पनामा पेपर्स: पूंजीवाद का नियम

Sunday, May 1, 2016

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पनामा पेपर्स

प्रभात पटनायक
अमरीकी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी का भेद खेालने वाले, एडवर्ड स्नोडेन ने इससे दुनिया का, ‘‘डॉटा पत्रकारिता के इतिहास का सबसे बड़ा लीक’’ करार दिया है. पनामा से चलने वाली कानूनी (सहायता) फर्म मोसेक फोन्सेका ने इसे अपना धंधा ही बना लिया था कि दुनिया भर के धन तथा दौलतमंदों का पैसा चोरी-छिपे विभिन्न विदेशी कंपनियों में लगवाया जाए. इसके लिए कंपनी अपने ग्राहकों को इसका भरोसा दिलाती थी कि उनकी इस कमाई का राज, हमेशा राज ही रहेगा. लेकिन, हुआ यह कि एक सूत्र ने, जिसकी पहचान स्वाभाविक रूप से अब तक छुपी ही हुई है, मोसेक फोन्सेका की करीब एक करोड़ 15 लाख फाइलें जर्मन अखबार, शुडॉयचे जेइटुंग को लीक कर दीं. इस कदम के पीछे इस सूत्र की प्रेरणा यही लगती है कि वह भ्रष्ट्राचार और चोरी के इस पूरे धंधे से घिना गया होगा.

बड़े-बड़े नाम
इस तरह लीक हुई फाइलों में 1977 से 2015 के दिसंबर तक के अर्से में फैली जानकारियां हैं. इन फाइलों में जानकारियों की मात्रा इतनी ज्यादा थी कि इनकी छानबीन में लगे उक्त जर्मन अखबार के पत्रकारों ने तय किया कि इस सामग्री को खोजी पत्रकारों के अंतर्राष्ट्रीय परिसंघ के साथ साझा किया जाए, जिसके सदस्य ये जर्मन पत्रकार खुद भी थे. खोजी पत्रकारों का यह अंतर्राष्ट्रीय संघ, जानकारियों का साझा करने में विश्वास करता है. खोजी पत्रकारों के इस अंतर्राष्ट्रीय समूह द्वारा अब तक जितनी फाइलों की छानबीन की जा सकी है, उनसे ही पता चलता है कि दुनिया भर में अनेक शासनाध्यक्ष/ राज्याध्यक्ष खुद, अन्य शीर्ष राजनीतिक नेताओं के नजदीकी मित्र व नाते-रिश्तेदार तथा पदाधिकारी, व्यापार तथा शो-बिजनेस के बड़े खिलाड़ी आदि आदि, इस रास्ते का इस्तेमाल कर चोरी-छिपे अपने-अपने देश की सीमाओं से बाहर की कंपनियों में पैसा लगाते रहे हैं तथा इस तरह कमाई करते रहे हैं. जाहिर है कि यह सब अपने-अपने देशों के कानूनों का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन करते हुए किया जा रहा था, जिसमें जाहिर है कि कर कानूनों को धता बताना भी शामिल है. यह सब मोसेक फोन्सेका की सेवाओं का सहारा लेकर किया जा रहा था.

करों आदि की चोरी के इस धंधे में सीधे संलिप्त पाए गए शासनाध्यक्षों में, आइसलेंड के प्रधानमंत्री का नाम भी शामिल है. याद रहे कि 2008 में फूटे विश्व वित्त संकट के सिलसिले में विशेष रूप से चर्चा में आए देशों में, आइसलेंड का नाम भी शामिल था. इसके अलावा, इनमें अर्जेंटीना के हाल ही में चुने गए दक्षिणपंथी राष्ट्रपति का नाम भी शामिल है, जिसने कमाई का यह रास्ता तभी पकड़ लिया था जब वह ब्यूनोस एअर्स के मेयर के पद पर ही था. इसके अलावा इस सूची में यूक्रेन के राष्ट्रपति का नाम भी शामिल है.

