अध्यादेश से संसद को धक्का: राष्ट्रपति

Sunday, January 25, 2015

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राष्ट्रपति- प्रणब मुखर्जी

नई दिल्ली | एजेंसी: गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति ने कहा अध्यादेशों से संसद की भूमिका को धक्का पहुंचता है. उन्होंने इसे लोकतंत्र तथा कानून के लिये अच्छा नहीं बताया. राष्ट्रपति ने 66वें गणतंत्र की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा कि इसके लिए भागीदारों के बीच मतभेदों को दूर करने तथा बनाए जाने वाले कानूनों पर आम सहमति लाने की जरूरत होती है. उन्होंने कहा, “बिना चर्चा कानून बनाने से संसद की कानून निर्माण की भूमिका को धक्का पहुंचता है. इससे, जनता द्वारा व्यक्त विश्वास टूटता है. यह न तो लोकतंत्र के लिए अच्छा है और न ही इन कानूनों से संबंधित नीतियों के लिए अच्छा है.”

उन्होंने कहा, “पिछला वर्ष कई तरह से विशिष्ट रहा है. खासकर इसलिए कि तीन दशकों के बाद जनता ने स्थाई सरकार के लिए, एक अकेले दल को बहुमत देते हुए, सत्ता में लाने के लिए मतदान किया है और इस प्रक्रिया में देश के शासन को गठबंधन की राजनीति की मजबूरियों से मुक्त किया है.”

राष्ट्रपति ने कहा कि इन चुनावों के परिणामों ने चुनी हुई सरकार को, नीतियों के निर्माण तथा इन नीतियों के कार्यान्वयन के लिए कानून बनाकर जनता के प्रति अपनी वचनबद्धता पूरा करने का जनादेश दिया है.

उन्होंने कहा, “मतदाता ने अपना कार्य पूरा कर दिया है; अब यह चुने हुए लोगों का दायित्व है कि वह इस भरोसे का सम्मान करें. यह मत एक स्वच्छ, कुशल, कारगर, लैंगिक संवेदनायुक्त, पारदर्शी, जवाबदेह तथा नागरिक अनुकूल शासन के लिए था.”

राष्ट्रपति ने 66वें गणतंत्र की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा कि देश के शासकों के लिए गांधी जी का मंत्र सरल और शक्तिशाली था, “जब भी आप किसी शंका में हों.. तब उस सबसे गरीब और सबसे निर्बल व्यक्ति का चेहरा याद करें जिसे आपने देखा हो और फिर खुद से पूछें.. क्या इससे भूखे और आध्यात्मिक क्षुधा से पीड़ित लाखों लोगों के लिए स्वराज आएगा”.

राष्ट्रपति ने कहा कि 26 जनवरी का दिन हमारे देश की स्मृति में एक चिरस्थाई स्थान रखता है क्योंकि यही वह दिन है जब आधुनिक भारत का जन्म हुआ था.

उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी के नैतिक तथा राजनीतिक नेतृत्व के अधीन राष्ट्रीय कांग्रेस ने अंग्रेजी राज से पूरी स्वतंत्रता की मांग करते हुए दिसंबर, 1929 में पूर्ण स्वराज का संकल्प पारित किया था. 26 जनवरी, 1930 को गांधी जी ने पूरे देश में स्वतंत्रता दिवस के रूप में राष्ट्रव्यापी समारोहों का आयोजन किया था. उसी दिन से, देश तब तक हर वर्ष इस दिन स्वतंत्रता संघर्ष को जारी रखने की शपथ लेता रहा जब तक हमने इसे प्राप्त नहीं कर लिया.

उन्होंने कहा कि ठीक बीस वर्ष बाद 1950 में हमने आधुनिकता के अपने घोषणापत्र, संविधान को अंगीकार किया. यह विडंबना थी कि गांधी जी दो वर्ष पूर्व शहीद हो चुके थे परंतु आधुनिक विश्व के सामने भारत को आदर्श बनाने वाले संविधान के ढांचे की रचना उनके ही दर्शन पर की गई थी. इसका सार चार सिद्धांतों पर आधारित है: लोकतंत्र; धर्म की स्वतंत्रता; लैंगिक समानता; तथा गरीबी के जाल में फंसे लोगों का आर्थिक उत्थान. इन्हें संवैधानिक दायित्व बना दिया गया था.

उन्होंने कहा कि गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर, मैं भारत और विदेशों में बसे आप सभी को हार्दिक बधाई देता हूं. मैं, हमारी सशस्त्र सेनाओं, अर्ध-सैनिक बलों तथा आंतरिक सुरक्षा बलों के सदस्यों को अपनी विशेष बधाई देता हूं.

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