सियासी वस्त्राचरण के कारण

Monday, November 25, 2013

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महात्मा गांधी

कनक तिवारी
मुहावरा है ‘चेहरा दिमाग का दर्पण होता है.’ लेकिन राजनीतिज्ञों ने चेहरे पर इतना नियंत्रण मल लिया है कि मन का पता ही नहीं चलता. सियासतदां लोगों के कपड़ों का शौक शोध की वस्तु है. गांधी अधटंगी धोती पहने, आधी चादर का टुकड़ा ओढ़े गोलमेज़ परिषद में अंगरेज़ सम्राट और राजनयिकों के साथ श्वेत-श्याम फोटो खिंचा आए थे. उसे देखने से लगता है हंस के चारों ओर कौवे बैठे हैं. गांधी की धोती तो नहीं उतरी, लेकिन अंगरेज़ों की पतलूनें ढीली हो गईं.

जवाहरलाल नेहरू ने चूड़ीदार पाजामा, शेरवानी और खादी की टोपी की नायाब तिकड़ी का आविष्कार किया. बेचारे डॉ. लोहिया उसे तबलची की पोशाक बताते रहे. मोराराजी देसाई नेहरू की नकल के वस्त्रानुरागी थे, लेकिन राजनीति में उनकी बेटी के खिलाफ रहे. सरदार पटेल, लालबहादुर शास्त्री, डॉ. लोहिया, राजेन्द्र प्रसाद, जगजीवनराम, चरण सिंह, गुलजारीलाल नन्दा और अन्ना हज़ारे आदि की कदकाठी के नेता ग्रामीणों जैसी खादी की धोती कुर्ता और कुछ खादी की टोपी लगाए दिखाई देते हैं. कभी युवा तुर्क रहे जयप्रकाश वगैरह पाजामा कुर्ता और जैकेट भी पहनते थे. क्रांति बुढ़ापे में परवान चढ़ ही गई.

इन्दिरा गांधी ने बंगाली, ओडिसी और गुजराती सूती साड़ियों को सुघड़ता से पहन कर परिधानों के सौंदर्यशास्त्र को वही अहमियत प्रदान की जो उनकी राजनीति को मिली. सुरुचिपूर्ण और सुसंस्कृत वस्त्रों में संवरी उन्होंने आपातकाल, बांग्लादेश निर्माण,        वित्तीय संस्थाओं का राष्ट्रीयकरण, प्रिवीपर्स का उन्मूलन, सामंतों के विशेषाधिकार की समाप्ति और ऑपरेशन ब्लू स्टार जैसे साहसिक कारनामे अंजाम दिए. दक्षिण भारतीय प्रधानमंत्री देवेगौड़ा, कांग्रेसाध्यक्ष के. कामराज, पहले गवर्नर जनरल राजगोपालाचारी, मुख्यमंत्रिगण अन्नादौरे, एम.जी. रामचन्द्रन, एन.टी. रामाराव और करुणानिधि लुंगी कुरता की दक्षिणात्य शैली के पुरोधा बने हिन्दी का विरोध अलबत्ता करते ही रहे.

विश्वनाथ प्रताप सिंह राजशाही तेवर को मंडल कमीशन में तथा नेहरूवादी पोशाक चढ़ाए कश्मीरी बालदार टोपी में अपना खल्वाट छिपाते रहे, साथ साथ राजीव गांधी के खिलाफ बोफोर्स मामले में पीठ पर वार करने की मारक क्षमता. इंद्रकुमार गुजराल दुर्घटनावश प्रधानमंत्री बने लेकिन वस्त्रों, किताबों, कलाओं आदि की शाइस्तगी उनकी फे्रंचकट दाढ़ी से ज्यादा जतनपूर्वक प्रकट होती थी.

अटल बिहारी वाजपेयी धोती, कुरता और जैकेट में ज़्यादातर और औपचारिक अवसरों पर जोधपुरी सूट में रहते हैं. उन पर नेहरू का असर रहा, लेकिन नेहरू वाली अचकन का नहीं. नेहरू के बुलावे पर कांग्रेस पार्टी में आते आते रह गए. लालकृष्ण आडवाणी पाजामा कुरता पहनते हैं और जोधपुरी सूट भी. उनका व्यक्तित्व लेकिन सावधानी और मजबूती से बंधी उनकी धोती की गांठ में फबता है. पता नहीं नरेन्द्र मोदी को उनकी धोती ढीली करना किसने सिखाया?

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सांस्कृतिक संगठन होने के दावे के बावजूद मोदी को भाजपा का संभावित प्रधानमंत्री बनाता है. संघ के गणवेश खाकी हाफ पैन्ट, सफेद कमीज़ और काली टोपी में सभी भाजपा नेता उसकी शाखा में जाते हैं. राजनीति में ऐसा वस्त्र-अनुशासन कैसे, क्यों और कितनी चारित्रिक और बौद्धिक मज़बूती प्रदान करता है-इसका शोध ज़रूरी है. नरेन्द्र मोदी चूड़ीदार पाजामा के ऊपर कमीज़नुमा आधी बांह का डिज़ाइनर कुरता पहनते भुजदंड और मुष्टिका दिखाते भारत के प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं.

राजनाथ सिंह सामान्य धोती कुरता पहनने पर भी वीर रस का भाव दोनों हाथों से बाहें चढ़ाते टपकाते हैं. कहते हैं कुंठाग्रस्त आदमी ऐसी हरकतें करता है. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह पूरी अस्तीन के सफारी सूट में ही रहते हैं जिसके वे ब्रांड एम्बेसडर लगते हैं. उन्हें कभी कभार कुरता पाजामा और जैकेट में देखकर लगता है कि सारे सफारी सूट शायद एक साथ धुलने भेजे गए होंगे.