इसके अलावा जिन शासनाध्यक्षों/ राज्याध्यक्षों के निकट-संबंधियों के नाम से यह धंधा हो रहा था, उनमें ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड केमरून (जिन के पिता ने मोसेक फोन्सेका की मदद ली थी), रूस के ब्लादीमीर पूतिन (जिनके एक निकट सहयोगी ने ऐसा ही किया था), सीरिया के बशर अल असद (जिनका चचेरा-ममेरा भाई इस धंधे में संलिप्त पाया गया है) और मिस्र के पूर्व-राष्ट्रपति होस्नी मुबारक (जिनके बेटे का नाम आया है) शामिल हैं. सूची वास्तव में बहुत लंबी है और इसमें चीनी अभिजात तबके से भी कुछ नाम शामिल हैं. इस रास्ते का इस्तेमाल करने के मामले में भारतीयों के जो नाम शामिल पाए गए हैं, उनमें कुछ प्रमुख नाम इस प्रकार हैं: अभिनेता अमिताभ बच्चन व ऐश्वर्या राय बच्चन, डीएलएफ के के पी सिंह और विनोद अडानी जो, अडानी ग्रुप के चेयरमैन तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बहुत नजदीकी माने जाने वाले गौतम अडानी के बड़े भाई हैं.

बेशक, इन रहस्योद्घाटनों से काफी हलचल पैदा हुई है. आसलेंड में तो उसके इतिहास का सबसे बड़ा प्रदर्शन हुआ, जिसमें प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग उठायी गयी और वास्तव में उसके बाद प्रधानमंत्री ने इस्तीफा भी दे दिया. यूके, फ्रांस, न्यूजीलेंड, ऑस्ट्रेलिया आदि में, जानी-मानी हस्तियों द्वारा धन-शोधन तथा कर चोरी के आरोपों की, समुचित जांच कराए जाने का भरोसा दिलाया गया है.

स्वतंत्र जांच एजेंसी का गठन जरूरी
भारत में भी एक विशेष जांच दल का गठन किया गया है. इसमें केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड, रिजर्व बैंक तथा अन्य संबद्घ एजेंसियों की जांच इकाइयों के अधिकारियों को शामिल किया जाएगा. लेकिन, इस संबंध में आशंकाएं भी जतायी गयी हैं कि अनेक आरोपियों की मोदी सरकार से निकटता को देखते हुए इस टीम को, जिसमें खुद सरकारी अधिकारी ही शामिल होंगे, कहां तक मामले की पूरी जांच-पड़ताल करने दिया जाएगा? कुछ अर्सा हुआ जब सुप्रीम कोर्ट ने ‘‘काले धन’’ की जांच के लिए विशेष जांच दल का गठन किया था. लेकिन, उक्त विशेष जांच दल तक ने खुद सरकारी एजेंसियों से ही समुचित सहयोग न मिलने की शिकायत की है. इससे, इस प्रकार की किसी भी जांच के प्रति सरकार के उदासीन रुख का ही पता चलता है. उसके ऊपर से जब जांच खुद सरकार के नजदीकियों के खिलाफ हो, उसके प्रति सरकार की अनिच्छा और बढ़ जाना एक तरह से तय ही है.

इस तरह की आशंकाओं का एक कारण और है. मोदी सरकार के हाथों में ऐसे समय में अर्थव्यवस्था का संचालन आया है, जब अर्थव्यवस्था गहरे संकट में फंसी हुई है और इस संकट से निपटने का इस सरकार को इसके सिवा और कोई रास्ता ही नजर नहीं आता है कि कार्पोरेट-वित्त अल्पतंत्र को तथा विदेशी पूंजी को ज्यादा से ज्यादा रियायतें देते रहा जाए ताकि उन्हें ‘‘मेक इन इंडिया’’ के लिए प्रेरित किया जा सके. याद रहे कि मॉरीशस मार्ग को, जिसका इस्तेमाल भारत में निवेश करने वाली विदेशी पूंजी द्वारा करों से बचने के लिए किया जा रहा था, एक वक्त पर तो बंद ही कर देने की भी कोशिश हुई थी. लेकिन, बहुराष्ट्रीय निगमों के दबाव के चलते सरकार को इस कोशिश को पूरी तरह से छोडऩा ही पड़ा था. मोदी सरकार ने न सिर्फ मॉरीशस मार्ग को खोले रखा है बल्कि पिछले ही दिनों उसने कार्पोरेटों को इसका खासतौर पर भरोसा भी दिलाया था कि विगत प्रभाव से कर लगाने से हर हाल में बचा जाएगा.

