कैद में है बुलबुल

Sunday, August 4, 2013

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कैदी

कनक तिवारी

लोकतंत्र और राजनीति में कई बार षड़यंत्र, परिस्थितियों और अनिर्णय का घालमेल होता है. उनका शिकार व्यक्ति अपने महत्वपूर्ण सियासी कद के बावजूद किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है. समकालीन वक्त उससे संघर्ष, विद्रोह और बगावत की उम्मीद करता है. लेकिन वह सही वक्त की तलाश या वक्त की चोट के कारण खामोश रहने पर मजबूर होता है.

ऐसे दुर्लभ संयोगों के कारण भविष्य की दिशा बदल भी जाती है. सिद्ध यही होता है कि महामानव लगते किसी मनुष्य में अपरिमित शक्तियां भले ही हों, यह तो समय है जो विपरीत होने पर अच्छे अच्छे का मटियामेट कर देता है. बी. आर. चोपड़ा निर्देशित महाभारत कथा का सीरियल ‘समय‘ नाम के सूत्रधार को इस तरह उद्धरित करता है मानो पांडव पक्ष के महानायक और स्वयं श्रीकृष्ण भी उसके हाथों की कठपुतलियां बनने से खुद को रोक नहीं सकते.

इस मुहावरे का त्रासद शिकार महाभारत का नायक अर्जुन हुआ. कृष्ण का पांचजन्य शंख और खुद का गांडीव खोने के बावजूद अर्जुन में कैदी बुलबुल की नपुंसकता की भूमिका ढूंढ़ ली थी. यह तो यादवकुल शिरोमणि ने किसी तरह बुलबुल को कैद से मुक्त किया.

कई बार दिलचस्प होता है कि वक्त की फितरत में गांठ लगाने का काम उस जमाने का कोई एक्स्ट्रा कलाकार करता है. उसका दुष्परिणाम फिल्मी नायकों और चरित्र अभिनेताओं को भोगना पड़ता है. भारतीय वांग्ड़मय की सबसे महान कथा रामायण में कूटनीति का विजयी दांव मंथरा ने चला था. उसने राजरानी कैकेयी को अपनी सलाह की गिरफ्त में ले लिया था. महाराज दशरथ की हालत बंशी में फंसी मछली की तरह हो गई थी. वे अपने राजधर्म में पारंगत होने के बावजूद दुरभिसंधि के जाल में फंसकर तड़पते चले गए.

उनके पुत्र भरत की भी वही हालत थी. वे समझ नहीं पाए कि राजधर्म और भ्रातृधर्म में किसका पालन किया जाए. राम की चरण पादुकाएं एक तरह से मछली वाला जाल ही तो बन गईं.

किस्सा भले हो लेकिन महान मुगल सम्राट अकबर के जीवन में भी अनिर्णय के ऐसे ही क्षण आए थे. तब शायद उसने ऐसा ही फिल्मी डायलॉग बोला होगा-‘सलीम तुझे मरने नहीं देगा, और हम अनारकली तुझे जीने नहीं देंगे.’ दुनिया को भारत की ओर से सात आश्चर्यों में ताजमहल जैसा अजूबा देने वाले शाहजहां आगरे के किले में भौतिक रूप से कैदखाने वाली बुलबुल बना दिए गए थे. उन्हें गुलामी और आत्महत्या में से एक विकल्प चुनने के लिए मजबूर किया गया था.

ताज़ा राजनीति में सदैव सच्चा कटाक्ष करने वाले लोहिया ने भारत पाक विभाजन के संदर्भ में गांधी को भी इसी स्थिति में पाया था. यह सरदार पटेल थे जिनसे गांधी ने एक बंद कमरे में दो ढाई घंटे गोपनीय गुफ्तगू की थी. उसके बाद न जाने क्यों गांधी में बकौल लोहिया एक तरह का क्लैव्य आ गया था. यदि वे चाहते तो सरदार की राय को अनशन या असहयोग के जरिए खारिज भी कर सकते थे.

पाकिस्तान निर्माण को लेकर आखिर यह कहावत सिद्ध हुई. नेहरू को भी कृष्ण मेनन और टी. टी. कृष्णमाचारी की मंत्रिमंडल से छोड़छुट्टी तथा राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को दुबारा कार्यकाल देने का विरोध करते हुए इसी कहावत का शिकार होना पड़ा. भिलाई इस्पात कारखाना अंतिम क्षणों में प्रधानमंत्री नेहरू और किसी प्रदेश में ले जाना चाहते थे. यह तो मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल की ज़िद थी जिसके कारण यह गौरवपूर्ण संयंत्र भिलाई में ही आया. राजनीतिक परिस्थितियों ने प्रधानमंत्री को भी इसी कहावत के अनुसार मुख्यमंत्री के सामने झुकने पर मजबूर किया.

