क्रिस्पर: अच्छा या शैतानी विज्ञान

Thursday, March 24, 2016

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क्रिस्पर

प्रबीर पुरकायस्थ
जीन में कतर-ब्योंत या संशोधन की तीन साल पुरानी प्रौद्योगिकी, सीआरआइएसपीआर (क्रिस्पर) को लेकर इस समय दो बड़े विवाद छिड़े हुए हैं. पहला विवाद तो इसी पर है कि इस खोज के लिए नोबेल पुरस्कार किसे (या किस टीम को) मिलेगा. दूसरा विवाद, इस खोज से निकलने वाले पेटेंट अधिकारों का है. पहले का संबंध विज्ञान के क्षेत्र में सर्वोच्च मन्यता से है, अपने आप में संबंधित खोज से नहीं बल्कि उस खोज से मिलने वाली सार्वजनिक ख्याति से है. दूसरे का संबंध जाहिर है कि अरबों डालर की उस संभावित कमाई से है, जो इस प्रौद्योगिकी पर एकाधिकार से, इस पर पेटेंट अधिकार धारकों को मिलने जा रही है.

प्रगति विज्ञान की या कमाई की
क्रिस्पर संक्षिप्त रूप है, क्लस्टर्ड रेगुलरलीइंटरस्पेस्ड शॉर्ट पेलिंड्रोमिक रिपीट्स का. ये डीएनए के ऐसे हिस्से हैं जो वाइरस संक्रमण के खिलाफ माइक्रोबों में विकसित हुई प्राचीन रोग-प्रतिरोध प्रणाली का हिस्सा हुआ करते थे. क्रिस्पर/सेस-9 जीन संशोधन प्रौद्योगिकी इस प्रणाली के ज्ञान पर आधारित है और इससे वैज्ञानिकों व प्रौद्योगिकीविदों के लिए उस चीज को विकसित करना संभव हुआ है जिसे पत्रिका वायर्ड की सारा झांग ने ‘डीएनए को बारीकी से कतरने के लिए मोलीक्यूलर कैंची’ का नाम दिया है. इसकी सहायता से रोगों से लडऩे की, हमारे शरीर के अवांछित या विकृत जीनों की मरम्मत करने की, अपेक्षाकृत गरम ग्रह पर खाने की चीजें पैदा करने की संभावनाओं के और इसके साथ ही साथ डिजाइनर बच्चे पैदा करने तथा विज्ञान के अनियंत्रित हो जाने से जुड़े तमाम खतरों के भी दरवाजे खुलते हैं. ऐसा लगता है कि इसके साथ ही जैनेटिक इंजीनियरिंग के क्षेत्र में वैसे ही जादू का पिटारा खुल गया है, जैसा एक सदी पहले भौतिकी के क्षेत्र में खुला था. तब आइंस्टीन द्वारा प्रस्तुत एक सरल से समीकरण–ई=एमसी2 ने न सिर्फ हमारे लिए अपने गिर्द की दुनिया की बेहतर समझ का रास्ता बनाया था बल्कि नाभिकीय बम जैसी शैतानी ताकत का भी रास्ता खोला था. प्रकृति का समझने तथा उस पर नियंत्रण में प्रगति, दुर्भाग्य से एक द्वंद्वात्मक एकता का हिस्सा होती है. विज्ञान में अच्छे और बुरे नतीजों को, आगे बढ़ाए जाने लायक कल्याणकारी विज्ञान और प्रतिबंध लगाने लायक शैतानी विज्ञान के रूप में एक-दूसरे से अलगाया नहीं जा सकता है.

क्रिस्पर प्रकरण सिर्फ विज्ञान के क्षेत्र में नये ज्ञान तथा उससे निकलने वाली प्रौद्योगिकी का ही किस्सा नहीं है बल्कि इसका भी किस्सा है कि आज की दुनिया में विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी किस तरह काम करते हैं. नोबेल पुरस्कार के लिए होड़ बेशक, अकादमिक दुनिया में प्रतिष्ठा की और विजेताओं तथा उनके संस्थानों के हाथों में सत्ता के लिए होड़ है. कहने की जरूरत नहीं है कि संबंधित प्रौद्योगिकी के पेटेंट से, पेटेंटधारकों को तथा उनकी संस्थाओं को अरबों डालर की कमाई होने जा रही है. आखिरकार, क्रिस्पर/सेस-9 की कैंचियों का, अपने काम के प्लेटफार्म के तौर पर अनेकानेक प्रौद्योगिकियों में उपयोग किया जा रहा होगा.