राजीव गांधी ने मोटी टेरीन खादी से बने कुरते पाजामे का चलन खूब बढ़ाया और एक कंधे पर शॉल को लटकाने का. कांग्रेसी उनकी नकल करने लगे, लेकिन राजीव की नफासत को चरित्र में ढालना संभव नहीं हो पाया. सभ्य पिता की राजनीति को पुत्र राहुल गांधी उनसे ज़्यादा ढीला पाजामा और सफेद कुरता पहने चला रहे हैं. युवा कार्यकर्ता राहुल के कपड़ों की नकल नहीं करते. नेहरू परिवार में पाजामे की मोहरी क्रमशः चैड़ी होती जा रही है.

सोनिया गांधी अपनी सास की याद दिलाती भारत की बहू होने के नाते सिर पर पल्लू रखना नहीं भूलतीं. भले ही कभी कभार सलवार सूट भी पहन लें. देवरानी मेनका लगभग इसी शैली के कपड़े पहनती भी संस्कारों में भारतीय बहू नहीं बन पाई. वरुण गांधी भी राहुल की तरह वस्त्र पहनकर भी मोदीपरस्त हैं.

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के जोधपुरी सूट और पाजामे कुरते उनके स्वभाव की तरह मौन ही ज़्यादा लगते हैं. अमेरिकी मूल की कंपनी फैब इंडिया लिमिटेड के सस्ते, सुंदर, टिकाऊ, रेडीमेड कपड़ों के भांडार में से अजीत जोगी के वार्ड रोब में बेशुमार दौलत की तरह उनका भी अंबार होगा. तिरंगा दुपट्टा फिर भी हर वक्त गलहार की तरह लटकाते हैं. समर्थकों और पुत्र तक ने उनकी पोशाक की नकल नहीं की. दूसरा जोगी बनना कहां संभव है? केन्द्रीय मंत्री चिदंबरम ऑक्सब्रिज वार्तालाप शैली के बावजूद भारत में मजबूती से लुंगी बांधे गजगामिनी की तरह चलते हैं. पतलून विदेश यात्राओं में ही चढ़ पाती है.

नफीस पोशाक पसंद विद्याचरण शुक्ल से फिल्मी सितारे तक खौफ खाते रहे. उनके उन्मत्त अनुयायी नख शिख तक शुक्ल बनने के आभिजात्य कार्यकर्ताओं और जनता को हंकालने लगे. चमकदार डिज़ाइनर कपड़ों में वे ‘हम पंछी एक डाल के‘ गीत गाना भी भूल गए. कांग्रेस सेवादल की खास मोटी झोटी झक सफेद खादी की पोशाक कांग्रेस नेता सलामी स्वीकार करते भी नहीं पहनते. कमलनाथ और दिग्विजय सिंह मोटे तौर पर राजीव शैली पर कायम हैं.

खंड खंड हो रहे समाजवादी कुनबे खादी तो लपेटे हैं. पता नहीं उनकी पोशाकधर्मिता भी उनकी पहचान की तरह कब गुम हो जाए. मटमैली, मोटी झोटी हैंडलूमी साड़ी बांधे ममता बनर्जी करोड़ों गरीब औरतों का प्रतिरूप नज़र आती हैं. वे बेचारी लेकिन शेरनी ममता की तरह कम्युनिस्टों, बुद्धिजीवियों और बलात्कृतों पर दहाड़ नहीं पातीं. तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता की हज़ारों साड़ियां और सैकड़ों जूतियां, सैंडिलें ही उन्हें डी.एम.के. की लुंगी ढीली करने मजबूत बनाती रहती हैं.

गृहमंत्री रहे शिवराज पाटिल महंगे वस्त्रों को भी दिन में तीन चार बार बदलने के शौक के चलते दुर्घटना की सूचना मिलने पर भी वे आला अधिकारियों से तत्काल नहीं मिल पाते. बंगाल के कम्युनिस्ट धोती कुरता, केरल के लुंगी कमीज़ और नई पीढ़ी के पैन्ट कमीज़ तथा कुरता पाजामा जैसे आमफहम वस्त्रों में नज़र आते हैं. इसीलिए कम्युनिस्टों का आंचलिक मर्तबा ही बनता रहा है राष्ट्रीय दखल नहीं.

खटपटिया राजनीतिज्ञ बने संत महंत स्वामी अग्निवेश, पवन दीवान, योगी आदित्यनाथ, रामस्वरूप वेदांती, सतपाल महाराज, उमा भारती, बाबा रामदेव जैसों के दामन में नंबर एक की दानदक्षिणा है और आसाराम सहित कई की चोली में ठेकेदारों, उद्योगपतियों और नेताओं का काला धन. यश तो पहले करपात्री जी महाराज और प्रभुदत्त ब्रह्मचारी का रहा है. अपयश चंद्रास्वामी और इन्दिरा गांधी के योग प्रशिक्षक धीरेन्द्र ब्रह्मचारी वगैरह के लिए प्रदर्शित हुआ. ये मुखौटेबाज़ भगवा रंग पर कालिख मलते दल बदल करते हैं. हिंसक झड़पों में रहते संविधान के विरुद्ध धार्मिक विद्वेष पैदा करते रहते हैं. समाज में ज़हर की पुड़िया घोलते हैं. नाम के योगी, कर्म में भोगी, भावना में रोगी बने देश की युवा पीढ़ी को तबाह कर रहे हैं.

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