‘‘मेक इन इंडिया’’ अभियान तो खैर वैसे भी विफल होना ही है क्योंकि इस समय दुनिया भर में कहीं भी कोई खास निवेश हो ही नहीं रहा है. लेकिन, समस्या यह है कि ‘‘मेक इन इंडिया’’ अभियान जितना ज्यादा विफल होगा, मोदी सरकार बदहवासी में कार्पोरेटों और बहुराष्ट्रीय निगमों को उतनी ही ज्यादा रियायतें दे रही होगी. ऐसे में यह सरकार पनापा पेपर्स के रहस्योघाटनों पर पर्दा डालने में न लगी पायी जाए तो आश्चर्य होगा. इसीलिए, जरूरी है कि इन रहस्योघाटनों की जांच का काम मोदी सरकार के हाथों से लेकर, किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी को सोंपा जाए.

समकालीन पूंजीवाद की कार्य पद्धति यही है
पनामा पेपर्स के रहस्योघाटन समकालीन पूंजीवाद की कार्य-पद्धति पर काफी रौशनी डालते हैं. इस सिलसिले में तीन पहलू हैं जो खासतौर पर ध्यान खींचते हैं. पहला और सबसे स्वत:स्पष्ट पहलू तो यही कि दौलतवालों और ताकतवालों द्वारा बड़े पैमाने पर करों की चोरी की जा रही है. इस काम के लिए वे कर-स्वर्गों का इस्तेमाल करते हैं और सागर-पारीय कंपनियों में चोरी-छिपे पैसा लगाते हैं ताकि अपने-अपने देश में कर देने से बच सकें.

दूसरा पहलू, उदारवादी भाषा में जिसे ‘‘हितों का टकराव’’ कहा जाता है, उसका आज की दुनिया में बहुत बड़े पैमाने पर काम कर रहा होना ही है. जो शासनाध्यक्ष, अपने नाम में या अपने निकट संबंधियों के नाम में, समुद्रपारीय कंपनियों में चोरी-छिपे बड़ी-बड़ी रकमें लगा रहे हैं, वे ही शासनाध्यक्ष की हैसियत से, ‘‘राष्ट्रीय हित’’ की आड़ में ऐसे निर्णय ले रहे होते हैं, जिनका असर उनके इन गुप्त निवेशों की बढ़त पर पड़ता है. इससे भी बुरा यह कि जनता को इसका पता ही नहीं चलता है कि उक्त निर्णयों से वास्तव में उक्त नेता अपनी दौलत ही दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ा रहे होते हैं, क्योंकि इन नेताओं ने जनता को अपने इन निवेशों के बारे में कभी बताया ही नहीं होता है. आइसलेंड के प्रधानमंत्री के उदाहरण से इस पहलू को अच्छी तरह से समझा जा सकता है. आइसलेंड के प्रधानमंत्री तथा उनकी पत्नी ने जिस समुद्रपारीय कंपनी में लंबे-चौड़े निवेश कर रखे थे, उसके पास बहुत बड़ी संख्या में आइसलेंड के बैंकों के बांड थे. इसलिए, वित्तीय संकट के बाद जब इन बैंकों को आइसलेंड की सरकार द्वारा बेल आउट दिया जा रहा था, वास्तव में उस सरकार का प्रधानमंत्री अपनी निजी दौलत को बचा रहा था, लेकिन जनता को इसका कुछ अता-पता ही नहीं था.

तीसरे पहलू का संबंध, धनवानों तथा ताकतवालों की इस छुपी हुई दौलत और मादक द्रव्य कार्टेलों, आतंकवादी गुटों तथा ऐसे ही अन्य खिलाडिय़ों की ऐसी ही दौलत के आपस में घुले-मिले होने का है. याद रहे कि यही नेतागण आए दिन, ठीक इन्हीं ताकतों के खिलाफ बयानबाजी कर रहे होते हैं. संक्षेप में यह कि तथ्यत: तो ‘‘नैतिक’’ तथा ‘‘अनैतिक’’, ‘‘वैध’’ तथा ‘‘अवैध’’, ‘‘जायज’’ तथा ‘‘नाजायज’’ के बीच का अंतर ही मिट गया है, जबकि जनता के सामने इन भेदों का इतना ढोल पीटा जाता है कि पूछिए ही मत.