एकाधिकार के खेल
बहरहाल, इस सब में छुपा एक कहीं गहरा सवाल यह भी है कि क्या विज्ञान के लिए, एक मनमाने तरीके से तय की गयी विजय रेखा को पहले किसने छुआ, इतना महत्वपूर्ण होना चाहिए? या फिर ऐसी गहरी खोजों का, जो ज्यादातर सार्वजनिक धन से संचालित होती हैं, संस्थाओं या खोजकर्ताओं द्वारा इस तरह निजीकरण होने दिया जाना चाहिए कि वे जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नयी इजारेदारियां पैदा करने का साधन बन जाएं? इस सब का किसानों पर क्या असर पड़ेगा, जिन्हें इस तरह के बीज की बहुत भारी जरूरत हो सकती है? उन असहाय मरीजों का क्या होगा, जिनके लिए यह नयी प्रौद्योगिकी एकमात्र उम्मीद हो सकती है, जिसका खर्च पूरा करना उनके बूते से ही बाहर हो. उन गरीब देशों का क्या होगा, जिनकी जनता के पास इन उत्पादों को हासिल करने की आर्थिक सामथ्र्य ही नहीं हो?

क्रिस्पर/सेस-9 एक ऐसे क्षेत्र में चौथाई सदी के शोध पर आधारित है, जिसे शोध के अग्रिम मोर्चे पर नहीं समझा जा रहा था. फ्रांसिस्को मोजिका नाम के एक स्पेनी शोधकर्ता ने 1993 में अतिसूक्ष्म जीवाणुओं (माइक्रोब) के डीएनए में पुनरावृत्ति अनुक्रमों की मौजूदगी दर्ज की थी. इस आधार पर उन्होंने यह परिकल्पना पेश की थी कि यह विभिन्न संक्रमणों के खिलाफ माइक्रोब की रोग-प्रतिरोधक प्रतिक्रिया का हिस्सा हो सकता है. सच तो यह है कि उसके शोध परिपत्र को और इसी क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से ऐसे ही निष्कर्ष पर पहुंचे दूसरे शोधकर्ताओं के आलेखों को भी, शुरू में तो इस क्षेत्र के सबसे प्रतिष्ठिïत प्रकाशनों ने ठुकरा ही दिया था. आगे चलकर ही वैज्ञानिक समुदायों में इन निष्कर्षों को स्वीकृति हासिल हुई.

बेशक, इसकी मान्यता कि क्रिस्पर की बैक्टीरिया की रोग-प्रतिरोधक प्रणाली में भूमिका होती है और इसका इस्तेमाल कर डीएनए के किसी हिस्से के काटे जाने तथा उसकी जगह दूसरा हिस्सा जोड़े जाने का रास्ता बनने के बीच भी, अंतराल था. इस प्रगति के लिए यह समझना जरूरी था कि माइक्रोब में रोग-प्रतिरोधक प्रणाली किस तरह काम करती है. यह समझ इस शोध के आधार पर बनी कि वास्तव में डीएनए के जिन हिस्सों को काटा जा रहा है, वास्तव में वाइरस से जुड़े डीएनए अनुक्रम हैं और माइक्रोब क्रिस्पर प्रणाली का सहारा लेकर, अपने ही डीएनए अनुक्रम की मरम्मत करने में समर्थ होते हैं. बेशक, यहां से इस समझ तक पहुंचने के लिए थोड़ी ही दूरी तय करने की जरूरत थी कि क्रिस्पर/सेस-9 का इस्तेमाल कर, डीएनए को काटा जा सकता है और उसकी जगह पर वांछित डीएनए अनुक्रम को लगाया जा सकता है. जाहिर है कि नोबेल और पेटेंट अधिकार की समूची होड़, इसी एक सवाल पर टिकी हुई है कि उक्त आखिरी छोटा कदम, किस ने पहले उठाया?

सामूहिक प्रयास से होती है वैज्ञानिक प्रगति
किसी भी उल्लेखनीय वैज्ञानिक प्रगति के मामले में, समांतर शोध चल रहे होते हैं और उसी तरह के आधारों पर अन्यत्र भी काम चल रहा होता है. वास्तव में हॉलीवुड की फिल्मों को छोड़ दिया जाए तो यह बहुत-बहुत दुर्लभ है कि किसी दूर-दूराज की प्रयोगशाला में बैठा कोई अकेला शोधकर्ता, कोई पूरी तरह से नयी खोज कर डाले. विज्ञान में महत्वपूर्ण प्रगति, कमोबेश सामूहिक प्रयास का ही नतीजा होती है, जिसके लिए शोधार्थियों की कई-कई टीमों की, महंगे प्रौद्योगिकी प्लेटफार्मों तथा उपकरणों की और इस क्षेत्र में दूसरे क्या कर रहे हैं, इसके ज्ञान की जरूरत होती है. क्रिस्पर का भी ऐसा ही किस्सा था और दुनिया भर में कितने ही शोधार्थी, अनेक प्रयोगशालाओं में इसी गुत्थी को सुलझाने के लिए काम कर रहे थे. इसमें से शोध का कुछ काम अमरीका में, योरप में, जापान में तथा कोरिया में हो रहा था. इसी ज्ञान के योगफल के रूप में नयी जमीन तोडऩा संभव हुआ और जीन में कतर-ब्योंत तथा संशोधन का एक कारगर औजार विकसित किया जा सका.

