिवास्वप्न है.

उन्होंने आगे कहा, “यहां जन्म लेने वालों की दो माताएं हैं. एक जन्म देने वाली और दूसरी भारत माता. हमारी एक जन्मदात्री माता है जो सब को समझ में आती है, मगर मैंने प्राथमिक कक्षा में एक किताब मराठी में पढ़ी, जिसका अध्याय ‘दो माताएं’ था. इस अध्याय में कहा गया है कि जैसी आपकी एक जन्म देने वाली माता है, वैसी ही एक भारत माता है, जो आपकी मातृभूमि है. जन्म देने वाली माता के कारण शरीर मिला, मातृभूमि के कारण संस्कार मिला. पोषण तो मिला ही.”

भागवत ने कहा कि भारत की परंपरा के अनुसार, सारे जीव सृष्टि की संतानें हैं. मनुष्यता का संस्कार देने वाली सृष्टि है. मध्यप्रदेश में कुंभ की वैचारिक परंपरा को पुनर्जीवित किया जा रहा है. आज दुनियाभर के चिंतक, विचारक एक हो गए हैं.

उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा कहा गया है कि सनातन परंपरा में इन सत्यों की बहुत पहले से जानकारी है. आज के परिप्रेक्ष्य में हमें सनातन मूल्यों के प्रकाश में विज्ञान के साथ जाना होगा. यह करके विश्व की नई रचना कैसी हो, इसका मॉडल अपने देश के जीवन में देना होगा.

जूना पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि ने कहा कि अगली सदी भारत की सदी है, क्योंकि जब पश्चिम की उपभोक्तावादी संस्कृति थक जाएगी, तब भारत के आध्यात्मिक नेतृत्व की जरूरत होगी. भारत की भूमि से ही आध्यात्मिक मार्ग निकलेगा, जो विश्व का मार्गदर्शन करेगा.

गायत्री परिवार के प्रमुख डॉ. प्रणव पंडया ने कहा कि वैज्ञानिक अध्यात्मवाद को अपनाने का समय आ गया है. उन्होंने विचार कुंभ को जनता की संसद बताते हुए कहा कि यही संसद समस्याओं का समाधान निकालने का उचित मंच है.

डॉ. पंडया ने कहा कि संतों के साथ बैठकर संवाद करने और समस्याओं का निराकरण करने की परंपरा को मुख्यमंत्री ने आगे बढ़ाया है. संस्कृति और विद्या का सम्मिलन जरूरी है. भारत का भविष्य उज्ज्वल है. जल्द ही भारत विश्व का नेतृत्व करेगा.

उन्होंने कहा कि वर्ष 2016 से 2026 तक भारत के उत्कर्ष का समय है. उन्होंने आव्हान किया कि सकारात्मकता को अपने भीतर पनपने दें और नकारात्मकता को तत्काल छोड़ें.

बौद्ध धर्म के प्रतिनिधि उपतिस्स नायक थेरो ने बताया कि विचार महाकुंभ के समापन में श्रीलंका के राष्ट्रप्रति उपस्थित रहेंगे. उन्होंने कहा कि उज्जैन और सांची हमेशा से उनकी स्मृति में रहे हैं. सम्राट अशोक के पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा उज्जैन से शांति का संदेश लेकर श्रीलंका गए थे. भगवान बुद्ध के पंचशील सिद्धांत में अच्छा जीवन जीने का मार्ग गहन रूप से समझाया गया है.

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने अपने स्वागत भाषण में विचार महाकुंभ आयोजित करने के उद्देश्य की चर्चा करते हुए बताया कि कुंभ का संबंध ही विचार-मंथन से है.

कार्यक्रम का संचालन आयोजन समिति के अध्यक्ष एवं सांसद अनिल माधव दवे ने किया और आयोजन की रूपरेखा बताई. संस्कृति राज्य मंत्री सुरेंद्र पटवा ने अतिथियों को स्मृति-चिह्न् भेंट किए.

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