यह विचलन नहीं नियम है
पनामा पेपर्स के सार्वजनिक हो जाने के बहुत से लोग इसके मौके की तरह देख रहे हैं कि इनके जरिए व्यवस्था को ‘‘साफ-सुथरा’’ बनाया जा सकता है, ‘‘दोषियों’’ को दंडित किया जा सकता है और यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि जो कर चोरी करते हैं तथा जनता को ठगते हैं, उन्हें उनकी करनी का फल दिलाया जाए. बेशक, व्यवस्था को ‘‘साफ-सुथरा’’ करने और ‘‘दोषियों’’ को सजा देने की इस मांग का तो समर्थन ही किया जा सकता है. फिर भी, इसका कोई भ्रम नहीं पालना चाहिए कि कभी कोई एकदम ‘‘साफ-सुथरा इजारेदार पूंजीवाद’’ भी हो सकता है. लेकिन, जैसा हमने पहले ही कहा, ‘‘साफ-सुथरा इजारेदार पूंजीवाद’’ असंभव होने का अर्थ व्यवस्था को ‘‘साथ-सुथरा’’ बनाने की मांग के प्रति उदासीन होना या उसका विरोध करना हर्गिज नहीं है. उल्टे ठीक इसीलिए कि ‘‘साफ-सुथरा इजारेदार पूंजीवाद’’ असंभव है, यह जरूरी हो जाता है कि उसे ‘‘साफ-सुथरा’’ बनाने की हरेक कोशिश का समर्थन किया जाए. वास्तव में यह एक संक्रमणकालीन मांग है, जिसके जरिए जनता के सामने यह स्पष्ट किया जा सकता है कि इस व्यवस्था की हकीकत क्या है जो कि भ्रष्ट्राचार के पीछे काम कर रही है और भ्रष्ट्राचार के पीछे अनिवार्य रूप से काम कर रही होती है.

1916 में लेनिन ने अपने महाग्रंथ, ‘साम्राज्यवाद, पूंजीवाद की सर्वोच्च अवस्था’ में बताया था कि किस तरह इजारेदार पूंजीवाद के दौर में बड़े वित्तीय खिलाडिय़ों, बड़े उद्योगपतियों और शासन के अधिकारियों के बीच, एक ‘‘निजी गठबंधन’’ कायम हो जाता है. बेशक, लेनिन ऐसे हालात से दो-चार हो रहे थे जहां यह ‘‘निजी गठबंधन’’ (इस संज्ञा का प्रयोग सबसे पहले हिल्फेर्डिंग ने किया था) राष्ट्र की सीमाओं में ही काम करता था यानी जर्मन वित्तीय पूंजी का जर्मन राज्य के साथ गठजोड़ था, ब्रिटिश वित्तीय पूंजी का ब्रिटिश राज्य के साथ गठजोड़ था, आदि. लेकिन, वित्त के विश्वीकरण के मौजूदा युग में तो शासकीय अधिकारियों तथा वित्तीय पूंजी के बीच विकसित होने वाला गठबंधन, वैश्विक स्तर पर भी काम करता है. यह वह मुकाम है जहां राष्ट्र-राज्यों के शासनाध्यक्ष तक अपनी दौलत, अपने ‘‘राष्ट्र’’ की सीमाओं के पार दूसरे देशों में लगाते हैं और अपनी दौलत को बढ़ाने के लिए ‘‘वैश्विक रास्तों’’ का सहारा लेते हैं और इसके लिए अपने ही ‘‘राष्ट्रों’’ से कर राजस्व की चोरी करते हैं.

यह वाकई विडंबनापूर्ण है कि ठीक उस समय जबकि भाजपा, ‘‘राष्ट्रवाद’’ के ऐसे रूप को स्थापित करने के जरिए, जहां वह अपनी परिभाषा खुद आप ही है, देश भर के सभी विश्वविद्यालयी परिसरों में विचार तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले करने में लगी हुई है, उसके चहेते पूंजीपति जिन्होंने सीधे उसका संरक्षण हासिल कर बड़ी तेजी से अपनी दौलत बढ़ायी है, राष्ट्र को ठग कर यह दौलत बटोरने के आरोपों के घेरे में हैं.

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