इस समय नोबेल तथा पेटेंट अधिकार के लिए दावे की लड़ाई वैज्ञानिकों के दो समूहों के बीच हो रही है. इनमें एक बर्कले में जेनीफर दाउदना तथा अब मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट के कार्पेंटियर की टीम है और दूसरी टीम का नेतृत्व एमआइटी के साथ ब्रॉड इंस्टीट्यूट की साझेदारी में, फेंग झांग कर रहे हैं. हालांकि, दाउदना तथा कार्पेंटियर ने पेटेंट के लिए पहले अर्जी डाली थी, क्रिस्पर/सेस-9 पर पेटेंट अधिकार पहले ब्रॉड इंस्टीट्यूट के फेंग झांग को ही मिला था. इसी प्रकार, नोबेल पुरस्कार की लड़ाई को इस पुरस्कार से जुड़ी इस व्यवस्था ने और तीखा बना दिया है कि यह पुरस्कार, साझे रूप से से ज्यादा से ज्यादा तीन लोगों को दिया जा सकता है. वास्तव में नोबेल चयन समिति के काम को इस तथ्य ने और मुश्किल बना दिया है कि दूसरे भी अनेक वैज्ञानिक हैं जिन्होंने दाउदना, कार्पेंटियर या झांग से पहले, इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण नयी प्रगति हासिल कर के दिखायी थी.

इस तरह की युगपरिवर्तनकारी खोजों का श्रेय किसे मिलता है, इसे लेकर लड़ाई इस से भी जुड़ी हुई है कि क्या पहले सार्वजनिक जानकारी में आता है और क्या पहले प्रकाशित होता है. मिसाल के तौर पर स्पेनी वैज्ञानिक मोजिका के शोध परिपत्र प्रकाशित नहीं हुए थे, जबकि कुछ अन्य के प्रकाशित हो गए थे. सचाई यह कि वैज्ञानिक प्रकाशन तथा सह-वैज्ञानिकों द्वारा समीक्षा की दुनिया, बड़ी गहराई तक पुराने संबंधों के तंत्र के पक्ष में झुकी रहती है और बहुत हद तक इससे प्रभावित होती है कि कौन, किस लैबोरेटरी के लिए शोध कर रहा है. महत्वपूर्ण शोध के रूप में क्या प्रकाशित होता है, यह शोधकर्ता के संपर्क सूत्रों पर निर्भर करता है. वास्तव में सिर्फ स्पेनी वैज्ञानिक को ही अपने शोध को प्रकाशित कराने में मुश्किल का सामना नहीं कर करना पड़ा था, दो लिथुआनियाई वैज्ञानिकों, गेइद्रियस गेसिउनास तथा वजीनिअस सिक्सनीस को इसमें मुश्किल का सामना करना पड़ा था. लिथुआनियाई वैज्ञानिकों ने अपने शोध परिपत्र प्रकाशन के लिए, स्विजरलैंड के मार्टिन जिनेक के ऐसे ही परिपत्र से पहले दिए थे, लेकिन छपे बाद में.

नयी खोज का महत्व
क्रिस्पर को इतनी महत्वपूर्ण नयी प्रगति क्यों माना जा रहा है? आखिरकार, जैनेटिक इंजीनियरिंग तो पहले से भी हो ही रही थी. इस सवाल का जवाब, अब तक जिस तरह जैनेटिक इंजीनियरिंग हो रही थी और अब क्रिस्पर की मदद से जो संभव है, उनके अंतर में निहित है. अब तक जिस प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया जा रहा था, शॉटगन पद्धति जैसी थी. इस पद्धति में लक्ष्य कोशिका पर, वांछित डीएनए अनुक्रम को एक तरह से दागा जाता था. इस पद्धति में वांछित डीएनए अनुक्रम को कामयाबी के साथ रोप तो दिया जाता था, लेकिन यह सुनिश्चित नहीं किया जा सकता था कि यह डीएनए अनुक्रम वहीं जुड़े, जहां उसे रोपा जाना हो. इस तरह के जीन उपचार में विकृत जीवन वाले मरीज को उस पहचानी गयी समस्या से तो मुक्ति मिल जाती थी, लेकिन बहुत बार आगे चलकर कैंसर पैदा हो जाता था क्योंकि इस तरह रोपा गया डीएनए अनुक्रम गलत जगह पर रोप दिया गया होता था.

