महिला आयोग की याचिका खारिज

Monday, December 21, 2015

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भारतीय सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली | समाचार डेस्क: निर्भया मामले के दोषी ‘किशोर’ की रिहाई पर रोक लगाने से संबंधित याचिका खारिज हो गई है. सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय राजधानी में 16 दिसम्बर को हुए सामूहिक दुष्कर्म मामले के दोषी ‘किशोर’ की रिहाई पर रोक लगाने से संबंधित दिल्ली महिला आयोग की याचिका सोमवार को यह कहते हुए खारिज कर दी कि दोषी को कानून के तहत किशोर सुधार गृह में तीन साल से अधिक समय तक नहीं रखा जा सकता. वहीं, पीड़िता के परिवार का कहना है कि वे न्याय के लिए अपनी लड़ाई जारी रखेंगे.

न्यायमूर्ति ए.के. गोयल और न्यायमूर्ति यू.यू. ललित की अवकाश पीठ ने दिल्ली महिला आयोग की याचिका खारिज करते हुए कहा, “हम आपकी चिंता समझते हैं. लेकिन सबकुछ कानून के अनुरूप ही होगा, हमें कानून लाना होगा.”

अदालत ने दिल्ली महिला आयोग से कहा, “हमें एक स्पष्ट कानून की आवश्यकता है और मौजूदा कानूनों के अनुरूप वह दोषी को और अधिक समय तक हिरासत में रखने का अनुरोध नहीं कर सकती, जो अब 20 साल का है.”

इससे पहले दिल्ली महिला आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गुरु कृष्ण कुमार ने कहा, “किशोर न्याय (बाल देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2000 के प्रावधानों को फिर से तय करने की जरूरत है, जो समाज के हित में है.”

इसके बाद न्यायालय ने कहा कि जिस कानून का आप हवाला दे रहे हैं, उसमें कौन सा प्रावधान उसकी तीन साल की सजा को आगे बढ़ाने की बात कहता है.

न्यायालय ने यह भी कहा, “किशोर न्याय अधिनियम किसी भी हालत में किशोर अपराधियों की अधिकतम सजा तीन साल से अधिक बढ़ाने की बात नहीं कहता है. आखिर ऐसा कौन सा कानून है, जो निर्धारित समय से अधिक किशोर अपराधी के लिए सजा का प्रावधान करता है.”

दिल्ली महिला आयोग के वकील ने यह भी कहा कि दोषी की मानसिकता में सुधार नहीं हुआ है और खुफिया ब्यूरो की रिपोर्ट उसके कट्टरपंथ की ओर रुख के बारे में भी बताती है, इसलिए उसे तब तक रिहा नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि उसमें सुधार की बात सुनिश्चित नहीं हो जाती. उन्होंने यह भी कहा कि विशेष परिस्थितियों में किशोर अपराधियों को विशेष गृह में नजरबंद रखने का प्रावधान है.

इस पर न्यायालय ने कहा कि किशोर अपराधी को तीन साल की अवधि के दौरान रखने के स्थानों में परिवर्तन हो सकता है, लेकिन इसकी अवधि में बदलाव नहीं किया जा सकता.

अधिवक्ता ने अदालत से यह भी अनुरोध किया कि किशोर अपराधी की मानसिक स्थिति का आकलन एक स्वतंत्र निकाय द्वारा किया जाए, जो अपनी रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय को दे और उसके आधार पर ही कोई फैसला लिया जाए.

इस बीच, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल पिंकी आनंद ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार ऐसे कानून के पक्ष में है, जो समाज के हित में हो.

इस पर अदालत ने नाराजगी जताते हुए यह भी कहा कि आखिर इसमें कितना वक्त लगेगा.

इस पर आनंद ने अदालत को बताया कि काम चल रहा है. उनका इशारा किशोर न्याय (बाल देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2000 में संशोधन की ओर था, जो जघन्य अपराधों में संलिप्त किशोरों के लिए आपराधिक अदालतों में मुकदमे का प्रावधान करता है.

यह संशोधन विधेयक लोकसभा से सात मई, 2015 को ही मंजूर हो चुका है और फिलहाल राज्यसभा में लंबित है.

वहीं, दुष्कर्म पीड़िता की मां ने सोमवार को न्यायालय के आदेश पर असंतोष जताते हुए कहा कि इस तरह के फैसले समाज में महिलाओं के खिलाफ अपराधों को बढ़ावा देंगे.

उन्होंने कहा, “मैं सिर्फ यही कहना चाहूंगी कि तीनों अदालतों द्वारा खारिज की गई याचिका समाज में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों को बढ़ावा देगी.”

उन्होंने कहा, “किशोरों को सजा देने का कोई प्रावधान नहीं है. वे (अदालतें) आरोपी के लिए अधिक चिंतित दिखती हैं. महिलाओं के साथ धोखा होता आया है और आगे भी होता रहेगा. कोई भी महिलाओं की सुरक्षा के लिए कुछ नहीं करना चाहता.”

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