तब के मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल अपनी कुर्सी बचा सकते थे. लेकिन उनके पांच कथित भ्रष्टाचार के आरोपी मंत्रिमंडलीय सहयोगियों ने ऐसा दबाव बनाया कि शुक्ल को इंदिरा गांधी का कोपभाजन बनना पड़ा. वे वर्षों तक सत्ता से बाहर रहे.

कोई मानेगा कि छत्तीसगढ़ निर्माण के बाद अविभाजित मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने स्वेच्छा से अजीत जोगी को छत्तीसगढ़ का संस्थापक मुख्यमंत्री स्वीकार किया होगा. खुद कांग्रेसियों के एक बड़े वर्ग ने फॉर्म हाउस में दिग्विजय का सम्मान समारोह आयोजित तो किया ही था. लेकिन दस जनपथ ही राजपथ का गोमुख है. यह हर कांग्रेसी को मालूम है.

1980 में अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री के चुनाव में कांग्रेसी विधायकों की रायशुमारी में आदिवासी नेता शिवभानु सोलंकी से ड्योढ़े मतों से हारे थे. सोलंकी के संरक्षक विद्याचरण शुक्ल को पराजय का घूंट पीना पड़ा. इंदिरा गांधी ने अल्प मत प्राप्त अर्जुन सिंह को ही मुख्यमंत्री बनाने का फरमान जारी कर दिया.

इलाहाबाद हाईकोर्ट में राजनारायण की चुनावी याचिका में खिलाफ फैसला आने के बाद इंदिरा गांधी ने कानूनदां सलाहकारों के कारण ही आपातकाल लगाया था. वे सलाहकारों की मंडली से घिर गईं थीं. लोहिया ने मृत्यु पूर्व लगभग विक्षिप्त अवस्था में यही बुदबुदाया था-‘रजिया को सिपहसालारों ने मारा.‘

लोहिया का कोई नार्को टेस्ट नहीं हुआ था जिसके आधार पर किसी सरकार को भंग करने की राजनीतिक मांग की जाती. आपातकाल के दौरान देश का सुप्रीम कोर्ट और मीडिया भी ऐसी ही हालत में थे जब अभिव्यक्ति की आज़ादी के व्याख्याकार और पैरोकार होने के बावजूद उन्हें छुटभैये राजनीतिज्ञों को तरजीह देनी पड़ती थी.

बाबरी मस्जिद विध्वंस को लेकर प्रधानमंत्री नरसिंह राव को प्रतिक्षण जानकारी मिल रही थी. लेकिन उन्होंने साहस, निर्णय और विवेक के अभाव में वह भूमिका अदा नहीं की जो इतिहास दुनिया की सबसे बड़ी ज़म्हूरियत के प्रधानमंत्री से उम्मीद करता रहा. राव दक्षिणपंथी मीडिया सलाहकारों, राजनेताओं और नौकरशाहों की गिरफ्त में थे. अटल बिहारी वाजपेयी ने कह भले दिया हो लेकिन नरेन्द्र मोदी ने जब राजधर्म का पालन नहीं किया तो वे अपने संघ परिवारीय संगठन में लाचारी की भूमिका में ही नज़र आए.

भाजपा के सबसे वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने जिन्ना के संबंध में जो कुछ कहा या लिखा है-वह उनकी धर्मनिरपेक्ष समझ का प्रमाण है. लेकिन तब से अब तक संघ परिवार ने उनकी मुश्कें इतनी मजबूती से बांध रखी हैं कि जिन नरेन्द्र मोदी को उन्होंने वाजपेयी के फतवे से बचाया, वे ही अब आडवाणी के लिए सैयाद की भूमिका में हैं.

उत्तरप्रदेश में पुत्र अखिलेश के मुख्यमंत्रित्व में लगभग गुंडाराज ही स्थापित हो गया है. उसमें यादव कुल का लगातार बड़ा योगदान है. इसके बावजूद सपा के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव यथा नाम तथा गुण बने हुए हैं.

यह भी पहली बार हुआ है जब अजीत जोगी की राजनीतिक सलाह, समझाइश और असहमति को उच्च कमान द्वारा सरसरी तौर पर दरकिनार कर दिया गया है. कभी पस्तहिम्मत, पराजित या निराश नहीं होने वाले इस राजनेता को एक नौजवान उपाध्यक्ष से दो चार होना पड़ा है. यह भी एक नई मानसिक स्थिति है, जो इस लेख के शीर्षक वाले मुहावरे को भविष्यमूलक भाषा में समझने को बेताब है.

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