इसके विपरीत, क्रिस्पर की मदद से अब यह संभव है कि विकृत जीवन अनुक्रम को काटकर निकाल दिया जाए और ठीक उसी जगह पर, वांछित डीएनए अनुक्रम को रोप दिया जाए. सीधे-साधे शब्दों में इसका अर्थ है, जैनेटिक इंजीनियरिंग के अवांछित प्रभावों से काफी हद तक मुक्ति.

बेशक, प्रकृति के साथ छेड़-छाड़ के अपने ही दुष्परिणाम हो सकते हैं. प्रयोगशालाओं या कंपनियों की ओर से ऐसी जैनेटिक इंजीनियरिंग की भी पेशकश की जा सकती है, जो या तो फर्जी हो या फिर सीधे-सीधे खतरनाक. सवाल यह है कि हमारा समाज ऐसे खतरों से किस तरह से अपनी हिफाजत कर सकता है? एक समाज के रूप में हमारे सामने और बड़ा सवाल यह है कि हम ऐसी प्रौद्योगिकियों को कैसे संभालेंगे, जिनमें जबर्दस्त संभावनाएं भी हैं और जिनके साथ भारी खतरे भी जुड़े हुए हैं.

जैनेटिक इंजीनियरिंग की बहस का भूदृश्य बदला
क्रिस्पर ने जैनेटिक इंजीनियरिंग की बहस भूदृश्य को ही बदलकर रख दिया है. इसके साथ जबर्दस्त फायदे आ रहे हैं, तो इसके साथ बहुत भारी खतरे भी जुड़े हुए हैं. इसके बाद, जैनेटिक इंजीनियरिंग मात्र का विरोध करने वालों की दलील पिट जाएगी. मिसाल के तौर पर कोई लोगों को यह कैसे समझा सकता है कि उपचार के साधन उपलब्ध हैं, पर आपके रोग का उपचार नहीं होगा? याद रहे कि अमरीका में गर्भपातविरोधी आंदोलन स्टेम सैल शोध पर पाबंदी लगवाने में भले कामयाब रहे हों, स्टेम सैल पर आधारित जैनेनिट इंजीनियरिंग का विकास तो नहीं रोका जा सका है. भिन्न प्रजातियों के बीच डीएनए के मिश्रण के तो फिर भी गंभीर अकल्पित परिणाम हो सकते हैं, एक ही प्रजाति के दायरे में जैनेटिक इंजीनियरिंग को–जो चयनधर्मी ब्रीडिंग से जो हासिल किया जा सकता है, उसे और बढ़ाने जैसा ही है–रोकना मुश्किल होगा. हमें जैनेटिक इंजीनियरिंग के सभी रूपों का आंख मूंदकर विरोध करने के बजाए, इस पर विचार करना होगा कि सुरक्षा के लिए किन चीजों को नियंत्रित करने की जरूरत है, हमारे ज्ञान के मौजूदा स्तर को देखते हुए क्या प्रतिबंधित किया जाना चाहिए तथा किस के लिए इजाजत दी जा सकती है?

आखिरी बात यह कि जो लोग यह दलील देते हैं कि बाजार ही सब सही कर देगा, उनके लिए यह नयी प्रगति इसका एक और प्रमाण है कि बाजार सब सही नहीं कर सकता है. यह ऐसी प्रौद्योगिकी का मामला है, जो खतरनाक है और भविष्य में ऐसी हानि कर सकती है, जिसके अभी कोई आसार तक नहीं दिखाई दे रहे हों. कोई भी बाजार भविष्य को नहीं जान सकता है, जबकि जब हम जैव-प्रौद्योगिकी की बात करते हैं, भविष्य से छेड़-छाड़ की बात कर रहे होते हैं. ऐसे मामले में यह तर्क देना कि सब कुछ बाजार के देवता के निर्णय पर छोड़ा जा सकता है, न सिर्फ तत्ववादी होगा बल्कि मूर्खतापूर्ण होगा. यह तो अपने विवेक और बुद्घि को पांवों तले कुचलने की इजाजत देना होगा. कुछ-कुछ ऐसा ही पर्यावरण परिवर्तन संबंधी बहस में हो भी रहा है.

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