मानवता की शव यात्रा

Friday, August 26, 2016

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कंधे पर शव यात्रा

रायपुर | जेके कर: ओडिशा में एक मजबूर पति ने पत्नी के शव को 10 तक ढोया. मामला ओडिशा के भावनीपटाना का है. जहां एक आदिवासी पति को अपनी मृत पत्नी के शव को 10 किलोमीटर तक कंधे पर चढ़ाकर ढोना पड़ा. वैसे वह मजबूर आदिवासी पास में गाड़ी से शव ले जाने के पैसे न होने के कारण उसे पूरे 60 किलोमीटर तक पत्नी के शव को कंधे पर ले जाना चाहता था. हैरत की बात तो यह है कि उसे अस्पताल से शव को गांव तक ले जाने के लिए कोई वाहन नहीं मिल सका. यह ओडिशा में सरकारी योजनाओँ की शव यात्रा के शिवाय और कुछ न था.

दरअसल व्यक्ति की पत्नी भावनीपटाना में जिला मुख्यालय अस्पताल में टीबी की बीमारी का इलाज करा रही थी लेकिन 42 वर्षीय महिला की मंगलवार रात को उसकी मौत हो गई. पत्नी की मौत के बाद उस व्यक्ति को अस्पताल से शव को घर तक ले जाने के लिये वाहन नहीं मिल सका.

इस मामले की सोशल मीडिया पर कड़ी आलोचनायें हो रही हैं. मसलन यह कोई मैराथन की दौड़ नहीं थी. यह सरकारी योजनाओं के टीबी उन्मूलन कार्यक्रम के बावजूद अस्पताल में उसकी पत्नी का मर जाना था. ओड़िशा के एक आदिवासी दाना मांझी की जेब में एक पैसा भी नहीं था. इस कारण से पत्नी अमंग देई की लाश को घर ले जाने के लिये उसने चादर में पत्नी की लाश को लपेटा और कंधे पर टांग कर अपनी बेटी के साथ पैदल चल पड़ा… साठ किलोमीटर दूर अपने गांव की ओर…! दरअसल, यह 21वीं सदी की ओर जाते भारतीय समाज व्यवस्था की शव यात्रा से कमतर कुछ नहीं थी.

इस 10 किलोमीटर के रास्ते में लोगों ने इस शव यात्रा के वीडियो बनाये, फोटो खींचे, तुरंत ही सोशल मीडिया पर डाला पर किसी ने भी उसकी सहायता के लिये अपने हाथ नहीं बढ़ाये. यह सोशल मीडिया के दीवानों के दीवानगी की शव यात्रा भी थी. जिनके लिये हर घटना की फोटो या वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर शेयर करना प्राथमिकता होती है न कि किसी जरूरतमंद की सहायता करना. वैसे आजकल जलते हुये विकलांग की फोटो लेने की भी होड़ लगी रहती है बजाये उसे बचाने की कोशिश करने के.

कहते हैं कि समाज में जहां से बाजार का जन्म हुआ वहीं से मानवता ने अपना दम तोड़ दिया. ओडिशा की घटना इसे सही साबित करती है. वर्ना क्या उपस्थित लोग चंदा करके एक शव को ढोने के लिये गाड़ी की व्यवस्था नहीं कर सकते थे? सोशल मीडिया में एक-एक ‘लाइक’ के लिये बड़ी-बड़ी डींगे हाकने वाले वीरों की वीरता उस समय कहां थी जब एक गरीब मजबूर आदिवासी उनकी आखों के सामने अपनी पत्नी के शव को 10 किलोमीटर तक कंधे पर ढ़ोता रहा.

ओडिशा के नवीन पटनायक सरकार ने फरवरी माह से ‘महापरायण’ योजना की शुरुआत की है जिसके तहत शव को सरकारी अस्पताल से घर तक मुफ्त ले जाने की सुविधा दी जाती है. जांच के दायरे में उस सरकारी अस्पताल के जिम्मेदार लोगों को भी लेना चाहिये जिन्होंने दाना माझी के पत्नी अमंग देई के शव के लिये गाड़ी की व्यवस्था नहीं की. बताया जा रहा है कि शव को ढ़ोते दाना माझी को देखकर कुछ पत्रकारों ने कालाहांडी के जिला कलेक्टर ब्रुंदा डी को फोन किया तो उन्होंने शव के लिये वाहन की व्यवस्था की.

इस सब के बीच में समाज से, सरकार से, सरकारी योजनाओँ से सवाल किया जाना चाहिये कि और कितने दाना माझी को अपने मृत पत्नी के शव को कंधे पर ढो़ना पड़ेगा? अब राजनीतिक दल हो-हल्ला करेंगे, सरकार जांच करवायेगी, एक दूसरे पर जिम्मेदारी थोपने की कोशिशे होंगी, कुछ निलंबित होंगे. विरोधी इसे अगले चुनाव में खूब भुनायेंगे. लेकिन दाना माझी तथा उसकी बेटी इस दर्द को जिंदगी भर भुला न पायेंगे. और मानवता पर जो जख्म लगा है उसी उसे समाज जल्द भुला देगा. किसी और सनसनी खबर के इंतजार में….

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