बांग्लादेश के साथ है भारत- प्रणब मुखर्जी

Tuesday, March 5, 2013

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प्रणव मुखर्जी

ढाका: राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने आज ढाका में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम सम्मान प्रदान किए जाने के अवसर पर बांग्लादेश सरकार का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस सम्मान के माध्यम से आपने मुक्ति संग्राम के दौरान भारत के भाई-बहनों द्वारा दिए गए योगदान को सम्मान दिया है. इसमें वे बांग्लादेश के भाइयों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़े और यहां तक कि अपने प्राण भी न्योछावर कर दिए. पिछले वर्ष भी कई भारतीय नागरिकों को सम्मानित किया गया था. मैं उनकी ओर से और भारत की ओर से आपका आभार व्यक्त करता हूं.

राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा कि मैं उन निर्दोष पुरूषों, महिलाओं और बच्चों को भी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं, जिन्होंने इस देश की भावी पीढ़ियों की आजादी के लिए अपनी जानें कुर्बान कर दीं और जिनकी यादें सावर स्मारक और शहीद मीनार में समाहित हैं. उन्होंने हमें दिखा दिया कि यदि उद्देश्य सही हो, तो कमजोर से कमजोर भी जीत हासिल कर सकता है. आज बांग्लादेश गर्व के साथ अपने देश को आधुनिक, उन्नत और समृद्ध बनाने के कार्य में जुटा है.

श्री मुखर्जी ने कहा कि भारत जिस तरह से 1971 में बांग्लादेश के लोगों के साथ था, उसी तरह से आज 2013 में भी है. हम बराबर के भागीदार की तरह हमेशा आपके साथ रहेंगे. हम सांझी सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं. भारत और भारत के लोगों का बांग्लादेश के साथ विशेष संबंध हैं. बांग्लादेश के चहुंमुखी विकास में भारत की दिलचस्पी है, लेकिन आपसी सहयोग को अभी और बढ़ाने की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि दोनों देशों ने सहयोग की एक व्यापक रूपरेखा तैयार की है. हमारी कोशिश होगी कि आपसी सहयोग से हमारे दोनों देशों के लोगों को लाभ हो और उनके जीवन स्तर में सुधार हो. गरीबी उन्मूलन की चुनौती का बांग्लादेश ने जिस तरह मुकाबला किया है, वह वास्तव में सराहनीय है.

बांग्लादेश मुक्ति संग्राम को याद करते हुए श्री मुखर्जी ने कहा कि उन दिनों हमें स्वतंत्र बांग्लादेश रेडियो और ऑल इंडिया रेडियो से खबरें मिलती थी. हम बहुत ही उत्सुकता के साथ पूरे घटनाक्रम पर नजर रखे हुए थे. लाखों बांग्लादेशी शरणार्थी सीमा पार करके भारत आ चुके थे. हर भारतीय पूरे दिल के साथ उस जरूरत के मौके पर बांग्लादेशी भाइयों की सहायता करना चाहता था, क्योंकि वे सम्मान और न्याय की लड़ाई लड़ रहे थे.

श्री मुखर्जी ने कहा कि राज्यसभा में मैंने सुझाव दिया था कि निर्वासन में बांग्लादेश की सरकार को मान्यता दी जाए और भौतिक सहायता प्रदान की जाए. प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश के लोगों की सहायता के लिए कदम उठाया.

राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा कि दो से दस सितंबर, 1971 तक फ्रांस में हुए 59वें अंतरसंसदीय संघ के सम्मेलन में भारतीय शिष्टमंडल के सदस्य के तौर पर मैंने बांग्लादेश की स्थिति को सामने रखा और सांसदों को कहा कि वे बांग्लादेश में हो रहे मानव अधिकारों के हनन के खिलाफ आवाज उठाने के लिए अपनी सरकारों पर दबाव डालें. बाद में, त्रिपुरा, असम और मेघालय में शरणार्थी शिविरों में लोगों की देखभाल ठीक तरह से करने के बारे में स्थानीय सरकारों के बीच समन्वय बनाने की जिम्मेदारी मुझ पर डाली गई थी.

श्री मुखर्जी ने कहा कि बांग्लादेश की धरती के साथ मेरा व्यक्तिगत लगाव भी है. मेरी पत्नी का बचपन यहीं बीता है. आपके आतिथ्य से मैं और मेरी पत्नी अभिभूत हैं. यह सम्मान भारत और बांग्लादेश के बीच शाश्वत मैत्री और बंधुत्व का परिचायक है. मैं इस सम्मान को बहुत ही विनम्रता के साथ स्वीकार करता हूं. मेरी कामना है कि दोनों देशों के लोगों की उन्नति और समृद्धि के लिए हमारे आपसी संबंध और प्रगाढ़ हों.

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